नई दिल्ली में आयोजित उस विशेष सरकारी रात्रिभोज का प्रसंग इस समय राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है जिसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आए और उनके सम्मान में आधिकारिक डिनर आयोजित किया गया। ऐतिहासिक रूप से यह अवसर हमेशा उस देश के साथ कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने और पारंपरिक सहयोग को संरक्षित करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। इस बार भी यह अवसर उतना ही महत्वपूर्ण था, लेकिन डिनर से अधिक चर्चा आमंत्रितों की सूची को लेकर हो गई।
भारत में लंबे समय से यह परंपरा रही है कि ऐसे हाई-लेवल कूटनीतिक कार्यक्रमों में सरकार और विपक्ष दोनों से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाता है। विदेश नीति की निरंतरता के पीछे यह विचार रहा है कि लोकतंत्र में विपक्ष भी राष्ट्र का ही प्रतिनिधि होता है और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों की समझ दोनों दलों की जिम्मेदारी है।

लेकिन 6 दिसंबर को आयोजित इस डिनर में विपक्ष के प्रमुख नेताओं जैसे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को आमंत्रित नहीं किया गया। इसकी राजनीतिक प्रतिक्रिया तत्काल और तीखी थी। सबसे रोचक पहलू यह रहा कि उन्हीं परिस्थितियों में कांग्रेस सांसद और विदेश मामलों की स्थाई समिति के प्रमुख शशि थरूर को निमंत्रित किया गया और वह कार्यक्रम में शामिल भी हुए।
विपक्ष की नाराजगी और सवालों का सिलसिला
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस कदम को राजनीतिक दृष्टि से गलत, अस्वीकार्य और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत बताया। कई पार्टी नेताओं ने सरकार पर यह आरोप लगाया कि राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से विपक्ष को बाहर रखा गया।
पार्टी की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देते हुए पवन खेड़ा ने यह प्रश्न उठाया कि जब पार्टी के शीर्ष नेताओं को कार्यक्रम में नहीं बुलाया गया, तब शशि थरूर कैसे निमंत्रण स्वीकार कर सकते हैं। उनके अनुसार इस तरह के निमंत्रण को स्वीकार करना राजनीतिक संकेतों की अनदेखी है और उसके पीछे छिपे राजनीतिक ‘खेल’ को समझना आवश्यक था।
उदित राज ने कहा कि यदि विपक्ष के नेता रूसी प्रतिनिधियों से मिलते, तो वे भारत-रूस संबंधों की पुराने समय की नींव और सामरिक विश्वसनीयता को मजबूती देते। उनके अनुसार प्रधानमंत्री की राजनीतिक रणनीति विपक्ष को अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं से अलग रखने की कोशिश करती है, जो किसी भी राष्ट्रीय हित के पक्ष में नहीं मानी जा सकती।
परंपरा की बहाली या परंपरा का बदलाव: कौन सही?
शशि थरूर ने कार्यक्रम में जाने से पहले कहा था कि उन्हें निमंत्रित किया गया है और वे शामिल होंगे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि विपक्ष के नेताओं को नहीं बुलाना परंपरा के लिहाज से ठीक नहीं था।
इसके साथ ही उन्होंने एक अहम बात कही कि एक समय विदेश संबंधों की समितियों के अध्यक्षों को नियमित रूप से ऐसे कार्यक्रमों में बुलाया जाता था। यह संकेत था कि किसी समय चली आ रही कूटनीतिक परंपरा शायद फिर से सक्रिय की गई है।
दूसरी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला ने इस बात की याद दिलाई कि जब विदेशी नेता भारत आते थे तो उन्हें विपक्ष के नेताओं से भी मिलवाया जाता था। उन्होंने कहा कि यह परंपरा अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में भी कायम रही और बाद में मनमोहन सिंह सरकार ने भी इसे निभाया।
इतिहास में पीछे देखें तो रूस और भारत के संबंधों की नींव मजबूत करने में स्वर्गीय इंदिरा गांधी की भूमिका विशेष रही। उल्लेख मिलता है कि 1971 में लेनिनग्राद और दिल्ली के बीच हुए संबंधों को जनसभा स्तर तक प्रदर्शित किया गया था। इस आधार पर अब विपक्ष का पक्ष यह है कि वही पार्टी जिसे ऐतिहासिक संबंध बनाने का श्रेय दिया जाता है, इस बार उस पार्टी के शीर्ष नेताओं को आमंत्रण सूची से बाहर रखा गया।
क्या है इस पूरी बहस का कूटनीतिक पहलू
भारत-रूस संबंधों के संदर्भ में यह समय खास है। यूक्रेन संकट के बाद जब विश्व की राजनीति दो ध्रुवों पर विभाजित होती दिख रही है, तब भारत ने पुराने सामरिक मित्र रूस के साथ तेल-गैस व्यापार, रक्षा सहयोग और सूचना आदान-प्रदान को जारी रखा है।
शशि थरूर ने स्वयं इस बात को रेखांकित किया कि हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान रूस से मिले आधुनिक एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने भारत के लिए बड़ी भूमिका निभाई। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि यह संबंध अमेरिका के साथ संबंधों को प्रभावित किए बिना समानांतर रूप से चल सकते हैं।
इस विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि थरूर ने कार्यक्रम में शामिल होकर अपनी भूमिका एक विशेषज्ञ के रूप में निभाई, न कि केवल एक पार्टी सदस्य के रूप में।
बीजेपी की प्रतिक्रिया और राजनीतिक बचाव
सत्तापक्ष की ओर से मुख्य प्रतिक्रिया यह रही कि शशि थरूर को बुलाया जाना उचित है, क्योंकि वह विदेश नीति, वैश्विक संबंधों और कूटनीति को समझने वाले व्यक्ति हैं।
बीजेपी सांसद राजेश मिश्रा ने कहा कि समिति के प्रमुख को बुलाने का अर्थ है कि कार्यक्रम में उस व्यक्ति को प्रतिनिधित्व दिया गया जो विषय को गहराई से समझता है।
सत्तापक्ष की यह कोशिश रही कि इसे लोकतांत्रिक संतुलन और विशेषज्ञ चयन के आधार पर सही ठहराया जाए।
मीडिया और सार्वजनिक प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया और जन-बुद्धिजीवी समुदाय ने इस घटना को राजनीतिक संकेतों में परखा। बहुत लोगों ने शशि थरूर को यह कहकर घेरा कि यदि पार्टी की अवहेलना की जा रही थी, तो उन्हें कार्यक्रम से दूरी बनानी चाहिए थी।
कुछ टिप्पणीकारों का कहना था कि यदि वह पार्टी लाइन से असहमत हैं, तो सार्वजनिक रूप से पार्टी छोड़कर स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका अपनाना अधिक नैतिक कदम होगा।
प्रतीकात्मक निष्कर्ष
यह विवाद केवल एक डिनर निमंत्रण तक सीमित नहीं रहा। इसके अंदर प्रतीकात्मक राजनीति, लोकतांत्रिक परंपराएं, कूटनीतिक अवसर, व्यक्तिगत नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व के भाव छिपे हुए थे।
यह पहला अवसर नहीं जब किसी सरकारी समारोह में विपक्ष को प्राथमिकता नहीं दी गई, लेकिन इस बार मुद्दा अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति का था, इसलिए इसकी संवेदनशीलता बढ़ गई।
