भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच कोलकाता में चल रही टेस्ट सीरीज़ के बीच वह मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है जिसने पिछले एक साल से भारतीय क्रिकेट जगत को लगातार परेशान कर रखा है। यह मुद्दा है—घरेलू क्रिकेट में लगातार दमदार प्रदर्शन करने वाले सरफराज खान का टीम इंडिया से बाहर रहना। उनका साल 2024 का अंतरराष्ट्रीय डेब्यू लोगों को अच्छी तरह याद है, जब उन्होंने न्यूजीलैंड के खिलाफ शानदार प्रदर्शन कर सबका ध्यान खींचा था। लेकिन इसके बावजूद, एक-एक करके इंग्लैंड, वेस्टइंडीज और अब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ सीरीज़ में भी उनका नाम टीम से बाहर कर दिया गया। चयनकर्ताओं के फैसले पर पहले ही फैंस लगातार नाराज़गी जताते रहे हैं, और अब पहली बार खुद सरफराज ने मीडिया के सामने अपनी बात रखी है—स्पष्ट, बेबाक और बिना किसी घुमावदार अंदाज़ में।

घरेलू मैदान पर मुंबई की ओर से पुडुचेरी के खिलाफ रणजी ट्रॉफी मैच से पहले सरफराज खान ने जो बयान दिया, उसने एक बार फिर भारतीय चयन प्रक्रिया पर सवालों की बौछार कर दी है। उनके शब्दों में न तो किसी तरह की शिकायत का लहजा था और न ही गुस्से का स्वर—लेकिन यह स्पष्ट था कि लगातार नज़रअंदाजी के बावजूद उनका आत्मविश्वास एक इंच भी नहीं डगमगाया है। जब उनसे पूछा गया कि आखिर वह क्या बदलाव अपनी बल्लेबाज़ी में लाना चाहते हैं, तो उनका जवाब सीधे दिल को छू गया—“मुझे नहीं लगता कि मुझे कुछ बदलने की जरूरत है, क्योंकि मैं अच्छा कर रहा हूँ।”
उनके इस एक वाक्य ने यह साफ कर दिया कि सरफराज अपने प्रदर्शन और क्षमता से पूरी तरह आश्वस्त हैं। उन्होंने कहा कि वह हमेशा कठिन मेहनत करते आए हैं, प्रैक्टिस में ढेरों गेंदें खेलना उनकी आदत है, और आज भी वह उसी जुनून के साथ अभ्यास करते हैं जैसे उन्होंने अपने शुरुआती क्रिकेट करियर में किया था। उन्होंने आगे कहा कि हर मैच में रन बनाना संभव नहीं होता—और यह बात क्रिकेट के सबसे बड़े दिग्गजों ने भी कही है।
लेकिन उनके अगले वाक्य ने भारतीय क्रिकेट समुदाय में हलचल मचा दी—
“लोग चार साल में एक सीज़न में हज़ार रन बनाते हैं, लेकिन मैंने चार–पाँच साल दबाकर रन बनाए हैं!”
यह बयान सिर्फ शब्द नहीं था—यह एक ऐसी सच्चाई की आवाज़ थी जिसे भारतीय घरेलू क्रिकेट का हर दर्शक जानता है। रणजी ट्रॉफी के पिछले चार सत्रों में सरफराज खान का प्रदर्शन असाधारण रहा है। उनका औसत कई बार 100 के बेहद करीब रहा। उन्होंने मुंबई के लिए कई मुश्किल परिस्थितियों में मैच जिताऊ पारियाँ खेली हैं। वह लगातार अपने प्रदर्शन से यह जताते रहे हैं कि वह लंबे फॉर्मेट के बल्लेबाज़ हैं, लय वाले खिलाड़ी हैं और चुनौतियों के सामने झुकने वाले नहीं।
इसके बावजूद 2024 के बाद से उन्हें चयनकर्ताओं ने नजरअंदाज किया। यह बात सिर्फ क्रिकेट विश्लेषकों को ही नहीं खली—बल्कि फैंस भी लगातार ट्वीट्स और पोस्ट्स के माध्यम से चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाते रहे। तमाम विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की टेस्ट टीम को ऐसे खिलाड़ी की जरूरत है जो घरेलू क्रिकेट में लंबी पारियाँ खेलने का आदी है और जो गेंदबाजों को थकाने वाला, धैर्यपूर्ण खेल प्रस्तुत कर सके। सरफराज ठीक उसी खांचे में फिट बैठते हैं।
इंग्लैंड सीरीज़ से बाहर किया जाना शायद इतना बड़ा मुद्दा नहीं था, क्योंकि उस समय चर्चा में उनकी चोट भी थी। लेकिन चोट ठीक होने के बाद भी वेस्टइंडीज और अब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ लगातार उन्हें नजरअंदाज किया जाना क्रिकेट प्रेमियों के लिए समझ से परे हो गया। दक्षिण अफ्रीका जैसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ भारतीय टीम को एक भरोसेमंद मिडिल ऑर्डर बल्लेबाज़ की जरूरत थी, लेकिन इसके बावजूद चयनकर्ताओं की नजर उन पर नहीं गई।
कई पूर्व खिलाड़ियों और विशेषज्ञों ने भी इस फैसले को गलत बताया। उन्होंने कहा कि घरेलू प्रदर्शन को नजरअंदाज करना गलत मिसाल है—क्योंकि यही वह मंच है जहाँ खिलाड़ी लंबी तैयारी करके टीम इंडिया में जगह बनाते हैं। चयनकर्ताओं द्वारा बार-बार प्रयोग करने की नीति पर भी कई लोगों ने सवाल उठाए हैं।
दूसरी तरफ, सरफराज खुद पूरी शांति और संयम से अपनी क्रिकेट यात्रा जारी रखे हुए हैं। अपने हालिया बयान में उन्होंने यह भी कहा कि वह निराश नहीं हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले चार मैच उनके लिए खास नहीं रहे—एक भी फिफ्टी नहीं और कुल 111 रन। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी याद दिलाया कि फॉर्म एक अस्थायी चीज है—क्लास स्थायी। और क्लास की बात करें, तो सरफराज का नाम भारत के शीर्ष रणजी बल्लेबाज़ों की सूची में चमकता है।
उनके इस बयान ने चयन प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है—क्या भारतीय क्रिकेट में सिर्फ प्रदर्शन काफी नहीं होता? क्या चयन में अन्य तत्वों की भूमिका बढ़ गयी है? क्या घरेलू क्रिकेट की कीमत कम की जा रही है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या सरफराज जैसे खिलाड़ी को लगातार नजरअंदाज करके भारतीय क्रिकेट अपने भविष्य के एक स्तंभ को खो रहा है?
इन सब सवालों ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। जहां एक तरफ दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैदान पर रोमांच छाया है, वहीं बाहर सरफराज के मुद्दे ने चर्चा की एक और परत जोड़ दी है। खुद सरफराज ने कभी शिकायत नहीं की—लेकिन उनके शब्दों ने लगभग वही कह दिया जिसे कहने से वह हमेशा बचते रहे।
भारत को अगर टेस्ट क्रिकेट में मजबूत रहना है, तो उसे घरेलू क्रिकेट के सितारों को महत्व देना ही होगा। और सरफराज खान का नाम उनमें सबसे आगे आता है।
आने वाले समय में चयनकर्ता क्या फैसला लेते हैं, और क्या सरफराज को अपनी मेहनत का फल मिलेगा—यह देखने वाली बात होगी। लेकिन इतना तय है कि सरफराज की कहानी आज सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं, बल्कि उन सभी क्रिकेटरों की कहानी बन गई है जो सालों तक प्रदर्शन करते हैं, फिर भी चयन की दहलीज़ पर खड़े रह जाते हैं।
