दक्षिण एशिया बीते कुछ वर्षों से भू-राजनीतिक हलचलों के नए दौर से गुजर रहा है। आर्थिक, सामरिक और राजनयिक प्रतिस्पर्धा ने देशों के रिश्तों को लगातार प्रभावित किया है। इसमें सबसे बड़ा असर पड़ा है SAARC पर, जिसे कभी दक्षिण एशिया की एकता और सहयोग की सबसे संवेदनशील पहचान माना जाता था।

आज यही SAARC लगभग निष्क्रिय है और पाकिस्तान इसका ठीकरा भारत के सिर पर फोड़ रहा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से यह दावा किया गया कि SAARC की निष्क्रियता भारत की वजह से है और इसी कारण पाकिस्तान चीन और बांग्लादेश के साथ मिलकर एक नए क्षेत्रीय गठबंधन के निर्माण पर विचार कर रहा है।
यह घटनाक्रम महज कूटनीति नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की भविष्य रणनीतियों और शक्ति-संतुलन पर गहरा प्रभाव डालने वाला मोड़ है। इस विस्तृत रिपोर्ट में हम जांचते हैं कि SAARC क्यों टूटा, किसका कितना योगदान रहा, पाकिस्तान का नया गठबंधन क्या संकेत देता है, चीन की भूमिका कहाँ फिट होती है और भारत इससे कैसे प्रभावित हो सकता है।
SAARC: इतिहास, महत्व और पतन की असल वजहें
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) की स्थापना 1985 में हुई थी।
इसमें आठ सदस्य देश शामिल हुए—भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और अफगानिस्तान।
इसका मूल उद्देश्य था:
- आर्थिक सहयोग
- क्षेत्रीय व्यापार
- ऊर्जा सुरक्षा
- सांस्कृतिक संबंध
- राजनीतिक संपर्क
लेकिन यह संगठन भारत–पाकिस्तान रिश्तों की तल्खी के बीच पनप नहीं पाया।
2014 काठमांडू शिखर सम्मेलन के बाद ठहराव
2014 के बाद SAARC शिखर सम्मेलन नहीं हुआ।
2016 में जब इस्लामाबाद में सम्मेलन होना था, भारत ने उरी हमले के बाद इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया।
भारत के साथ अफगानिस्तान, बांग्लादेश और भूटान ने भी पाकिस्तान के खिलाफ रुख अपनाया।
इसके बाद से SAARC का भविष्य लगातार धुंधला होता गया।
पाकिस्तान का आरोप: SAARC को भारत ने रोका
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर हुसैन अन्दराबी ने हाल ही में एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा—
“भारत लगातार SAARC प्रक्रिया को बाधित कर रहा है। भारत के रवैये से यह मंच निष्क्रिय हो गया है।”
उनका दावा था कि भारत किरदार बदलकर दोष पाकिस्तान के सिर मढ़ देता है जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है।
उन्होंने यह भी कहा—
“भारत ने 1990 के दशक में भी SAARC को रोका था, और तब उसका कारण पाकिस्तान नहीं था।”
पाकिस्तान का कहना है कि SAARC आज कमजोर है क्योंकि भारत क्षेत्रीय एकता की बजाय अपने राजनीतिक एजेंडे को प्राथमिकता दे रहा है।
भारत का दृष्टिकोण: आतंकवाद के बगैर SAARC सम्भव नहीं
भारत का बार-बार यह स्पष्ट रुख रहा है कि SAARC की पुनर्स्थापना तभी हो सकती है जब क्षेत्र में आतंकवाद पर नियत्रंण हो और पाकिस्तान अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए न होने दे।
भारत का मानना है कि:
- आतंकवाद और क्षेत्रीय सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते
- पाकिस्तान विश्वसनीय नहीं है
- भारत के खिलाफ प्रायोजित कार्रवाई SAARC की भावना को नष्ट करती है
भारत के अनुसार SAARC को बचाने के लिए पाकिस्तान को अपना अतिवादी रुख बदलना होगा।
पाकिस्तान की नई चाल: चीन–बांग्लादेश के साथ नया गठबंध
SAARC के निष्क्रिय होने के बाद पाकिस्तान ने क्षेत्र में एक नया गठबंधन तैयार करने की कवायद शुरू की है।
इसका उद्देश्य है—
- भारत को अलग-थलग करना
- चीन को दक्षिण एशिया में मजबूत जगह देना
- पाकिस्तान की भू-राजनीतिक स्थिति को मजबूत करना
- एंटी-इंडिया इकोनॉमिक ब्लॉक तैयार करना
पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान ने खुलकर यह स्वीकार किया कि वह चीन की मदद से भारत को अलग रखकर एक क्षेत्रीय गुट बनाना चाहता है।
चीन का गणित: भारत को संतुलित करना और दक्षिण एशिया में प्रभाव बढ़ाना
चीन स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान के प्रस्ताव में दिलचस्पी रखता है क्योंकि—
- भारत उसका प्रमुख रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है
- वह भारत को पड़ोस में कमजोर चाहता है
- यह गठबंधन BRI को बढ़ावा देगा
- भारत की दक्षिण एशियाई नीति को चुनौती मिलेगी
चीन पहले से ही पाकिस्तान का सबसे बड़ा सामरिक, आर्थिक और राजनीतिक सहयोगी है।
एक नया ‘मिनी-एशियन ग्रुप’ चीन को दक्षिण एशिया में बड़ी जगह देगा।
बांग्लादेश की एंट्री: सबसे बड़ा आश्चर्य
इस मामले में बांग्लादेश का झुकाव पाकिस्तान और चीन की ओर होना सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत है।
बांग्लादेश के विदेशी मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन के बयान ने इस गठबंधन की हवा को और मजबूत कर दिया।
उन्होंने कहा—
“बांग्लादेश के लिए पाकिस्तान और चीन के साथ एक नए क्षेत्रीय ग्रुपिंग में शामिल होना रणनीतिक रूप से संभव है।”
यह बयान भारत–बांग्लादेश के रिश्तों पर भी नए सवाल उठाता है।
हाल के वर्षों में बांग्लादेश ने अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाने के प्रयास किए हैं—भारत, चीन और अमेरिका के बीच।
क्या दक्षिण एशिया में दो धड़े बन रहे हैं?
अगर पाकिस्तान–चीन–बांग्लादेश का गठबंधन सफल होता है तो दक्षिण एशिया में दो स्पष्ट धड़े बन सकते हैं—
पहला धड़ा – भारत, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव
दूसरा धड़ा – पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश (और संभवतः बाद में अफगानिस्तान)
यह विभाजन SAARC की पूरी मूल संरचना को नष्ट कर सकता है।
भारत के लिए संभावित प्रभाव
भारत के लिए यह स्थिति सामरिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है—
- चीन का क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ेगा
- पाकिस्तान को नई ताकत मिलेगी
- भारत का पड़ोसी-प्रथम सिद्धांत कमजोर होगा
- दक्षिण एशिया का आर्थिक वातावरण बंट जाएगा
हालाँकि भारत की आर्थिक शक्ति, बाजार का आकार, वैश्विक स्थिति और भू-राजनीतिक पहुंच कहीं अधिक व्यापक है।
इसलिए भारत पर तत्काल बड़ा खतरा नहीं, लेकिन दीर्घकाल में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
क्या SAARC का भविष्य खत्म हो चुका है?
इस समय SAARC पुनर्जीवित होने की स्थिति में नहीं है।
दो प्रमुख शक्तियों (भारत–पाकिस्तान) का टकराव ही इसके पतन का सबसे बड़ा कारण है।
जब तक विश्वास नहीं लौटता, SAARC का भविष्य धुंधला ही रहेगा।
निष्कर्ष: दक्षिण एशिया में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत
पाकिस्तान और चीन का नया क्षेत्रीय ब्लॉक भारत को घेरने की रणनीति का हिस्सा है।
बांग्लादेश का झुकाव इस गठबंधन को मजबूती दे सकता है।
SAARC अब केवल नाम का मंच रह गया है।
दक्षिण एशिया एक नए शक्ति-संतुलन की ओर बढ़ रहा है—जहाँ भारत और चीन की प्रतिस्पर्धा निर्णायक होगी।
