एक शांत कस्बे का माहौल उस समय गरमा गया जब प्याज से लदा एक ट्रक किसानों के समूह द्वारा रोक लिया गया।
किसानों का आरोप था कि उन्हें उनके उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल रहा और व्यापारी बिना भुगतान या बकाया राशि दिए प्याज बाहर भेज रहे हैं।घटना सीहोर जिले की मंडी क्षेत्र की है, जहाँ बुधवार सुबह से किसानों और व्यापारियों के बीच टकराव जैसी स्थिति बनी रही।
इस पूरे मामले ने प्रशासन से लेकर कृषि विभाग तक को हिला दिया। किसानों ने कहा कि जब तक उन्हें उनका मेहनताना और बकाया राशि नहीं दी जाती, कोई ट्रक मंडी से बाहर नहीं जाएगा। ट्रक कानपुर के लिए रवाना किया जा रहा था, जिसमें करीब 18 टन प्याज लदी थी।

घटना की शुरुआत: देर रात से मंडी में तनाव
घटना की शुरुआत मंगलवार रात से हुई जब मंडी में कई ट्रक प्याज लोड करने पहुंचे। किसानों को जानकारी मिली कि कुछ व्यापारी बिना पूरा भुगतान किए प्याज की खेप को कानपुर भेजने की तैयारी में हैं। जैसे ही यह खबर फैली, गांव-गांव से किसान मंडी पहुंचने लगे। सुबह तक स्थिति यह थी कि करीब 50 से अधिक किसान ट्रकों के आगे खड़े होकर रोक लगाने लगे।
किसानों ने नारे लगाए —
“मेहनत का पैसा दो, तभी प्याज जाएगी!”
“हमने पसीना बहाया है, अब हिसाब दो!”
किसानों का पक्ष: मेहनत का मूल्य नहीं, बाजार के हवाले किसान
किसानों का कहना है कि इस बार प्याज की फसल तो अच्छी हुई, लेकिन मंडी में भाव गिरकर आधे रह गए। जहाँ पिछले साल प्याज 1500 से 2000 रुपये प्रति क्विंटल तक बिका था, वहीं इस बार उन्हें 600 से 800 रुपये से ज़्यादा नहीं मिल रहे। ऊपर से कई व्यापारी उधारी पर खरीदते हैं और महीनों तक भुगतान नहीं करते।
ग्राम पथरोटा के किसान लक्ष्मण पटेल ने कहा —
“हम दिन-रात खेत में मेहनत करते हैं, प्याज उगाने में पानी, खाद और मजदूर पर खर्च बढ़ गया।
पर मंडी में व्यापारी मनमानी करते हैं। प्याज हमारे खेत से निकलने के बाद जैसे उनकी हो जाती है।”
किसानों ने मांग की है कि जब तक उन्हें बकाया राशि नहीं मिलती, तब तक कोई भी ट्रक मंडी से बाहर न जाए।
व्यापारियों की दलील: मार्केट रेट गिरा, भुगतान में समय लगेगा
मंडी के कुछ व्यापारियों ने सफाई देते हुए कहा कि इस समय बाजार में प्याज की मांग बहुत कम है। कानपुर, लखनऊ और दिल्ली की थोक मंडियों में भी भाव नीचे चल रहे हैं। ऐसे में तुरंत भुगतान करना मुश्किल है क्योंकि व्यापारी खुद घाटे में हैं।
व्यापारी नरेंद्र अग्रवाल ने कहा —
“हम किसानों को धोखा नहीं देना चाहते। लेकिन जब हमें पैसे नहीं मिलते, तो भुगतान कैसे करें?
अगर प्याज कानपुर नहीं जाएगी, तो पूरा माल सड़ जाएगा। इससे नुकसान किसानों को ही होगा।”
लेकिन किसानों ने यह तर्क मानने से इनकार कर दिया और पुलिस बुलानी पड़ी।
पुलिस और प्रशासन की भूमिका
सुबह करीब 10 बजे मंडी क्षेत्र में उप जिलाधिकारी (SDM) और थाना प्रभारी पहुंचे। उन्होंने किसानों से बातचीत की और समझाने की कोशिश की कि ट्रक को रोकना कानूनन गलत है। लेकिन किसानों ने साफ कहा कि वे शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे हैं और केवल अपने अधिकार की मांग कर रहे हैं।
लगभग दो घंटे तक मंडी में बातचीत चली। आखिरकार प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद एक समझौता हुआ कि व्यापारी अगले 48 घंटे में किसानों का बकाया भुगतान करेंगे। इसके बाद ट्रक को कानपुर के लिए रवाना किया गया।
कृषि विभाग की प्रतिक्रिया
कृषि अधिकारी ने कहा कि किसानों की मांग जायज़ है और मंडियों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी। इसके लिए मंडी समिति को आदेश दिया गया है कि हर लेनदेन का रिकॉर्ड और भुगतान समयसीमा तय हो। उन्होंने बताया कि जल्द ही मंडियों में “ऑनलाइन भुगतान प्रणाली” शुरू की जाएगी ताकि बिचौलियों की भूमिका कम हो और किसान सीधे अपने बैंक खाते में पैसा पा सकें।
किसानों के संघर्ष की पृष्ठभूमि: प्याज की कीमतों का चक्रव्यूह
भारत में प्याज की कीमतें हमेशा से राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित करती रही हैं। सीहोर, शाजापुर, नासिक और धार जैसे जिलों में प्याज प्रमुख नकदी फसल है। लेकिन हर साल किसानों को यही संघर्ष झेलना पड़ता है — कभी भाव आसमान छूते हैं, तो कभी मिट्टी के भाव पर गिर जाते हैं।
प्याज के उत्पादन में लागत लगातार बढ़ रही है — बीज, सिंचाई, परिवहन और मजदूरी सब महंगे हुए हैं। लेकिन मंडी में दाम तय करने का अधिकार किसानों के पास नहीं है। यह पूरी तरह व्यापारियों और कमीशन एजेंटों के नियंत्रण में है।
किसान नेता गंगाराम चौहान ने कहा —
“हमारे प्याज को व्यापारी अपने मर्जी से बेचते हैं।
सरकार MSP तय करे, नहीं तो किसानों का भविष्य अंधकारमय रहेगा।”
स्थानीय राजनीति में गूंज
यह मामला अब स्थानीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों ने इस घटना पर बयान जारी किए हैं।
कांग्रेस ने कहा कि सरकार किसानों की सुरक्षा और मूल्य सुनिश्चित करने में नाकाम रही है, जबकि भाजपा के प्रवक्ता ने कहा कि राज्य सरकार किसानों और व्यापारियों दोनों को राहत देने के उपाय कर रही है।
इस बीच, सोशल मीडिया पर भी “#PyaazKaInsaf” ट्रेंड करने लगा। लोगों ने किसानों के समर्थन में पोस्ट किए और मंडियों में हो रही धांधली के खिलाफ आवाज उठाई।
प्याज व्यापार और अर्थव्यवस्था का संबंध
भारत प्याज का विश्व में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है, लेकिन किसानों को इसका उचित लाभ नहीं मिल पाता। प्याज के निर्यात पर कभी प्रतिबंध और कभी छूट की नीति से बाजार में अस्थिरता बनी रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्याज के भंडारण और प्रसंस्करण के लिए सरकारी योजनाएँ तो बनी हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका असर नहीं दिखता।
कृषि विशेषज्ञ डॉ. रमेश कुमार ने बताया —
“अगर किसानों को प्याज की फसल का सही मूल्य दिलाना है, तो हमें उसकी आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करनी होगी।
प्याज केवल फसल नहीं, एक राजनीतिक और आर्थिक मुद्दा है।”
किसानों का भविष्य और उम्मीदें
हालाँकि मंडी का तत्काल विवाद सुलझ गया, लेकिन किसानों के मन में असुरक्षा बनी हुई है। वे चाहते हैं कि सरकार प्याज जैसी नकदी फसलों के लिए मूल्य स्थिरता योजना बनाए। इसके अलावा, बिचौलियों की भूमिका खत्म करने के लिए “फार्म टू मार्केट” डिजिटल प्लेटफॉर्म की माँग भी की जा रही है।
सीहोर के युवा किसान अमित पाटीदार ने कहा —
“हम नई पीढ़ी के किसान हैं। अब हमें मोबाइल, इंटरनेट और जानकारी की ताकत है।
अगर सरकार साथ दे तो हम सीधे उपभोक्ता तक प्याज पहुँचा सकते हैं।”
निष्कर्ष: प्याज की गंध में संघर्ष की कहानी
सीहोर की यह घटना केवल एक ट्रक या भुगतान विवाद की कहानी नहीं है — यह उस गहरी समस्या की झलक है जिसमें भारत का किसान आज भी फंसा हुआ है। जिस प्याज के आंसुओं पर देश की राजनीति हिल जाती है, उस प्याज के असली उत्पादक को आज भी अपने पैसे के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
कानपुर के लिए रवाना हुआ वह ट्रक केवल प्याज नहीं, बल्कि किसानों की उम्मीदों का बोझ लेकर चला — इस उम्मीद के साथ कि आने वाले दिनों में उन्हें उनके पसीने का उचित मूल्य मिलेगा।
