रणवीर सिंह की हालिया रिलीज फ़िल्म ‘धुरंधर’ इस समय थिएटरों में धूम मचा रही है। फिल्म में भले कहानी भारत-पाकिस्तान की राजनीतिक और आतंककारी परिस्थितियों से जुड़ी प्रतीत होती है, लेकिन इसकी पूरी आत्मा एक ऐसे किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है जिसने पर्दे पर सबसे अधिक दहशत पैदा की—अक्षय खन्ना। अक्षय इस फिल्म में निभा रहे हैं रहमान बलूच उर्फ रहमान डकैत। इस किरदार की झलक मात्र ही दर्शक को बेचैन कर देती है। पर सच तो यह है कि इसकी वास्तविक कहानी पर्दे से कहीं ज्यादा भयानक है।

कराची का इलाका जिसे दुनिया भूल भी नहीं पा रही
कराची का ल्यारी इलाका पिछले लगभग छह दशकों तक अपराध, गैंग-वार, टारगेट किलिंग और ड्रग-स्मगलिंग के लिए जाना जाता रहा। यही वह जगह है जहाँ हर आवाज थमी हुई लगती थी। रात के सन्नाटे में किसी गोली की आवाज अक्सर किसी का जीवन समाप्त कर देती थी। इतना खतरनाक माहौल था कि लोग घरों से निकलना टालते थे।
इसी धरती पर जन्मा था एक बच्चा—
1979 में मोहम्मद दादल, जो खुद सबसे बड़े गैंगस्टर्स में गिना जाता था, के घर एक बेटा पैदा हुआ।
नाम रखा गया — अब्दुर्रहमान, जो आगे चलकर ‘रहमान डकैत’ नाम से पाकिस्तान की अपराध-कथा में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
बचपन जिसने इंसान का भाव छीनकर दानव बना दिया
रहमान की उम्र जब मुश्किल से 13-14 वर्ष की थी तभी घर में पहली बड़ी घटना हुई। पिता की हत्या कर दी गई। यह हत्या किसने की—यह रहमान को वर्षों चलते-चलते समझ में आया। लेकिन उससे भी ज्यादा दर्दनाक था आगे होने वाला सच।
मां की हत्या: अपराध का सबसे बेरहम अध्याय
मीडिया रिपोर्ट्स, पाकिस्तान पुलिस रिकॉर्ड्स और स्थानीय पत्रकारों की लिखी कहानियों में उल्लेख मिलता है कि रहमान ने मात्र 15 साल की उम्र में अपनी मां—खदीजा बीबी की हत्या कर दी।
हत्याकांड का घटनाक्रम कुछ इस प्रकार बताया जाता है—
- मां का संबंध उसी व्यक्ति से जुड़ गया था जिसने रहमान के पिता को खत्म किया था।
- रहमान को यह रहस्य पता लगा।
- उसके भीतर वही हिंसक प्रवृत्ति जन्म ले चुकी थी जो ल्यारी के बच्चों के संस्कारों का हिस्सा बनती चली जाती थी।
कहते हैं—
पहले उसने गोलियां चलाईं, फिर मां का गला रेत दिया, और फिर शव को दफना दिया।
इस वारदात के बाद उसके नाम की चर्चा पूरे कराची में फैलती चली गई। सिर्फ 15 साल में हत्या—वह भी अपनी ही मां की। यही वह घटना थी जिसने रहमान को “रहमान डकैत” में तब्दील कर दिया।
हाजी लालू गैंग और रहमान का उभार
90 के दशक के आखिर में रहमान शामिल हुआ हाजी लालू के गैंग में।
यह वही गैंग था जो कराची के बड़े हिस्से में वसूली, ड्रग्स, करप्शन और किलिंग की परछाईं जैसा फैला हुआ था।
2001 में लालू की गिरफ्तारी के बाद—
इस गैंग की बागडोर रहमान के हाथ में आ गई।
सायद किसी अपराधी के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है—
उसका डर सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया जाए।
और रहमान के साथ यही हुआ।
असली सत्ता-खेल की शुरुआत
साल 2004 में रहमान ने उस इकबाल नामक गैंगस्टर को भी खत्म कर दिया, जिसके कारण उसके पिता मारे गए थे।
यह घटना प्रतिशोध के अध्याय का अंत थी।
लेकिन इसके बाद शुरू हुआ राजनीतिक खेल।
जैसे-जैसे अपराध बढ़ता गया…
वैसे-वैसे नेताओं को रहमान की “जरूरत” महसूस होने लगी।
उसकी गैंग राजनीतिक गतिविधियों के दौरान चुनावी भीड़-प्रबंधन का जिम्मा लेने लगी।
इसी दौरान उसका नाम पहली बार पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की गतिविधियों से जुड़ा।
भुट्टो की जान बचाने वाला अपराधी
साल 2007—
बेनजीर भुट्टो निर्वासन से पाकिस्तान लौटीं।
कराची में उनका विशाल रोड शो होने वाला था।
उस समय कराची में दो नाम सबसे ताकतवर थे—
- बेनजीर भुट्टो (राजनीति में)
- रहमान बलोच (अपराध में)
और हैरानी की बात यह—
भुट्टो की सुरक्षा रहमान को ही दी गई।
रैली के दौरान हुआ बम-ब्लास्ट।
दर्जनों लोग मारे गए, सैकड़ों घायल हुए।
उन क्षणों में रहमान आगे आया…
बेनजीर को ट्रक की ऊपरी सीढ़ियों से नीचे उतारा
अपनी गाड़ी में बिठाया
और बिलावल हाउस तक सुरक्षित पहुंचा दिया।
यहीं से उसका अपराध राजनीतिक सुरक्षा-छत्र में समा गया।
रहमान का सत्ता-सिंहासन
2008 के चुनाव में पीपीपी सरकार बनी।
रहमान को पार्टी के सहयोगी संगठन पीपुल्स अमन कमेटी का प्रमुख बनाया गया।
फायदे:
✔ गैंग को हथियारों का नियंत्रण मिला
✔ पुलिस निगरानी कमजोर हुई
✔ ड्रग्स रूट सुरक्षित हो गया
✔ पैसों की आमद बढ़ गई
और नुकसान:
❌ सत्ता को समझ आ गया कि वे जिस दानव को पाल रहे हैं
वह एक दिन उन्हें निगल भी सकता है।
असुरक्षा-भाव शुरू हुआ और
अब रहमान के खिलाफ पहला गुप्त अभियान तैयार हुआ।
कराची पुलिस को आधिकारिक निर्देश मिले—
“इसे रास्ते से हटाओ”
और 9 अगस्त 2009 को
पाकिस्तानी पुलिस ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की—
“रहमान डकैत का एनकाउंटर कर दिया गया”
लेकिन कई पत्रकारों का कहना है—
यह एक राजनीतिक रणनीति थी
ताकि चुनाव में पीपीपी को नुकसान न हो।
धुरंधर में दिखा असली क्रूरता का सिनेमाई रूप
“धुरंधर” में कई घटनाओं को रूपांतरित किया गया है, लेकिन कुछ दृश्य अत्यंत वास्तविक लगते हैं—
विशेषकर मां-हत्या-वाला अनुच्छेद
जो फिल्म में थोड़े कलात्मक बदलावों के साथ दिखाया गया है।
अक्षय खन्ना के अभिनय ने रहमान को दर्शक-मन में बसा दिया है,
लेकिन वास्तविक रहमान के सामने फिल्म वाला किरदार अधूरा पड़ता है।
रहमान के जीवन के 7 अंधे पड़ाव जिन्हें फिल्म नहीं दिखा पाई
- उसकी गैंग ने सैकड़ों युवाओं को हथियार थमाए
- कराची विश्वविद्यालय के छात्रों तक ड्रग नेटवर्क पहुंचाया
- 90 से ज्यादा किलिंग रिकॉर्डेड बताई जाती हैं
- पुलिस स्टेशनों पर हमले करवाए
- सरकारी लोगों की उड़ा दी गई थी उंगलियां
- जमीन कब्जाने के रैकेट चलाए
- मौत के बाद उसका इलाका अब भी खौफ में जीता रहा
मृत्यु के बाद—रहमान “दलित-महानायक” बन गया
ल्यारी के कुछ इलाके आज भी रहमान की तस्वीरें दीवारों पर लगाते हैं।
कुछ लोग कहते हैं—
“उसने गरीबों को पैसा दिया”
“उसने दुश्मनों से सुरक्षा दी”
जबकि दूसरी तरफ लोग कहते हैं—
“वह राक्षसी प्रवृत्ति का मालिक था”
निष्कर्ष का सच
रहमान की जिंदगी एक ऐसी कहानी है—
जहाँ किसी के बचपन ने उसे अपराधी बना दिया
जहाँ राजनीति ने अपराध की ढाल बनाई
जहाँ सुरक्षा की कीमत लोगों की मौत से चुकाई गई
धुरंधर सिर्फ फिल्म है
लेकिन रहमान डकैत—
किसी देश की अपराध-संस्कृति की जड़ में बैठा हुआ एक सच है
जिसका असर कराची आज भी भुगत रहा है।
