भारतीय अर्थव्यवस्था कई महीनों से लगातार परिवर्तनशील दौर से गुजर रही थी। महंगाई और वैश्विक आर्थिक मंदी का प्रभाव घरेलू स्तर पर दिखाई दे रहा था। उपभोक्ता महंगे ब्याज दरों से दबे हुए थे और बैंक लोन की EMI लगातार जीवन स्तर पर बोझ बन चुकी थी। आर्थिक विशेषज्ञ बार-बार इस बात का संकेत दे रहे थे कि ब्याज दरों में ढील ही वह कदम है जो उपभोक्ता मांग को सक्रिय कर सकता है। फिर आखिरकार, रिज़र्व बैंक ने वह निर्णय ले लिया जिसकी प्रतीक्षा लाखों लोग कर रहे थे—रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की कटौती।

आज देश की मौद्रिक नीति उस मोड़ पर है जहाँ स्थिरता के साथ विकास को गति देने की चुनौती सामने है। रेपो रेट में गिरावट केवल ब्याज दरों का कम होना नहीं, बल्कि आर्थिक व्यवस्था में तरलता और उपभोग क्षमता बढ़ाने का संकेत है।
रेपो रेट घटकर 5.25 प्रतिशत—लाखों उपभोक्ताओं को राहत
गवर्नर संजय मल्होत्रा ने केंद्रीय बैंक की बैठक के बाद घोषणा करते हुए बताया कि समिति ने घरेलू आर्थिक संकेतों, वैश्विक महंगाई दबाव और रिटेल मुद्रास्फीति में तेज गिरावट को देखते हुए यह फैसला लिया है। यह कटौती पिछले कई महीनों की आर्थिक समीक्षा के बाद संभव हो पाई है।
रेपो रेट वह दर है जिस पर बैंक केंद्रीय बैंक से ऋण लेते हैं। जब यह दर घटती है तो बैंक के लिए कर्ज लागत कम होती है और वह आगे उपभोक्ताओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराते हैं।
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो जब भी रेपो रेट कम होती है, बाजार में निवेश और खरीदारी गतिविधि बढ़ती है।
EMI में सीधी राहत—घर, गाड़ी और व्यक्तिगत ऋण अब होंगे सस्ते
लाखों लोगों के लिए इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि अब EMI में कटौती होगी। जिस व्यक्ति ने 30 लाख का होम लोन लिया है, उसे अब मासिक EMI में 800 से 1500 रुपये तक की कमी दिखाई दे सकती है। राशि और अवधि के अनुसार लाभ इससे अधिक भी हो सकता है।
यह कटौती आने वाले कुछ दिनों में बैंकिंग सिस्टम के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंच जाएगी।
विश्लेषकों के अनुसार:
- पहला परिणाम—आवासीय संपत्तियों की मांग बढ़ेगी
- दूसरा—त्योहारी बाद की मंदी कम होगी
- तीसरा—ऑटोमोबाइल सेक्टर में बिक्री का उछाल दिख सकता है
बेहद कम हुई मुद्रास्फीति—बाजार में उपभोग क्षमता बढ़ने की संभावना
अक्टूबर 2025 में खुदरा महंगाई केवल 0.25 प्रतिशत दर्ज की गई। यह पिछले कई दशकों का सबसे निम्न स्तर माना गया।
इस स्थिति का अर्थ यह है कि उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में उछाल कम है। इसी वजह से RBI के लिए ब्याज दर घटाना आसान निर्णय था।
GDP डेटा भी शानदार रहा। दूसरी तिमाही में GDP 8.2 प्रतिशत बढ़ना अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है।
तरलता बढ़ाने के अलग-अलग कदम—बाजार को मिली अतिरिक्त ऊर्जा
केंद्रीय बैंक ने केवल रेपो रेट कम नहीं की, बल्कि बाजार में नकदी उपलब्धता को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बड़े वित्तीय कदम उठाए हैं:
- STF दर घटाकर 5%
- MSF और बैंक रेट 5.50%
- 1 लाख करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड की खरीद योजना
- 5 बिलियन डॉलर का डॉलर-रुपया स्वैप
इन उपायों का उद्देश्य:
- व्यापारिक संस्थानों को पूंजी उपलब्ध कराना
- ऋण प्रवाह बढ़ाना
- बैंकों के पास पर्याप्त उधार क्षमता सुनिश्चित करना
तरलता बढ़ने से छोटे-मझोले उद्योगों को लाभ होगा।
निर्माण और रियल एस्टेट सेक्टर में बड़ा उछाल
विशेषज्ञों का मानना है कि रियल एस्टेट क्षेत्र में दो बड़े परिणाम होंगे—
- पहला—बिक्री में तेजी आएगी
- दूसरा—नए प्रोजेक्ट्स शुरू होंगे
निवेशकों के लिए इसका बड़ा लाभ है क्योंकि पिछले कई महीनों में इस क्षेत्र में स्थिरता दिखाई दे रही थी। ब्याज दर कम होने का सीधा अर्थ यह है कि निर्माण कंपनियों के पास खरीदारों का प्रवाह बढ़ेगा।
ऑटो उद्योग पर सकारात्मक प्रभाव
वाहन बाजार में इलेक्ट्रिक कारों से लेकर दो-पहिया वाहनों तक की मांग में एक बार फिर उछाल आएगा।
अगर ब्याज दरें अगले छह महीनों में स्थिर रहती हैं तो 2026 की पहली तिमाही में बिक्री नई ऊंचाई छू सकती है।
सरकारी योजना लाभार्थियों पर भी असर
कई योजनाओं में ब्याज सब्सिडी आधारित भुगतान होते हैं। कम रेपो रेट से राज्य-सरकारों और विभिन्न सार्वजनिक संस्थानों को वित्तीय राहत मिलेगी।
आगे क्या—अर्थव्यवस्था की दिशा अनोखे मोड़ पर
केंद्रीय बैंक ने नीति रवैया न्यूट्रल रखा है। इसका मतलब यह नहीं कि ब्याज लगातार कम होगी। बल्कि RBI अगले छह महीने आर्थिक स्थिति को परखेगा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि महंगाई अगले तीन महीनों तक कम बनी रही तो ब्याज वृद्धि की संभावना नहीं होगी।
निष्कर्ष
देश के आर्थिक परिदृश्य में यह फैसला निर्णायक है। उपभोक्ता राहत पाएंगे, व्यापारियों को मांग, रियल एस्टेट को उछाल, बैंकिंग को गति और निवेशक को भरोसा मिलेगा।
यह कटौती केवल एक आर्थिक घोषणा नहीं, बल्कि बाजार को नया संतुलन देने वाली रणनीतिक नीति है।
