भारत में नोटों और सिक्कों की विश्वसनीयता को लेकर समय-समय पर तरह-तरह की अफवाहें फैलती रहती हैं। कभी किसी सिक्के को बंद घोषित कर दिया गया बताया जाता है, कभी कहा जाता है कि पुराने सिक्के अब किसी काम के नहीं या दुकानदार उन्हें नहीं ले रहे। इन सब कहानियों के बीच आम नागरिक का विश्वास डगमगा जाता है। ठीक यही वह अवसर है, जहां एक संस्थान के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक का दायित्व बढ़ जाता है कि वह देश के लोगों को सटीक और स्पष्ट जानकारी दे।

पिछले कुछ दिनों में देश-भर के लोगों तक एक महत्वपूर्ण संदेश पहुँचाया गया, जिसमें बताया गया कि भारत में प्रचलित प्रत्येक मूल्यवर्ग का सिक्का आज भी वैध है और उन्हें किसी भी प्रकार की अफवाह से जोड़कर अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
सिक्कों पर अविश्वास क्यों उत्पन्न होता है?
अक्सर छोटे मूल्यवर्ग के सिक्कों पर संशय इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि समय के साथ उनके डिज़ाइन बदलते हैं। कई बार धातु की गुणवत्ता, चमक, आकार या वजन में परिवर्तन होता है। लोग देखते हैं कि एक ही मूल्य का सिक्का दो या तीन अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है और यह पूछना शुरू कर देते हैं—“आखिर कौन-सा सही है?”
दूसरी ओर, व्यापारियों का रवैया भी इस समस्या को बढ़ाता रहा है। कई दुकानों, पेट्रोल पंपों, दवा दुकानों या छोटे खुदरा आउटलेटों पर ग्राहक तब परेशान होते हैं जब दुकानदार कह देता है कि “50 पैसे” या “1 रुपये” का सिक्का नहीं लिया जाएगा। यह स्थिति आम नागरिकों और सिक्का प्रणाली के बीच दूरी पैदा कर देती है।
ऐसे समय में जब डिजिटल लेन-देन लगातार बढ़ रहा है, सिक्कों की विश्वसनीयता बचाए रखना आवश्यक हो जाता है। यही कारण है कि रिज़र्व बैंक द्वारा लोगों को यह संदेश भेजा गया कि वे अपने सिक्कों पर विश्वास रखें और उन्हें बिना संकोच स्वीकार करें।
आरबीआई की स्पष्ट घोषणा और संपूर्ण जानकारी
भारतीय रिज़र्व बैंक ने नागरिकों को यह बताया कि—
- 50 पैसे,
- 1 रुपये,
- 2 रुपये,
- 5 रुपये,
- 10 रुपये,
- 20 रुपये
मूल्यवर्ग के सभी सिक्के देश में वैध मुद्रा हैं और उनका प्रचलन जारी है।
इस संदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि सिक्कों के डिज़ाइन समय-समय पर बदलते रहते हैं, लेकिन मूल्यवर्ग वही रहता है। भारत में हर नए सिक्के के डिजाइन का निर्णय एक व्यवस्थित प्रक्रिया से होकर गुजरता है। मंत्रालयों की बैठकें होती हैं, धातु चयन किया जाता है, सांकेतिक चिन्ह तय किए जाते हैं और उसके बाद ही किसी सिक्के का नया रूप जारी किया जाता है।
जब किसी सिक्के की ढलाई वर्षों तक होती रहती है, तो स्वाभाविक रूप से उस सिक्के के कई स्वरूप बाज़ार में दिखाई देते हैं। उदाहरण के तौर पर, 10 रुपये का सिक्का पहले पीतल-सा पीला था, फिर दो धातुओं का बना—पीले और सफेद रंग का, और बाद में उसके डिज़ाइन में छोटे-मोटे बदलाव किए गए।
लोगों ने यह समझना शुरू कर दिया कि पुराने सिक्के बंद हो चुके हैं, जबकि ऐसा नहीं था।
सभी सिक्के लीगल टेंडर क्यों हैं?
सिक्का हो या नोट—देश में प्रचलन में मौजूद मुद्रा को “वैध भुगतान माध्यम” माना जाता है। इसे ही लीगल टेंडर कहा जाता है। जब तक भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्र सरकार या वित्त मंत्रालय आधिकारिक रूप से घोषणा न कर दें कि कोई मुद्रा अब प्रचलन में नहीं है, तब तक वह मुद्रा पूरी तरह वैध रहती है।
इसलिए, यदि कोई दुकानदार आपको कहता है कि—
“यह सिक्का काम का नहीं है”
या
“यह पुराना डिज़ाइन है, इसलिए नहीं लेंगे”
तो वह बिना आधार के इनकार कर रहा होता है।
आरबीआई ने नागरिकों को सलाह दी है कि वे ऐसे मामलों में जानकारी रखने वाले नागरिक की भूमिका निभाएं, दुकानदारों को समझाएं और सिक्कों को वापस लेने से न हिचकिचाएं।
50 पैसे के सिक्के पर विशेष चर्चा
भारत में 50 पैसे का सिक्का भले ही कम दिखाई देता है, लेकिन वह अभी भी प्रचलन में है। बहुत से लोग यह मान चुके हैं कि यह सिक्का बंद कर दिया गया है, परंतु यह दावा पूरी तरह गलत है।
जिस प्रकार मुद्रा प्रणाली में कम मूल्यवर्ग धीरे-धीरे दुर्लभ होने लगते हैं, उसी प्रकार 50 पैसे का सिक्का भी कम दिखाई देता है। यह बाज़ार में कम उपलब्ध है, लेकिन इसका कानूनी दर्जा आज भी वैसा ही है।
ऐसे सिक्के आमतौर पर ट्रांसपोर्ट किराए, स्कूल स्टोर्स, छोटे व्यापारियों, दूध बूथों और डाकघरों में उपयोग किए जाते रहे हैं।
सामान्य दुकानदारों में इसे स्वीकार करने की प्रवृत्ति कम हुई है, परंतु आरबीआई ने यह स्पष्ट किया कि इसे अस्वीकार करना अनुचित है।
सिक्कों की ढलाई और वितरण की प्रक्रिया
हर सिक्के की यात्रा लंबी होती है। पहले उसका डिज़ाइन तैयार होता है—उसमें महत्त्वपूर्ण प्रतीक, मूल्य, वर्ष, धातु मिश्रण और किनारों की उभार तय की जाती है। इसके बाद सिक्के हिंदुस्तान टकसालों में ढाले जाते हैं।
ये टकसालें मुंबई, हैदराबाद, कोलकाता और नोएडा में स्थित हैं। सिक्कों को ढालने के बाद वे रिज़र्व बैंक की संबद्ध संस्थाओं तक भेजे जाते हैं। वहाँ से विभिन्न बैंक शाखाओं के माध्यम से जनता तक पहुँचते हैं।
इस प्रक्रिया को अत्यंत सुरक्षित, निष्पक्ष और वैज्ञानिक माना जाता है।
जनता को सटीक जानकारी क्यों आवश्यक?
देश में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण अफवाहें बहुत जल्दी फैलने लगी हैं। कोई संदेश यह कहते हुए आता है कि—
“10 रुपये के सिक्के का यह डिजाइन नकली है…”
या
“पुराने सिक्के अब नहीं चलेंगे…”
जनता बिना पुष्टि किए बात को आगे बढ़ा देती है।
आरबीआई ने कहा कि किसी भी स्थिति में सिक्कों के संबंध में असत्य जानकारी को साझा न करें।
बुकलेट, SMS, व्हाट्सऐप अपडेट, बैंक शाखाओं में लगे पोस्टर, मुद्रा संरक्षण अभियान—इन सभी माध्यमों से आरबीआई लोगों को जागरूक करता रहा है।
आर्थिक व्यवस्था में सिक्कों का योगदान
सिक्के सिर्फ छोटे मूल्य के साधन नहीं होते। वे प्रत्यक्ष बाजार में विनियम का आधार होते हैं। देश में रोजाना करोड़ों लेन-देनों में सिक्कों की भूमिका होती है। रेलवे टिकट, बस टिकट, दूध बिक्री, सब्जी बाजार, धार्मिक स्थलों पर दान, छोटे दुकानों में खरीददारी—इन सब में सिक्कों का ही उपयोग होता है।
जब सिक्का-प्रणाली पर भरोसा बना रहता है, तब छोटे व्यापारियों की आय संरक्षित रहती है। इसीलिए रिज़र्व बैंक द्वारा दिया गया संदेश अर्थव्यवस्था के सबसे आधारभूत स्तर तक असर डालता है।
आगे क्या अपेक्षित है?
भारतीय जनता को आर्थिक संवेदनशीलता को समझना होगा। अफवाहों पर विश्वास करने के बजाय आधिकारिक स्रोतों की जानकारी देखनी चाहिए। सिक्कों को अस्वीकार करने का भाव केवल सामान्य नागरिक नुकसान में डालता है।
साथ ही सभी व्यापारिक प्रतिष्ठान, खुदरा दुकानदार, ऑटो-रिक्शा चालक, किराना व्यापारी, सब्जी विक्रेता इत्यादि यदि इन संदेशों को अपनाते हैं, तो सिक्का प्रणाली और अधिक मजबूत होगी।
