भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसे समय में मोड़ पर खड़ी है जब विकास दर उम्मीद से बेहतर है, महंगाई ऐतिहासिक स्तरों पर नरम है और वित्तीय बाजारों में स्थिरता दिखाई दे रही है. इसी पृष्ठभूमि में भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति की बैठक में एक बड़ा निर्णय लिया. रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती करके इसे 5.50 प्रतिशत से घटाकर 5.25 प्रतिशत पर लाया गया है. यह कमी ऐसे समय में हुई है जब यह माना जा रहा था कि केंद्रीय बैंक कम से कम इस तिमाही में इंतजार की नीति अपनाएगा. लेकिन इसके साथ ही जिस घोषणा ने वित्तीय जगत को अधिक प्रभावित किया, वह एक लाख करोड़ रुपये के ओपन मार्केट ऑपरेशन का निर्णय रहा.

एक ओर ब्याज दरों में कटौती से ऋण लेने वालों के लिए राहत का संकेत गया तो दूसरी ओर बाजारों में तरलता बढ़ाने से ब्याज दरों पर वास्तविक न्यूनता का असर दिखने की संभावना और मजबूत हो गई. इस नीति का असर घरेलू निवेश, उपभोक्ता खर्च, सरकारी उधारी कार्यक्रम और रोजगार आधारित क्षेत्रों पर दिखाई देगा.
महंगाई में नरमी से नीति बनाने में मिला संतुलन
वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में सबसे बड़ा समर्थन केंद्रीय बैंक को महंगाई के मोर्चे से मिलता दिखाई दिया. अक्टूबर और नवंबर के आंकड़ों में खुदरा मुद्रास्फीति ऐतिहासिक निचले स्तरों के आसपास रही. खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट का सीधा लाभ सामान्य खुदरा मूल्य सूचकांक को मिला. वहीं कोर महंगाई, जिसमें खाद्य और ईंधन शामिल नहीं होते, वह भी दबावमुक्त दिखाई दी.
केंद्रीय बैंक की पिछली दो नीतियों के अनुमानों की तुलना में यह स्थिति काफी अनुकूल थी. यह भी तथ्य सामने आया कि आगामी वित्त वर्ष में खुदरा मुद्रास्फीति 2 प्रतिशत के करीब रह सकती है, जो भारतीय आर्थिक इतिहास में विलक्षण आंकड़ा माना जाएगा. हालांकि यह लक्ष्य भविष्य की अनिश्चितताओं के कारण लचीला है, लेकिन इसका संकेत यह स्पष्ट है कि महंगाई फिलहाल जोखिम पैदा नहीं कर रही.
रेपो रेट कटौती और ओएमओ का संयुक्त प्रभाव
मौद्रिक नीति की सबसे महत्वपूर्ण घोषणा रही ओपन मार्केट परचेज ऑपरेशन. इस घोषण ने स्पष्ट संकेत दिया कि केंद्रीय बैंक केवल ब्याज दर में बदलाव करके राहत नहीं देना चाहता, बल्कि यह चाहता है कि बैंकिंग प्रणाली में नकदी का प्रवाह बढ़े. जब लिक्विडिटी का स्तर ऊंचा होगा, तब बैंकों पर फंडिंग लागत कम करने का दबाव स्वतः पड़ेगा. यही कारण है कि होम लोन, ऑटो लोन और एमएसएमई ऋण के ब्याज दरों में तेजी से बदलाव होने की संभावना बढ़ गई है.
इसका दूसरा प्रभाव सरकारी उधारी कार्यक्रम पर होगा. जब बाजार में तरलता अधिक होगी, तब सरकारी बॉण्ड की मांग बढ़ेगी. इससे बॉण्ड यील्ड घटेगी और सरकार को अपेक्षाकृत कम लागत पर फंडिंग मिल सकेगी.
होम लोन ग्राहकों के लिए राहत और सेविंग्स पर दबाव
पिछले कुछ महीनों में ऋण दरों में तेज वृद्धि ने गृह ऋण धारकों और छोटे व्यवसायों पर बोझ बढ़ाया था. नई नीति इस स्थिति को उलटने की शुरुआत हो सकती है. घर खरीदने वाले उपभोक्ताओं को ईएमआई में कमी देखने को मिलेगी, खासकर उन लोगों को जो फ्लोटिंग ब्याज दर पर ऋण लिए हुए हैं. वहीं व्यापार क्षेत्र में नई कार्यशील पूंजी लागत में कमी आ सकती है.
दूसरी ओर इससे बचत खातों, सावधि जमा और लघु निवेश योजनाओं पर ब्याज दरों में कमी दर्ज हो सकती है. इसीलिए बैंकिंग उपभोक्ताओं के लिए यह संतुलित स्थिति है. जहां एक वर्ग को राहत मिलेगी वहीं दूसरा वर्ग प्रतिफल में गिरावट महसूस कर सकता है.
इकोनॉमी में संकेतों का मूल्यांकन
दूसरी तिमाही के जीडीपी आंकड़े मजबूत रहे और विकास दर 8.2 प्रतिशत के स्तर पर दिखाई दी. इससे पहले की तिमाही से वृद्धि बेहतर थी. निजी निवेश में बढ़ोतरी की गति दिख रही है. हालांकि यह तेजी स्थायी रहे इसके लिए लंबे समय तक स्थिर और कम ब्याज दरों की आवश्यकता है. यही वह कारण है जिसके आधार पर केंद्रीय बैंक ने अभी ढीली नीति को विकल्प के रूप में बनाए रखा.
केंद्रीय बैंक ने निर्माण, निर्यात और उपभोक्ता मांग के कुछ संकेतकों में प्रारंभिक कमजोरी का मूल्यांकन किया है. इसका सीधा अर्थ यह है कि आर्थिक गतिविधियां स्थिर हैं लेकिन मजबूत गति बनाए रखने के लिए नीति आधारित समर्थन जरूरी है.
बाजारों पर संभावित प्रभाव
इस नीति के बाद इक्विटी बाजारों में तेजी की संभावना बनी रहेगी. तरलता बढ़ने से निवेशकों का भरोसा मजबूत होता है. हालांकि वैश्विक परिस्थितियों, अमेरिकी फेड नीति, कच्चे तेल की कीमत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े संकेतों का असर भी घरेलू बाजार पर रहेगा. बॉन्ड मार्केट में यील्ड घटने की संभावना उच्च है जिससे कॉर्पोरेट उधारी लागत कम होगी.
एमएसएमई उद्योगों के पुनरुद्धार में यह बड़ा कदम साबित हो सकता है. वित्तीय सहायता सस्ती होने से उत्पादन, वितरण और रोजगार में तेजी की संभावनाएं हैं.
निष्कर्ष
ब्याज दरों में कमी केवल एक मौद्रिक नीति निर्णय नहीं बल्कि एक संकेत है. यह संकेत निवेश विस्तार, उपभोग वृद्धि, बजट प्रबंधन और आर्थिक चक्रों की गति से सीधा संबंध रखता है. महंगाई में नरमी और स्थिर विकास दर मिलकर इस समय नीति परिवर्तन का सही अवसर प्रस्तुत कर रही हैं. यदि अगले महीनों में बैंकिंग तंत्र तेजी से इस लाभ को बाजार तक पहुंचाता है, तो अर्थव्यवस्था को इसके प्रबल परिणाम देखने को मिलेंगे.
