पूर्वी यूरोप में चल रहा सैन्य संघर्ष अपने नए और निर्णायक चरण में पहुंच चुका है। रूस ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि यूक्रेन अपनी सेना को डोनबास क्षेत्र से वापस नहीं बुलाता, तो रूस उस पर बलपूर्वक कब्जा कर लेगा। यह बयान ऐसे समय में दिया गया जब वार्ता के नए दौर की उम्मीदें पहले से ही कमजोर पड़ चुकी थीं। युद्ध की शुरुआत वर्ष 2022 में हुई थी, लेकिन इसकी नींव कई साल पहले से रखी जा चुकी थी। डोनबास में मूल रूप से डोनेट्स्क और लुहान्स्क क्षेत्र शामिल हैं, जहां लंबे समय से रूस समर्थित गुट और यूक्रेनी सेना आमने-सामने रही हैं।

रूसी पक्ष का दावा है कि डोनबास को वह एक स्वतंत्र क्षेत्र मानता है और यूक्रेन द्वारा सैन्य कार्रवाई को रुकवाना उसका प्रारंभिक उद्देश्य है। वहीं यूक्रेन का कहना है कि यह उसका ऐतिहासिक भूभाग है, जिसे वह किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ सकता। अब यह संघर्ष केवल भूभाग का मामला नहीं रह गया, बल्कि यह पूरे पूर्वी यूरोप की नई भू-राजनीतिक रेखाओं को प्रभावित कर रहा है।
रूस की चेतावनी और युद्ध समाप्ति पर असहमति
रूस की ओर से बयान जारी किया गया कि डोनबास को या तो यूक्रेन स्वयं खाली करे या फिर रूस बलपूर्वक उसे अपने नियंत्रण में ले लेगा। इसके अतिरिक्त रूस ने किसी भी तरह के समझौते से पीछे हटने की घोषणा की। रूस का यह रवैया इस बात का संकेत भी है कि वह अब संघर्ष को आधे रास्ते में छोड़ना नहीं चाहता।
रूस ने यह भी संकेत दिया कि वह इस क्षेत्र को मुक्त कराना अपनी रणनीतिक जिम्मेदारी के रूप में देखता है। एक ओर रूस इस क्षेत्र को अपनी सुरक्षा का भविष्य मानता है, वहीं यूक्रेन इसे अपनी संप्रभुता की जड़ों में शामिल करता है। इसी विरोधाभास ने वार्ता को कठिन बना दिया।
यूक्रेन का रुख बेहद सख्त
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने जवाब देते हुए कहा है कि उनकी सरकार किसी भी हालत में डोनबास क्षेत्र को रूसी पक्ष को नहीं सौंपेगी। जेलेंस्की के अनुसार, यदि ऐसा हुआ तो यह उन हजारों सैनिकों, नागरिकों और पूरे संघर्ष की आत्मा का अपमान होगा जो वर्षों से इस संघर्ष में शामिल रहे हैं।
जेलेंस्की के अनुसार, भूमि सौंपना केवल भूगोल बदलना नहीं होगा, बल्कि इससे आने वाली पीढ़ियों की सामरिक सुरक्षा का संतुलन भी बिगड़ेगा। इसी विरोधाभासी दृष्टिकोण के चलते विश्व शक्तियों के लिए स्थिति मध्यस्थता की राह भी जटिल हो चुकी है।
वर्तमान सैन्य कब्जे का आकलन
रूस वर्तमान समय में यूक्रेन के लगभग पांचवे हिस्से पर नियंत्रण रखता है। यदि सैन्य भूगोल को समझने के आधार पर देखा जाए तो इसमें क्रीमिया क्षेत्र पहले से अधिगृहित माना जाता है। इसके अलावा लुहान्स्क पूरी तरह से रूस के नियंत्रण में आ चुका है जबकि डोनेट्स्क में करीब 80 प्रतिशत क्षेत्र रूस के नियंत्रण में माना जा रहा है। जापोरिज्जिया, खेरसॉन, खार्किव और सीमावर्ती जिलों में भी रूस ने एक स्थायी सैन्य उपस्थिति स्थापित कर रखी है। यूक्रेन के लिए अपनी सैन्य क्षमता को बनाए रखना दिन-प्रतिदिन चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
अमेरिका और यूरोप की भूमिका
वर्तमान परिस्थिति में अमेरिका ने शांति स्थापित करने के प्रयासों में रुचि दिखाई थी, हालांकि यह पहल अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी। यूरोपीय देशों का एक वर्ग यूक्रेन की ओर सहानुभूति दिखाता है, जबकि स्तरीय कूटनीति रूस के साथ भी चलती रहती है। यही दुविधा संघर्ष के निर्णायक समाधान में दीवार बन जाती है।
अमेरिका की ओर से चर्चाएं जारी रखने की कोशिश की गई, लेकिन रणनीतिक भूगोल और सैन्य नियंत्रण जमीन पर स्थितियों को तय कर रहा है। अब यह केवल शांति वार्ता का प्रश्न नहीं, बल्कि आगे के बीस वर्षों की सुरक्षा संरचना का निर्णायक दौर बन गया है।
रूस की भविष्य रणनीति और संभावित कदम
रूसी पक्ष संकेत दे चुका है कि उसकी भविष्य रणनीति सैन्य उपस्थिति को स्थायित्व देने पर केंद्रित है। इसके लिए रूस आधारभूत ढांचे का विस्तार कर रहा है। जिस प्रकार वर्षों से क्रीमिया को रूसी ढांचे में मिश्रित किया गया, ठीक उसी प्रक्रिया को डोनबास के साथ भी लागू किए जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
यदि ऐसा होता है तो यह केवल भूभाग विस्तार नहीं, बल्कि सैन्य वित्तीय निवेश की नई दिशा भी होगा। रूस ने डोनबास में सैन्य औद्योगिक ढांचे को विकसित करने की योजना पर भी कार्य आरंभ किया है, जिसके संकेत हालिया महीनों में देखे गए।
यूरोप की प्रतिक्रिया
यूरोप इस संघर्ष को अपने सीमा विस्तार के संदर्भ में देख रहा है। कई देश इस बात से चिंतित हैं कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो बाल्टिक देशों पर सैन्य और साइबर स्तर पर दबाव बढ़ सकता है। इस समय यूरोप की ऊर्जा निर्भरता भी एक बड़ा मुद्दा है क्योंकि युद्ध के बाद से ईंधन के लिए रीढ़ समान व्यवस्था बदल चुकी है।
निष्कर्ष
स्थिति अब पहले से अधिक जटिल हो चुकी है। एक पक्ष भूभाग को अपनी सुरक्षा का मौलिक तत्व मानता है, जबकि दूसरा उसे ऐतिहासिक संप्रभुता की नींव कहकर बचाने में लगा है। आने वाले महीनों में संघर्ष का परिणाम केवल डोनबास के सैन्य मानचित्र को नहीं, बल्कि पूरे पूर्वी यूरोप की सामरिक रणनीति को प्रभावित करेगा।
