तमिलनाडु के मदुरै जिले में स्थित अरुलमिगु सुब्रह्मणयम स्वामी मंदिर केवल धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि द्रविड़ संस्कृति, प्राचीन परंपरा और आध्यात्मिक इतिहास से जुड़े भावनात्मक केंद्र के रूप में जाना जाता है। इस पहाड़ी मंदिर को लंबे समय से दक्षिण भारत का अयोध्या बताया जाता रहा है, क्योंकि यहां भगवान मुरूगन की प्राचीन पूजा परंपराओं का उल्लेख लगभग 2300 वर्ष पूर्व के ग्रंथों में मिलता है। इसका स्थान भारतीय धार्मिक इतिहास और तमिल सभ्यता के निर्माण में निर्णायक माना गया है।

लेकिन इस मंदिर के बाहर स्थित शताब्दियों पुराने दीप स्तंभ को लेकर इन दिनों विवाद गहराता जा रहा है। यह विवाद सामान्य धार्मिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अधिकार और ऐतिहासिक परंपरा की पुनर्स्थापना के संघर्ष का रूप ले चुका है।
यह विवाद अदालतों में पहुंचा, राजनीतिक मंचों पर उछला, सांप्रदायिक तर्कों से प्रभावित हुआ और धार्मिक भावनाएं उसमें घुलती चली गईं। इस घटनाक्रम ने यह सवाल फिर जीवित कर दिया कि भारत में सांस्कृतिक विरासत अंतिम रूप से किसकी है? जनता की, शासन व्यवस्था की या न्यायालय की अनुमति का परिणाम है?
प्राचीन इतिहास और पहाड़ी मंदिर का महत्व
भगवान मुरूगन को दक्षिण भारत में युद्ध देवता, साहस शक्ति, बुद्धि और शौर्य के देवता के रूप में पूजा जाता रहा है। उनका प्रमुख धाम माना जाने वाला यह पहाड़ी मंदिर तमिल संगम काल के साहित्य में भी दर्ज है।
300 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी के बीच रचे गए कवित्व ग्रंथों में इस स्थल का वर्णन मिलता है। पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि यह स्थल धार्मिक सभाओं, शिक्षा, अनुष्ठानों और पत्थर शिल्प संस्कृति का केंद्र रहा है।
पहाड़ी पर स्थापित विशाल दीप स्तंभ के बारे में भी परंपरा है कि कार्तिक महीने में भक्त यहां दीप प्रज्ज्वलित कर भगवान मुरूगन की विजय, प्रकाश पूजा और आध्यात्मिक आशीर्वाद का आह्वान करते थे। स्थानीय परंपरा में इसे ज्ञान दीप या विजया दीप कहा गया है।
विवाद की जड़ कहां है
पहाड़ी के शिखर पर स्थित स्थल पर वर्षों पूर्व धार्मिक संरचना विकसित होने से विवाद की शुरुआत हुई। उस स्थान को दरगाह क्षेत्र माना जाने लगा और इसके बाद यह कहा गया कि दीप स्तंभ के पास दीप प्रज्ज्वलित करने से धार्मिक भावना प्रभावित होगी।
वहीं दूसरी तरफ मंदिर की ओर से यह तथ्य रखा गया था कि प्रिवी काउंसिल के निर्णय में स्पष्ट कहा गया था कि उस स्थान को छोड़कर पहाड़ी का बाहरी भाग मंदिर परिसर है।
क्या कहा गया था प्रिवी काउंसिल ने?
1931 के निर्णय में असाधारण रूप से दर्ज हुआ कि
“सीढ़ियों को छोड़कर संपूर्ण क्षेत्र मंदिर संपत्ति है।”
इस निर्णय का प्रभाव यह हुआ कि पहाड़ी पर धार्मिक गतिविधियां मंदिर परंपरा के आधार पर मान्य मानी गईं।
न्यायालय की हालिया कार्यवाही
एक दिसंबर को उच्च न्यायालय ने आदेश दिया:
दीप स्तंभ मंदिर क्षेत्र का हिस्सा है, अतः कार्तिक दीप जलाना रोका नहीं जा सकता।
यही आदेश राज्य प्रशासन के लिए चुनौती बन गया और राज्य को आरोप झेलना पड़ने लगा कि धार्मिक अधिकारों को मुस्लिम वोट बैंक के दबाव में सीमित किया जा रहा है।
दरगाह समिति ने दी सहमति
घटना का रोचक पक्ष यह रहा कि दरगाह कमेटी ने स्वयं यह घोषणा कर दी कि दीप जलाने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।
लेकिन इसके बावजूद प्रशासन ने अनुमति रोकी और सुरक्षा, विवाद संभावना और संवेदनशील क्षेत्र का हवाला दिया।
राजनीति में आग क्यों लगी
राजनीतिक दलों ने इसे सीधे सांस्कृतिक स्वामित्व और धार्मिक अधिकार से जोड़ दिया।
एक ओर कथन उभरा कि
“सदियों पुरानी परंपरा वापस मिले।”
दूसरी ओर प्रचार हुआ कि
“यह पर्व साम्प्रदायिक सद्भाव को प्रभावित करेगा।”
यही बिंदु चुनावी चर्चा, सभाओं, भाषणों, सोशल मीडिया अभियानों और पोस्टरों में फूट पड़ा।
भाजपा का रुख
भाजपा नेताओं ने इसे दक्षिण का अयोध्या बताया।
कारण:
पहाड़ी पर मूल पूजा स्थल का धार्मिक, ऐतिहासिक प्रमाण
तमिल संगम काल का उल्लेख
पूर्व न्यायिक निर्णय
स्थानीय परंपरा
उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि “दिव्य विरासत की पुनर्स्थापना” है।
डीएमके सरकार की असुविधा
शासन की स्थिति यह रही कि
जरूर आदेश को लागू करना पड़ेगा
लेकिन इससे मुसलमान समुदाय में नकारात्मक प्रतिक्रिया का डर है
चुनाव पूर्व यह घटना सरकार की चुनौती बन गई।
कानूनी स्ट्रेटेजी
पहले अवमानना प्रक्रिया शुरू हुई
फिर सरकार तत्काल सुप्रीम कोर्ट पहुंची
लेकिन राहत नहीं मिली
अब मामला विस्तार से सुना जाना तय है।
वोट बैंक समीकरण
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने स्पष्ट किया कि
लगभग छह प्रतिशत क्षेत्रीय मुस्लिम वोट महत्वपूर्ण हैं
उनकी असहजता सत्ता गणित को प्रभावित कर सकती है
जबकि दूसरी ओर हिंदू समुदाय में यह भाव तेजी से बढ़ा:
“अपना अधिकार वापस चाहिए”
प्रशासनिक कार्रवाई
दीप जलाने गए समर्थकों को हिरासत
नेता की गिरफ्तारी
जुलूस रोके गए
पुलिस बल बढ़ा
जिससे माहौल और तनावपूर्ण हो गया।
स्थानीय वातावरण पर असर
स्थानीय दुकानों, पर्यटन स्थलों और आसपास के क्षेत्रों में अस्थिरता महसूस हुई
यात्रियों की संख्या कुछ दिन घटी
लेकिन धार्मिक विश्वासियों का प्रवाह बढ़ा
स्थानीय व्यापारी पक्ष चाहते हैं कि विवाद समाप्त हो, क्योंकि इससे सांस्कृतिक पर्यटन के अवसर प्रभावित हो रहे हैं।
पुरातात्त्विक संदर्भ
पुराने शिलालेख बताते हैं कि दीप स्तंभ के पास धार्मिक उत्सव
कला नृत्य
संगीत अनुष्ठान
सैकड़ों वर्षों तक आयोजित होते रहे
यह बात राज्य अभिलेखागार में भी दर्ज है।
भविष्य की स्थिति कैसी बन सकती है
यह मामला केवल दीप जलाने पर नहीं रुकेगा।
वहां भविष्य में
सांस्कृतिक संगोष्ठियां
मंदिर परंपरा व्याख्यान
आस्था यात्राएं
सक्रिय रूप से बढ़ सकती हैं।
ऐतिहासिकता का पुनर्मूल्यांकन करने की चर्चा भी तेज है।
