भारतीय शेयर बाजार में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए नियामक संस्था सेबी समय-समय पर कड़े कदम उठाती रही है। इसी कड़ी में फ्रंट रनिंग से जुड़े एक गंभीर मामले में सेबी ने बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है। इस कार्रवाई में 12 अलग-अलग एंटिटीज को पांच साल के लिए सिक्योरिटीज मार्केट से बाहर कर दिया गया है और उन पर कुल 90 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। इसके साथ ही इन संस्थाओं को गैरकानूनी तरीके से कमाए गए मुनाफे को ब्याज सहित वापस करने का आदेश भी दिया गया है।

यह फैसला केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि पूरे बाजार के लिए एक स्पष्ट चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है कि अंदरूनी जानकारी का दुरुपयोग किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
क्या होता है फ्रंट रनिंग और क्यों है यह गंभीर अपराध
फ्रंट रनिंग शेयर बाजार की सबसे गंभीर अवैध प्रैक्टिसेज में गिनी जाती है। इसमें किसी ब्रोकर, डीलर या उससे जुड़ी एंटिटी को बड़े क्लाइंट के आने वाले ऑर्डर की गैर-सार्वजनिक जानकारी पहले ही मिल जाती है। इस जानकारी का फायदा उठाकर वह संबंधित शेयर को अपने या कनेक्टेड खातों में पहले ही खरीद या बेच लेता है। जब बड़ा ऑर्डर बाजार में आता है और कीमतों में बदलाव होता है, तो फ्रंट रनर को अनुचित लाभ मिल जाता है।
सेबी के अनुसार इस तरह की ट्रेडिंग धोखाधड़ी, बाजार में हेरफेर और अनुचित व्यापार व्यवहार की श्रेणी में आती है। इससे आम निवेशकों का भरोसा टूटता है और बाजार की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि और सेबी की जांच
इस पूरे मामले की जांच कई वर्षों तक चली और इसके बाद 26 दिसंबर 2022 को सेबी ने अंतरिम आदेश पारित किया था। अब 102 पन्नों के विस्तृत अंतिम आदेश में सेबी ने पूरे नेटवर्क, लेन-देन और अंदरूनी जानकारी के प्रवाह को विस्तार से सामने रखा है।
जांच में यह सामने आया कि एक बड़े क्लाइंट मंगल केशव फाइनेंशियल सर्विसेज से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी के ऑर्डर्स के जरिए फ्रंट रनिंग को अंजाम दिया गया। यह मामला दिखाता है कि कैसे एक संगठित नेटवर्क के जरिए गोपनीय जानकारी को कई स्तरों पर साझा किया गया और उसका दुरुपयोग किया गया।
बड़े क्लाइंट और डीलर्स की भूमिका
सेबी के निष्कर्षों के अनुसार मंगल केशव फाइनेंशियल सर्विसेज के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर परेश एन भगत ने अपने डीलर्स के माध्यम से बड़े ऑर्डर्स प्लेस किए। इन डीलर्स के पास नॉन-पब्लिक इनफॉरमेशन थी, जिसे बाजार में आने से पहले ही इस्तेमाल किया गया।
डीलर्स आशीष एस पारेख और राजेश जोशी को यह गोपनीय जानकारी पहले से उपलब्ध थी। उन्होंने इस जानकारी को आगे नागेंद्र एस दुबे और चिराग अतुल पिथाडिया के साथ साझा किया। इसके बाद इस सूचना का इस्तेमाल कनेक्टेड एंटिटीज और फ्रंट रनर्स के ट्रेडिंग खातों में ऑर्डर डालने के लिए किया गया।
कैसे फैला फ्रंट रनिंग का नेटवर्क
सेबी की जांच में यह स्पष्ट हुआ कि यह कोई एक व्यक्ति या एक लेन-देन का मामला नहीं था। यह एक सुव्यवस्थित नेटवर्क था, जिसमें कई एंटिटीज और परिवारिक खाते शामिल थे। बड़े ऑर्डर से पहले छोटे-छोटे लेकिन रणनीतिक ट्रेड्स किए गए, जिससे बाद में कीमतों में हुए बदलाव का फायदा उठाया जा सके।
इस प्रक्रिया में गैरकानूनी मुनाफा कमाया गया, जिसे सेबी ने निवेशक संरक्षण और शिक्षा कोष में जमा कराने का आदेश दिया है।
किन-किन पर गिरी गाज
सेबी के आदेश के अनुसार फ्रंट रनर्स में कई नाम सामने आए हैं, जिनमें व्यक्तिगत और एचयूएफ खाते दोनों शामिल हैं। इनमें दीपा आशीष पारेख, कश्मीरा जोशी, निखिल हीराचंद जैन, निखिल हीराचंद जैन एचयूएफ, अल्पेश हीराचंद जैन एचयूएफ, नागेंद्र एस दुबे एचयूएफ और कानूनी वारिसों के माध्यम से स्वर्गीय सुषमा नागेंद्र दुबे के नाम शामिल हैं। साथ ही जागृति अतुल पिथाडिया और साहिल अतुल पिथाडिया के जरिए जुड़े खाते भी इस कार्रवाई के दायरे में आए हैं।
सेबी ने स्पष्ट किया कि इन सभी ने बड़े क्लाइंट के आने वाले ऑर्डर्स से जुड़ी नॉन-पब्लिक इनफॉरमेशन का इस्तेमाल किया, जो सीधे तौर पर धोखाधड़ी और अनुचित ट्रेड प्रैक्टिस में आता है।
बैन और जुर्माने का पूरा विवरण
फ्रंट रनिंग के आरोप साबित होने के बाद सेबी ने 12 एंटिटीज को 26 दिसंबर 2022 के अंतरिम आदेश की तारीख से पांच साल के लिए सिक्योरिटीज मार्केट में किसी भी तरह की डीलिंग से प्रतिबंधित कर दिया है। इसके अलावा कश्मीरा जोशी और राजेश जोशी पर भी पांच साल का बैन लगाया गया है।
सेबी ने आशीष, नागेंद्र और चिराग को चार साल के लिए किसी भी सेबी-रजिस्टर्ड इंटरमीडियरी या कंपनी से जुड़ने से रोक दिया है। राजेश जोशी पर भी इसी तरह चार साल का प्रतिबंध लगाया गया है।
गैरकानूनी मुनाफे की वसूली और ब्याज
इस मामले में सेबी ने केवल जुर्माना ही नहीं लगाया, बल्कि गैरकानूनी मुनाफे की पूरी वसूली का आदेश भी दिया है। 12 एंटिटीज को संयुक्त रूप से और अलग-अलग मिलाकर कुल 1.07 करोड़ रुपये का अवैध मुनाफा निवेशक संरक्षण और शिक्षा कोष में जमा करना होगा।
इस राशि पर 12 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा और यह पूरी रकम 45 दिनों के भीतर जमा करनी अनिवार्य है। सेबी का यह कदम यह दिखाता है कि नियम तोड़ने वालों से केवल सजा ही नहीं, बल्कि गलत तरीके से कमाई गई रकम भी पूरी तरह वापस ली जाएगी।
निवेशकों के लिए क्या संदेश
इस कार्रवाई का सबसे बड़ा संदेश आम निवेशकों के लिए है। सेबी यह साफ करना चाहता है कि बाजार में हर निवेशक के लिए समान नियम हैं और अंदरूनी जानकारी का फायदा उठाने वालों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा।
फ्रंट रनिंग जैसे मामलों पर सख्ती से निवेशकों का भरोसा मजबूत होता है और यह विश्वास बनता है कि बाजार में कीमतें निष्पक्ष मांग और आपूर्ति के आधार पर तय होती हैं, न कि गोपनीय सूचनाओं के दुरुपयोग से।
बाजार की पारदर्शिता और सेबी की भूमिका
भारतीय शेयर बाजार में पिछले कुछ वर्षों में टेक्नोलॉजी के बढ़ते इस्तेमाल के साथ-साथ निगरानी भी मजबूत हुई है। सेबी ने डेटा एनालिटिक्स, ट्रेड पैटर्न एनालिसिस और डिजिटल ट्रैकिंग के जरिए ऐसे मामलों की पहचान करना आसान बना दिया है।
यह मामला दिखाता है कि चाहे नेटवर्क कितना भी जटिल क्यों न हो, अंततः नियामक की नजर से बचना मुश्किल है। यह कार्रवाई भविष्य में इस तरह की गतिविधियों को रोकने में भी अहम भूमिका निभा सकती है।
