भारतीय क्रिकेट एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां एक फैसले ने पूरे भविष्य की दिशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। न्यूजीलैंड के खिलाफ घरेलू वनडे सीरीज में मिली अप्रत्याशित और ऐतिहासिक हार ने न सिर्फ टीम इंडिया के प्रदर्शन को कटघरे में खड़ा किया है, बल्कि कप्तानी को लेकर भी एक गहरी बहस को जन्म दे दिया है। यह बहस सिर्फ एक सीरीज की हार तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर 2027 के वनडे विश्व कप की तैयारी, टीम के नेतृत्व, अनुभव और रणनीति से जुड़ गई है।

न्यूजीलैंड के खिलाफ यह हार इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि भारतीय टीम ने पहली बार अपनी ही धरती पर कीवी टीम से वनडे सीरीज गंवाई। घरेलू परिस्थितियों में भारतीय टीम को हमेशा मजबूत माना जाता रहा है, ऐसे में यह नतीजा फैंस, पूर्व खिलाड़ियों और क्रिकेट विशेषज्ञों के लिए चौंकाने वाला साबित हुआ। इसी हार के बाद टीम की कमान संभाल रहे शुभमन गिल की कप्तानी पर सवाल उठने लगे हैं और पूर्व क्रिकेटरों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।
इस पूरी बहस के केंद्र में दो नाम हैं। एक ओर मौजूदा वनडे कप्तान शुभमन गिल, जिन्हें अक्टूबर 2025 में रोहित शर्मा की जगह यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी, और दूसरी ओर अनुभवी रोहित शर्मा, जिन्होंने लंबे समय तक भारतीय टीम का नेतृत्व किया और बड़े टूर्नामेंट्स में टीम को सफलता की राह दिखाई। पूर्व भारतीय बल्लेबाज मनोज तिवारी ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखी है और बीसीसीआई से यह मांग की है कि 2027 विश्व कप से पहले रोहित शर्मा को फिर से वनडे टीम का कप्तान बनाया जाना चाहिए।
मनोज तिवारी का मानना है कि कप्तानी सिर्फ एक पद नहीं होती, बल्कि यह अनुभव, रणनीति और दबाव में सही फैसले लेने की क्षमता का मेल होती है। उनके अनुसार, शुभमन गिल एक बेहतरीन प्रतिभाशाली बल्लेबाज हैं, लेकिन कप्तानी का अतिरिक्त बोझ उनके खेल और टीम दोनों पर असर डाल रहा है। तिवारी का यह भी कहना है कि गिल को अभी अपने खेल को और निखारने की जरूरत है और कप्तानी की जिम्मेदारी उन्हें इस प्रक्रिया से भटका सकती है।
जब अक्टूबर 2025 में रोहित शर्मा से वनडे कप्तानी ली गई और यह जिम्मेदारी शुभमन गिल को सौंपी गई, तब इसे भविष्य की तैयारी के तौर पर देखा गया। चयनकर्ताओं और प्रबंधन का मानना था कि युवा कप्तान को समय देकर 2027 विश्व कप तक एक मजबूत लीडर तैयार किया जा सकता है। लेकिन गिल की कप्तानी में अब तक का सफर उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा है। भारत ने उनकी अगुआई में दो वनडे सीरीज खेली हैं और दोनों में हार का सामना करना पड़ा है। पहले ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ और अब न्यूजीलैंड के खिलाफ मिली हार ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह प्रयोग सही समय पर किया गया था।
मनोज तिवारी ने अपनी बातचीत में यह भी कहा कि रोहित शर्मा को कप्तानी से हटाने की कोई ठोस वजह नजर नहीं आती। उनके मुताबिक, चैंपियंस ट्रॉफी जीतने के बाद भारतीय टीम सही लय में थी और उस समय कप्तानी में बदलाव करना एक जोखिम भरा फैसला साबित हुआ। तिवारी का मानना है कि अगर न्यूजीलैंड सीरीज में भी रोहित शर्मा कप्तान होते, तो नतीजा कुछ और हो सकता था। उनका यह बयान अनुभव और हालिया प्रदर्शन के बीच संतुलन की अहमियत को रेखांकित करता है।
रोहित शर्मा का नाम भारतीय क्रिकेट में सिर्फ एक बल्लेबाज के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक सफल कप्तान के रूप में भी लिया जाता है। उन्होंने सीमित ओवरों के क्रिकेट में भारत को कई अहम जीत दिलाई हैं और बड़े मैचों में टीम को संभालने की क्षमता दिखाई है। उनके नेतृत्व में टीम ने न सिर्फ रणनीतिक मजबूती दिखाई, बल्कि खिलाड़ियों को खुलकर खेलने की आज़ादी भी दी। यही वजह है कि कई पूर्व खिलाड़ी और विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़े टूर्नामेंट्स, खासकर विश्व कप जैसे मंच पर अनुभव की अहमियत युवा जोश से कहीं ज्यादा होती है।
मनोज तिवारी ने तो यहां तक कहा है कि अगर रोहित शर्मा को फिर से कप्तानी सौंपी जाती है, तो भारत के 2027 विश्व कप जीतने की संभावना 85 से 90 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। यह आंकड़ा भले ही एक अनुमान हो, लेकिन इसके पीछे उनका तर्क साफ है। रोहित शर्मा ने न सिर्फ कप्तान के तौर पर सफलता हासिल की है, बल्कि दबाव में सही फैसले लेने की उनकी क्षमता भी साबित हुई है। तिवारी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह यह नहीं कह रहे कि शुभमन गिल भविष्य में सफल कप्तान नहीं बन सकते, लेकिन वर्तमान समय में तुलना की जाए तो अनुभव और उपलब्धियों के मामले में रोहित कहीं आगे हैं।
इस पूरी चर्चा का एक अहम पहलू यह भी है कि कप्तानी का दबाव युवा खिलाड़ियों के प्रदर्शन को कैसे प्रभावित करता है। शुभमन गिल को भारतीय क्रिकेट का भविष्य माना जाता है। उनकी बल्लेबाजी तकनीक, संयम और बड़े स्कोर बनाने की क्षमता उन्हें खास बनाती है। लेकिन जब एक युवा खिलाड़ी पर कप्तानी की जिम्मेदारी डाल दी जाती है, तो उससे उसके स्वाभाविक खेल पर असर पड़ सकता है। मनोज तिवारी का मानना है कि गिल को फिलहाल एक बल्लेबाज के तौर पर खुद को और मजबूत करना चाहिए, ताकि आने वाले वर्षों में वह बिना किसी अतिरिक्त दबाव के टीम के लिए योगदान दे सकें।
न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरीज में भारतीय टीम के प्रदर्शन ने भी कई सवाल खड़े किए हैं। गेंदबाजी और बल्लेबाजी दोनों ही विभागों में टीम संघर्ष करती नजर आई। महत्वपूर्ण मौकों पर सही फैसलों की कमी दिखाई दी, चाहे वह टीम संयोजन हो या मैच के दौरान रणनीति में बदलाव। आलोचकों का मानना है कि अनुभवी कप्तान ऐसे मौकों पर टीम को बेहतर तरीके से संभाल सकता है। यही कारण है कि कप्तानी का मुद्दा अब सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी टीम की दिशा और मानसिकता से जुड़ गया है।
2027 का वनडे विश्व कप अभी भले ही दूर नजर आता हो, लेकिन उसकी तैयारी का समय अभी से शुरू हो चुका है। बड़े टूर्नामेंट्स में सफलता अचानक नहीं मिलती, बल्कि इसके लिए वर्षों की योजना, स्थिर नेतृत्व और स्पष्ट रणनीति की जरूरत होती है। मनोज तिवारी का कहना है कि अभी भी समय है और बीसीसीआई को सही दिशा में कदम उठाना चाहिए। उनके अनुसार, अगर बोर्ड अभी निर्णय लेता है और अनुभवी कप्तान को जिम्मेदारी सौंपता है, तो टीम को एक मजबूत ढांचा मिल सकता है।
इस बहस में एक और महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या द्विपक्षीय सीरीज के नतीजों को विश्व कप की तैयारी से जोड़कर देखा जाना चाहिए। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि द्विपक्षीय सीरीज प्रयोगों के लिए होती हैं, जबकि विश्व कप जैसे टूर्नामेंट में एक स्थिर और अनुभवी टीम की जरूरत होती है। मनोज तिवारी भी इसी सोच के समर्थक नजर आते हैं। उनका कहना है कि सीरीज हारना एक बात है, लेकिन विश्व कप जीतने के लिए कप्तानी का फैसला बेहद सोच-समझकर लिया जाना चाहिए।
शुभमन गिल के समर्थकों का मानना है कि किसी भी युवा कप्तान को समय देना जरूरी होता है। दो सीरीज की हार के आधार पर किसी खिलाड़ी की नेतृत्व क्षमता पर फैसला करना जल्दबाजी हो सकती है। लेकिन दूसरी ओर, आलोचक यह तर्क देते हैं कि भारत जैसे क्रिकेट राष्ट्र में विश्व कप से पहले जोखिम उठाना भारी पड़ सकता है। इसीलिए रोहित शर्मा जैसे अनुभवी खिलाड़ी की वापसी की मांग जोर पकड़ रही है।
रोहित शर्मा की कप्तानी का एक और पहलू यह है कि वह खिलाड़ियों के साथ संवाद और माहौल बनाने में माहिर माने जाते हैं। टीम का माहौल जितना सहज होता है, उतना ही खिलाड़ी अपने प्रदर्शन में निखरते हैं। कई मौकों पर देखा गया है कि रोहित ने युवाओं को खुलकर खेलने की छूट दी और सीनियर खिलाड़ियों के अनुभव का सही इस्तेमाल किया। यही संतुलन किसी भी बड़ी टीम की पहचान होता है।
इस पूरी चर्चा के बीच बीसीसीआई की भूमिका सबसे अहम हो जाती है। बोर्ड को न सिर्फ वर्तमान प्रदर्शन, बल्कि भविष्य की रणनीति को ध्यान में रखते हुए फैसला लेना होगा। कप्तानी का फैसला भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि आंकड़ों, अनुभव और टीम की जरूरतों को देखकर किया जाना चाहिए। मनोज तिवारी जैसे पूर्व खिलाड़ियों की राय इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का अनुभव लिया है और टीम की मानसिकता को समझते हैं।
भारतीय क्रिकेट का इतिहास गवाह है कि जब भी नेतृत्व में स्पष्टता और स्थिरता रही है, टीम ने बड़े मंच पर शानदार प्रदर्शन किया है। चाहे वह 2011 का विश्व कप हो या उसके बाद के कई बड़े टूर्नामेंट्स, अनुभव और रणनीति ने अहम भूमिका निभाई है। 2027 विश्व कप को देखते हुए यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि क्या टीम इंडिया एक बार फिर अनुभव को तरजीह देगी या भविष्य के नाम पर जोखिम उठाएगी।
फिलहाल, न्यूजीलैंड के खिलाफ मिली हार ने इस बहस को तेज कर दिया है। फैंस सोशल मीडिया पर अपनी-अपनी राय रख रहे हैं। कुछ लोग रोहित शर्मा की वापसी को सही कदम मानते हैं, तो कुछ शुभमन गिल को समय देने की बात कर रहे हैं। यह बहस आने वाले दिनों में और गहरी हो सकती है, खासकर तब जब टीम इंडिया अगली सीरीज में मैदान पर उतरेगी।
अंततः यह फैसला चयनकर्ताओं और बीसीसीआई के हाथ में है कि वे किस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। मनोज तिवारी की सलाह साफ है कि अभी भी समय है और अनुभवी कप्तान के साथ 2027 विश्व कप की तैयारी को मजबूत किया जा सकता है। वहीं, शुभमन गिल के लिए यह समय आत्ममंथन का हो सकता है, जहां वह कप्तानी के दबाव से उबरकर अपने खेल पर फोकस करें।
भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिहाज से यह दौर बेहद अहम है। एक गलत फैसला सालों की मेहनत पर पानी फेर सकता है, जबकि एक सही कदम टीम को इतिहास रचने का मौका दे सकता है। अब देखना यह है कि बोर्ड इस बहस से क्या निष्कर्ष निकालता है और टीम इंडिया किस नेतृत्व में 2027 विश्व कप की ओर बढ़ती है।
