मध्य पूर्व की राजनीति लंबे समय से अस्थिरता, सत्ता संघर्ष और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा का केंद्र रही है। यमन इस संघर्ष का सबसे जटिल और संवेदनशील मंच बन चुका है, जहां स्थानीय गुटों की लड़ाई अब अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन से जुड़ गई है। हालिया घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यमन में केवल हूती विद्रोहियों के खिलाफ युद्ध ही नहीं चल रहा, बल्कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे सहयोगी देशों के बीच भी प्रभाव और नियंत्रण की जंग तेज हो चुकी है।

इसी पृष्ठभूमि में यमन के अलगाववादी आंदोलन के एक बड़े चेहरे ऐदारूस अल-जुबैदी का अचानक देश छोड़कर फरार हो जाना पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है। जुबैदी को लंबे समय से संयुक्त अरब अमीरात समर्थक नेता माना जाता रहा है, और उनका यमन से पलायन इस बात का संकेत है कि सऊदी अरब ने वहां अपनी रणनीति को और अधिक आक्रामक बना लिया है।
ऐदारूस अल-जुबैदी का उभार और अलगाववादी राजनीति
ऐदारूस अल-जुबैदी यमन के दक्षिणी हिस्से में सक्रिय अलगाववादी आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे हैं। वह सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल से जुड़े हुए थे, जिसे दक्षिण यमन में अलग प्रशासन और स्वतंत्र पहचान की मांग करने वाला प्रभावशाली संगठन माना जाता है। इस संगठन को संयुक्त अरब अमीरात का खुला समर्थन मिलता रहा है, जिससे यमन की राजनीति में एक अलग शक्ति केंद्र उभर कर सामने आया।
दक्षिणी यमन में जुबैदी की पकड़ मजबूत थी और उन्होंने खुद को हूती विद्रोहियों के खिलाफ संघर्ष का एक अहम नेता साबित किया था। लेकिन समय के साथ यह साफ होता गया कि सऊदी अरब और यूएई के हित यमन में पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं।
सऊदी अरब और यूएई के बीच बढ़ता तनाव
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात दोनों ही हूती विद्रोहियों के खिलाफ एक साझा गठबंधन का हिस्सा रहे हैं। हूती विद्रोहियों ने 2014 से यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर रखा है और उन्हें ईरान का समर्थन प्राप्त माना जाता है। इसी कारण सऊदी अरब ने यमन को अपनी सुरक्षा के लिए एक अहम मोर्चा माना है।
हालांकि, जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचता गया, दोनों देशों की प्राथमिकताएं अलग-अलग होती चली गईं। सऊदी अरब यमन में एक मजबूत, केंद्रीकृत सरकार देखना चाहता है, जबकि यूएई ने दक्षिणी यमन में अपने प्रभाव को बढ़ाने पर जोर दिया। यही मतभेद धीरे-धीरे खुलकर सामने आने लगे।
जुबैदी पर देशद्रोह के आरोप और निष्कासन की कार्रवाई
यमन में हूती विरोधी ताकतों की एक परिषद ने ऐदारूस अल-जुबैदी को संगठन से निष्कासित करने का ऐलान किया। परिषद का कहना था कि जुबैदी ने हाल ही में सऊदी अरब में प्रस्तावित वार्ता में शामिल होने से इनकार कर दिया था, जिसे देशद्रोह के रूप में देखा गया।
यह कदम केवल एक संगठनात्मक फैसला नहीं था, बल्कि इसके पीछे सऊदी समर्थित बलों और यूएई समर्थित सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल के बीच गहराते तनाव की झलक साफ दिखाई देती है। हालांकि, कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि निष्कासन की घोषणा से पहले ही जुबैदी यमन छोड़कर जा चुके थे।
जुबैदी की रहस्यमयी फरारी
जुबैदी के वर्तमान ठिकाने को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। लेकिन यह साफ है कि वह अब यमन में नहीं हैं। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रवक्ता के एक बयान ने इस रहस्य को और गहरा कर दिया।
प्रवक्ता के अनुसार, जुबैदी को सऊदी अरब के लिए रवाना होना था, लेकिन वह अन्य अधिकारियों के साथ विमान में सवार नहीं हुए। इसके बाद खुफिया एजेंसियों को जानकारी मिली कि जुबैदी ने भारी मात्रा में सैन्य संसाधन इकट्ठा किए थे, जिनमें बख्तरबंद वाहन, लड़ाकू गाड़ियां, भारी और हल्के हथियार तथा गोला-बारूद शामिल थे।
इन सूचनाओं के आधार पर सऊदी समर्थित बलों ने यह निष्कर्ष निकाला कि जुबैदी किसी अज्ञात स्थान की ओर भाग चुके हैं।
सऊदी अरब की भीषण हवाई कार्रवाई
जुबैदी की फरारी से पहले और बाद में सऊदी अरब ने यमन में अपनी सैन्य गतिविधियों को तेज कर दिया। हाल के हफ्तों में सऊदी वायुसेना ने 15 से अधिक स्थानों पर हवाई हमले किए, जिनका निशाना सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल से जुड़े ठिकाने बताए जा रहे हैं।
इन हमलों में कथित तौर पर उन हथियारों की खेप को भी निशाना बनाया गया, जिन्हें यूएई से भेजा गया माना जा रहा था। इन सैन्य कार्रवाइयों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सऊदी अरब अब यमन में यूएई समर्थित गुटों के खिलाफ खुलकर कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा।
यूएई की रणनीतिक वापसी
सऊदी अरब के बढ़ते दबाव और हूती विरोधी बलों द्वारा यमन से हटने की चेतावनी के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने एक बड़ा फैसला लिया। यूएई ने शनिवार को अपनी सेना को यमन से वापस बुलाने की घोषणा की।
यह कदम क्षेत्रीय राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। यूएई की वापसी ने यमन में शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है और सऊदी अरब को वहां एकमात्र प्रमुख बाहरी शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया है।
खाड़ी राजनीति में नई दरार
यमन में पैदा हुआ यह संकट केवल एक देश तक सीमित नहीं है। इसका असर पूरे खाड़ी क्षेत्र की राजनीति पर पड़ रहा है। सऊदी अरब और यूएई, जो लंबे समय से रणनीतिक साझेदार रहे हैं, अब आर्थिक मुद्दों और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धी बनते जा रहे हैं।
विशेष रूप से लाल सागर क्षेत्र में दोनों देशों के हित टकरा रहे हैं। व्यापार मार्गों, बंदरगाहों और सुरक्षा नियंत्रण को लेकर मतभेद पहले भी मौजूद थे, लेकिन यमन संकट ने इन मतभेदों को खुलकर सामने ला दिया है।
हूती विद्रोहियों के खिलाफ साझा लक्ष्य, लेकिन अलग रास्ते
यह सच है कि सऊदी अरब और यूएई दोनों ही ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को अपना साझा दुश्मन मानते हैं। लेकिन उन्हें हराने के तरीकों और यमन के भविष्य को लेकर दोनों की सोच अलग है।
सऊदी अरब एक ऐसी यमनी सरकार चाहता है जो पूरे देश पर नियंत्रण रख सके और रियाद के सुरक्षा हितों को प्राथमिकता दे। वहीं यूएई दक्षिणी यमन में अपने प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने की रणनीति पर काम करता रहा है।
यमन का भविष्य और क्षेत्रीय अस्थिरता
ऐदारूस अल-जुबैदी की फरारी और यूएई की सैन्य वापसी के बाद यमन का भविष्य और अधिक अनिश्चित हो गया है। दक्षिणी यमन में सत्ता का खालीपन पैदा हो सकता है, जिसका फायदा हूती विद्रोही या अन्य सशस्त्र गुट उठा सकते हैं।
इसके अलावा, सऊदी अरब और यूएई के बीच बढ़ता तनाव पूरे मध्य पूर्व में नई भू-राजनीतिक उथल-पुथल को जन्म दे सकता है।
निष्कर्ष
यमन में जो कुछ हो रहा है, वह केवल एक देश की आंतरिक राजनीति नहीं है, बल्कि यह खाड़ी क्षेत्र की बदलती शक्ति संरचना का संकेत है। ऐदारूस अल-जुबैदी का देश छोड़कर भागना, सऊदी अरब की आक्रामक सैन्य कार्रवाई और यूएई की वापसी इस बात को दर्शाती है कि पुराने गठबंधन अब पहले जैसे मजबूत नहीं रहे।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सऊदी अरब यमन में किस तरह का राजनीतिक समाधान तलाशता है और यूएई इस क्षेत्र में अपनी भूमिका को कैसे पुनर्परिभाषित करता है।
