भारतीय क्रिकेट में प्रतिभा की कोई कमी नहीं रही है, लेकिन कई बार चयन प्रक्रिया को लेकर ऐसे सवाल उठते हैं जो खेलप्रेमियों और पूर्व खिलाड़ियों को असहज कर देते हैं। मुंबई के प्रतिभाशाली बल्लेबाज़ सरफराज खान का मामला भी कुछ ऐसा ही बनता जा रहा है। घरेलू क्रिकेट में लगातार रन बनाना, हर सीजन खुद को बेहतर साबित करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिले मौकों में उपयोगी योगदान देने के बावजूद टीम में जगह न मिलना, यह स्थिति किसी भी खिलाड़ी के लिए निराशाजनक हो सकती है।

सरफराज खान का नाम पिछले कुछ वर्षों से घरेलू क्रिकेट में निरंतर चर्चा में रहा है। रन बनाने की उनकी भूख, लंबे समय तक क्रीज पर टिकने की क्षमता और दबाव में खेलने का हुनर उन्हें खास बनाता है। इसके बावजूद चयनकर्ताओं की प्राथमिकताओं में उनका नाम बार-बार पीछे छूटता दिख रहा है।
दिग्गज की नाराज़गी और तीखी प्रतिक्रिया
पूर्व भारतीय क्रिकेटर और चयन प्रक्रिया को भीतर से देख चुके दिलीप वेंगसरकर ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी नाराज़गी जाहिर की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि सरफराज खान को जिस तरह लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है, वह समझ से परे और बेहद शर्मनाक है। वेंगसरकर का मानना है कि घरेलू क्रिकेट में लगातार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी को मौका न मिलना चयन प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
उनके अनुसार, सरफराज ने सिर्फ घरेलू स्तर पर ही नहीं, बल्कि जब भी उन्हें भारत के लिए खेलने का अवसर मिला, उन्होंने अपनी उपयोगिता साबित की है। इसके बावजूद उन्हें टीम से बाहर रखना किसी भी तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता।
संघर्ष से भरा सफर और पहला बड़ा मौका
सरफराज खान का क्रिकेट सफर आसान नहीं रहा है। हर सीजन उन्हें अपनी जगह बचाने और साबित करने के लिए संघर्ष करना पड़ा। लगातार रन बनाने के बाद भी लंबे समय तक उन्हें टेस्ट टीम में मौका नहीं मिला। आखिरकार 2023 में इंग्लैंड के खिलाफ घरेलू टेस्ट सीरीज में उन्हें पहली बार भारत की टेस्ट टीम में शामिल किया गया।
उस सीरीज में उन्होंने अपने खेल से यह दिखा दिया कि वह इस स्तर के लिए तैयार हैं। उनके शॉट चयन, धैर्य और तकनीक ने यह साफ किया कि घरेलू क्रिकेट में बनाया गया आत्मविश्वास अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी काम आ सकता है।
सीमित मौके और फिर बाहर का रास्ता
हालांकि, उम्मीदों के बावजूद सरफराज को लंबा रन नहीं मिला। 2024-25 की बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के दौरान उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया। यह फैसला कई क्रिकेट विशेषज्ञों और प्रशंसकों को हैरान करने वाला लगा, क्योंकि इससे पहले उन्होंने अपनी फिटनेस और प्रदर्शन दोनों में सुधार दिखाया था।
मुंबई के इस बल्लेबाज़ ने आलोचनाओं को गंभीरता से लिया और अपनी फिटनेस पर कड़ी मेहनत की। उन्होंने वजन कम किया, अपनी फुर्ती बढ़ाई और मैदान पर इसका असर भी दिखाया। इसके बावजूद वेस्टइंडीज और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ घरेलू टेस्ट सीरीज में उन्हें फिर मौका नहीं मिला।
आंकड़े जो सवाल खड़े करते हैं
अगर सरफराज के अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। उन्होंने भारत के लिए अब तक 6 टेस्ट मैच खेले हैं, जिनमें 37.10 की औसत से 371 रन बनाए हैं। इन रनों में एक शतक और तीन अर्धशतक शामिल हैं। यह प्रदर्शन किसी भी नए खिलाड़ी के लिए सम्मानजनक माना जाएगा।
इसके बावजूद उन्हें लगातार नजरअंदाज किया जाना चयन प्रक्रिया की निरंतरता और पारदर्शिता पर सवाल उठाता है। दिलीप वेंगसरकर ने इसी बिंदु को उठाते हुए कहा कि जब कोई खिलाड़ी मौके मिलने पर रन बना रहा हो, तो उसे बाहर रखने का क्या तर्क हो सकता है।
धर्मशाला की यादगार साझेदारी
वेंगसरकर ने इंग्लैंड के खिलाफ धर्मशाला टेस्ट का विशेष रूप से उल्लेख किया। उस मैच में सरफराज खान और देवदत्त पडिक्कल की साझेदारी भारत की जीत की नींव बनी थी। दोनों ने दबाव में जिम्मेदारी से बल्लेबाजी की और टीम को मजबूत स्थिति में पहुंचाया।
उनका मानना है कि वह सत्र पूरे मैच का टर्निंग पॉइंट था। सरफराज की बल्लेबाजी में आत्मविश्वास और परिपक्वता साफ झलक रही थी। ऐसे प्रदर्शन के बाद किसी खिलाड़ी को टीम से बाहर रखना समझ से परे है।
विजय हजारे ट्रॉफी में धमाकेदार वापसी
सरफराज खान ने चयन से बाहर रहने के बावजूद मैदान पर अपना जवाब देना जारी रखा है। मौजूदा विजय हजारे ट्रॉफी में उन्होंने शानदार शुरुआत की है। सिर्फ तीन पारियों में 220 रन बनाकर उन्होंने एक बार फिर साबित किया है कि उनकी फॉर्म में कोई कमी नहीं है।
गोवा के खिलाफ खेली गई 75 गेंदों पर 157 रन की विस्फोटक पारी उनकी बल्लेबाजी की विविधता को दर्शाती है। वह जरूरत पड़ने पर आक्रामक खेल सकते हैं और हालात के अनुसार संयम भी दिखा सकते हैं।
चयन नीति पर उठते सवाल
इस पूरे प्रकरण ने चयन नीति को लेकर बहस को फिर से हवा दे दी है। क्या केवल फिटनेस या टीम संयोजन के नाम पर लगातार रन बनाने वाले खिलाड़ी को बाहर रखना सही है? क्या घरेलू प्रदर्शन की अहमियत कम होती जा रही है? ऐसे सवाल अब सिर्फ विशेषज्ञ ही नहीं, बल्कि आम क्रिकेट प्रेमी भी पूछ रहे हैं।
वेंगसरकर का मानना है कि सरफराज सभी फॉर्मेट खेलने की क्षमता रखते हैं और उन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज करना भारतीय क्रिकेट के हित में नहीं है।
प्रतिभा का सम्मान जरूरी
भारतीय क्रिकेट की ताकत उसकी गहराई और प्रतिभा में है। लेकिन अगर लगातार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को उचित अवसर नहीं मिलते, तो यह व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। सरफराज खान का मामला इस बात का उदाहरण बनता जा रहा है कि सिर्फ रन बनाना ही काफी नहीं, बल्कि चयन के लिए कई अन्य अदृश्य पैमानों का भी सामना करना पड़ता है।
निष्कर्ष
सरफराज खान की अनदेखी केवल एक खिलाड़ी का मुद्दा नहीं, बल्कि चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है। दिलीप वेंगसरकर जैसे अनुभवी क्रिकेटर की तीखी प्रतिक्रिया इस बात को और गंभीर बना देती है। अगर घरेलू क्रिकेट में लगातार रन बनाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपयोगी प्रदर्शन के बाद भी मौका नहीं मिलता, तो यह भविष्य की प्रतिभाओं के लिए भी गलत संदेश हो सकता है।
