पश्चिम एशिया की राजनीति का हर उतार-चढ़ाव न केवल मुस्लिम विश्व की शक्ति-संतुलन को प्रभावित करता है, बल्कि दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र को भी अपनी रणनीतिक परिधि में खींच लेता है। खाड़ी देशों की बदलती प्राथमिकताओं में ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य साझेदारी, क्षेत्रीय शक्ति-संघर्ष और महाशक्तियों का प्रभाव—ये सभी एक जटिल भू-राजनीतिक तानेबाने का निर्माण करते हैं। इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हाल में हुए परमाणु-सुरक्षा समझौते को पड़ोसी देशों और वैश्विक विश्लेषकों ने अत्यधिक महत्व के साथ देखा है।

सऊदी अरब का यह निर्णय ऐसे समय पर सामने आया जब क्षेत्र पहले से ही गहराते तनावों, बदलती सुरक्षा नीतियों और उभरते नए गठबंधनों की दिशा में बढ़ रहा है। इजरायल और कतर के बीच हालिया सैन्य तनाव ने खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा छतरी को कमजोर कर दिया है। ऐसे में सऊदी अरब और पाकिस्तान की यह साझेदारी कई तरह के प्रश्न खड़े करती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
क्या यह समझौता भारत के हितों और उसकी खाड़ी नीति के लिए चुनौती बन सकता है?
सऊदी–पाकिस्तान संबंधों का ऐतिहासिक आधार
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच संबंध नए नहीं हैं। यह रिश्ता राजनीतिक, सैन्य, धार्मिक और आर्थिक आयामों में दशकों से गहराता रहा है। पाकिस्तान की सेना ने 1960 के दशक से सऊदी सुरक्षा ढांचे में अहम भूमिका निभाई है। मक्का और मदीना जैसे अत्यंत संवेदनशील धार्मिक स्थलों की सुरक्षा में भी पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती लंबे समय से होती रही है।
इसके अलावा सऊदी अरब पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का समर्थक माना जाता रहा है। इस ऐतिहासिक सहयोग ने दोनों देशों को एक रणनीतिक दिशा दी है जो आज भी कई स्तरों पर प्रासंगिक बनी हुई है।
सऊदी अरब का सामरिक पुनर्संतुलन और चीन की बढ़ती भूमिका
खाड़ी देशों की नीतियों में सबसे बड़ा परिवर्तन पिछले दशक में दिखाई देता है, जहाँ चीन ने अपना प्रभाव लगातार बढ़ाया है। मिसाइल तकनीक, ड्रोन और सामरिक उपकरणों की सप्लाई के मामले में चीन खाड़ी देशों का प्राथमिक साझेदार बन चुका है।
ओमान के बंदरगाह में चीनी नौसेना की संभावित मौजूदगी, जो भारत की समुद्री सीमाओं से लगभग 2000 किलोमीटर दूर है, नई सुरक्षा चुनौतियों को जन्म देती है।
यह बदलाव भारत के लिए केवल सामरिक खतरा ही नहीं है; यह आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा भी पैदा करता है। खाड़ी में 97 लाख भारतीय रहते हैं और भारत को हर वर्ष अरबों डॉलर की रेमिटेंस मिलती है। इसका अर्थ है कि खाड़ी-क्षेत्र भारत की विदेश नीति का केंद्रीय स्तंभ है।
2015 का मोड़: जब सऊदी–पाकिस्तान संबंधों में दरार पड़ी
यमन युद्ध के दौरान सऊदी अरब ने पाकिस्तान से सैन्य सहयोग की अपेक्षा की थी। लेकिन पाकिस्तान ने अपने घरेलू हालात का हवाला देकर इस प्रस्ताव से दूरी बना ली। इससे सऊदी नेतृत्व पाकिस्तान से नाराज हो गया।
दूसरी ओर, भारत ने उसी समय खाड़ी देशों के साथ तेजी से गहराते रिश्तों की शुरुआत की। प्रधानमंत्री स्तरीय यात्राएँ बढ़ीं, व्यापार और सुरक्षा सहयोग मजबूत हुआ और पहली बार भारत को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में देखा जाने लगा।
इन सभी कारणों से खाड़ी में भारत के प्रभाव की एक नई छवि बनी। लेकिन यह बढ़त स्थायी नहीं थी।
क्यों लौट आया चीन और पाकिस्तान का प्रभाव?
सऊदी अरब और UAE जैसे देशों ने एक स्पष्ट नीति अपनाई—
किसी भी वैश्विक शक्ति संघर्ष में सीधे शामिल होने की बजाय आर्थिक निवेश, तकनीकी सहयोग और आधुनिक सैन्य क्षमता पर ध्यान देना।
चीन, जिसका वित्तीय निवेश भारी है और जो घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करता, खाड़ी देशों के लिए एक स्वाभाविक साझेदार बन गया। पाकिस्तान पहले से ही चीन के साथ मजबूत गठबंधन में है। इसलिए खाड़ी में चीनी प्रभाव बढ़ने के साथ पाकिस्तान का प्रभाव भी वापसी करने लगा।
सऊदी–पाकिस्तान परमाणु सुरक्षा डील की वास्तविक प्रकृति
यह समझौता केवल सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है। इसमें कहा गया है कि यदि किसी एक देश पर हमला होगा, तो वह दूसरे पर हमला माना जाएगा।
ऐसे समझौते अक्सर दो तरह की सुरक्षा धारणा बनाते हैं—
पहला, प्रतिरोध की नीति
दूसरा, सामरिक साझेदारी का विस्तार
अब सऊदी अरब, जो खुद परमाणु शक्ति नहीं है, पाकिस्तान की परमाणु क्षमताओं को एक सुरक्षा ढांचे के रूप में देख सकता है। यह स्थिति क्षेत्रीय असंतुलन को बढ़ा सकती है।
भारत की खाड़ी नीति: चुनौतियाँ और अवसर
भारत ने खाड़ी देशों के साथ सांस्कृतिक, आर्थिक और ऊर्जा-निर्भरता आधारित रिश्तों को काफी मजबूत किया है। लेकिन भारत की मध्य-पूर्व नीति अभी भी “स्पष्ट और एकसूत्रीय” नहीं मानी जाती।
चीन की तरह भारत क्षेत्रीय विवादों से दूरी नहीं रखता। वह कई मुद्दों पर स्पष्ट रुख लेता है, जिससे कुछ देशों में असहजता पैदा होती है।
इसके बावजूद भारत की ताकतें अभी भी खाड़ी देशों के लिए महत्व रखती हैं:
- भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है
- मानव संसाधन अत्यंत विश्वसनीय है
- ऊर्जा व्यापार स्थायी धुरी है
- समुद्री सुरक्षा में भारत एक प्रमुख शक्ति है
इसलिए यह कहना गलत होगा कि भारत खाड़ी से बाहर हो रहा है।
हाँ, प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है—पर अवसर अभी भी बहुत बड़े हैं।
आगे की राह: क्या भारत को खाड़ी में अपनी रणनीति बदलनी चाहिए?
भारत को खाड़ी क्षेत्र की राजनीति में केवल आर्थिक साझेदारी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
उसे तीन स्तरों पर अपनी नीति को मजबूत करना होगा:
- सुरक्षा और रक्षा सहयोग
- ऊर्जा सुरक्षा और तकनीक
- सांस्कृतिक एवं प्रवासी भारतीय नीति
भारत को अपनी पश्चिम एशिया नीति को स्पष्ट रणनीतिक संरचना में ढालना होगा, ताकि वह चीन–पाकिस्तान की संयुक्त रणनीति का मुकाबला कर सके।
