भारत में सरकारी नौकरी हमेशा से ही सामाजिक सुरक्षा, स्थिर भविष्य और सम्मान का प्रतीक मानी जाती रही है। ऐसे में सरकारी नौकरियों से जुड़ा कोई भी बड़ा न्यायिक फैसला लाखों युवाओं और कर्मचारियों की ज़िंदगी को सीधे प्रभावित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण और मेरिट को लेकर जो ताजा फैसला सुनाया है, उसे हाल के वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाले निर्णयों में गिना जा रहा है। यह फैसला न केवल भर्ती प्रक्रियाओं को प्रभावित करेगा, बल्कि आने वाले समय में सामाजिक बहस की दिशा भी तय करेगा।

यह निर्णय राजस्थान हाईकोर्ट की एक भर्ती प्रक्रिया से जुड़े विवाद में आया, लेकिन इसका असर देशभर की केंद्र और राज्य सरकारों की सभी भर्तियों पर पड़ेगा। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि जनरल या अनरिजर्व्ड कैटेगरी किसी भी जाति या वर्ग के लिए आरक्षित नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह मेरिट आधारित होती है।
जनरल कैटेगरी की असली परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि ‘जनरल’, ‘ओपन’ या ‘अनरिजर्व्ड’ कैटेगरी का मतलब किसी विशेष जाति, समुदाय या सामाजिक वर्ग से नहीं है। यह कैटेगरी सभी उम्मीदवारों के लिए खुली होती है, चाहे वे किसी भी वर्ग से आते हों। यहां प्रवेश की एकमात्र शर्त योग्यता और मेरिट है।
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई SC, ST, OBC, MBC या EWS वर्ग का उम्मीदवार बिना किसी छूट या रियायत के जनरल कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे जनरल सूची में ही स्थान दिया जाएगा। ऐसे उम्मीदवार को उसकी आरक्षित कैटेगरी में डालना न केवल गलत है, बल्कि संविधान में दिए गए समानता के अधिकार के भी खिलाफ है।
मेरिट बनाम आरक्षण की बहस में नया मोड़
भारत में आरक्षण और मेरिट की बहस दशकों पुरानी है। एक ओर सामाजिक न्याय की दलील है, तो दूसरी ओर योग्यता आधारित चयन की मांग। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि आरक्षण का उद्देश्य अवसर देना है, न कि मेधावी उम्मीदवारों को सीमित करना।
कोर्ट का मानना है कि यदि आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार बिना किसी विशेष सुविधा के सामान्य कट-ऑफ पार करता है, तो उसे केवल उसकी जाति या वर्ग के कारण जनरल सीट से वंचित नहीं किया जा सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समानता के सिद्धांत के विपरीत होगा।
‘डबल बेनिफिट’ की दलील पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विवाद तथाकथित ‘डबल बेनिफिट’ को लेकर था। यह तर्क दिया गया कि यदि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार जनरल सीट पर चयनित होता है, तो उसे दोहरा लाभ मिल जाता है। एक ओर आरक्षण का फायदा और दूसरी ओर जनरल सीट।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब कोई उम्मीदवार बिना किसी रियायत के केवल अपनी योग्यता के दम पर चयनित होता है, तो उसे अतिरिक्त लाभ नहीं कहा जा सकता। बल्कि यदि ऐसे उम्मीदवारों को जनरल सूची से बाहर रखा जाए, तो यह उनके साथ अन्याय होगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आवेदन फॉर्म में अपनी जाति या वर्ग का उल्लेख करना केवल यह दर्शाता है कि उम्मीदवार आरक्षित श्रेणी का दावा कर सकता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह जनरल कैटेगरी के लिए अयोग्य है।
राजस्थान हाईकोर्ट भर्ती से शुरू हुआ पूरा विवाद
यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट की वर्ष 2022 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। अगस्त 2022 में हाईकोर्ट ने जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II के कुल 2756 पदों के लिए भर्ती निकाली थी। मई 2023 में जब परिणाम घोषित हुए, तो स्थिति चौंकाने वाली थी।
इस भर्ती में SC, OBC, MBC और EWS वर्गों का कट-ऑफ जनरल कैटेगरी से अधिक चला गया। कई ऐसे उम्मीदवार थे जिन्होंने जनरल कट-ऑफ पार कर लिया था, लेकिन अपनी आरक्षित कैटेगरी का कट-ऑफ पार नहीं कर पाए। इस आधार पर उन्हें अगले चरण की भर्ती प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया।
इन उम्मीदवारों ने इस निर्णय को चुनौती दी और मामला राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट का फैसला और सुप्रीम कोर्ट की मुहर
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट कहा कि जनरल सूची सबसे पहले शुद्ध मेरिट के आधार पर बनाई जानी चाहिए। जो उम्मीदवार जनरल कट-ऑफ पार करता है, उसे जनरल सूची में ही रखा जाएगा, चाहे वह किसी भी वर्ग से आता हो।
हाईकोर्ट प्रशासन ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन शीर्ष अदालत ने अपील खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया, बल्कि यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने अपनी गलती सुधारकर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की है।
पुराने फैसलों का हवाला और न्यायिक निरंतरता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पहले के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया। इनमें 1992 का इंद्रा साहनी मामला और सौरव यादव केस शामिल हैं। कोर्ट ने यह दोहराया कि जनरल कैटेगरी हमेशा से मेरिट आधारित रही है और इसमें किसी भी तरह का जातिगत आरक्षण लागू नहीं होता।
इसके अलावा कोर्ट ने सितंबर 2023 के CISF भर्ती मामले का भी उल्लेख किया, जहां यह कहा गया था कि यदि भर्ती नियमों में स्पष्ट रोक न हो, तो आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार जनरल पोस्ट पर चयनित हो सकता है, भले ही उसने कुछ मानकों में छूट ली हो।
सुप्रीम कोर्ट के रुख में ऐतिहासिक बदलाव
विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायिक दृष्टिकोण में आए बदलाव को दर्शाता है। 1990 से पहले कोर्ट आरक्षण को समानता के अधिकार का हिस्सा मानता था, लेकिन बाद में यह स्पष्ट किया गया कि आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक सक्षम बनाने वाला प्रावधान है।
अब कोर्ट का झुकाव अधिक स्पष्ट रूप से मेरिट की ओर दिखाई देता है। यह फैसला इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका सामाजिक न्याय और योग्यता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए क्या बदलेगा
इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन लाखों युवाओं पर पड़ेगा जो सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं। अब प्रतियोगिता और अधिक कड़ी होगी, क्योंकि सभी वर्गों के मेधावी उम्मीदवार जनरल सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगे।
जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए यह फैसला चिंता का कारण नहीं, बल्कि निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा की गारंटी है। वहीं आरक्षित वर्ग के प्रतिभाशाली उम्मीदवारों के लिए यह एक बड़ा अवसर है, क्योंकि अब वे बिना किसी बाधा के जनरल सीट हासिल कर सकते हैं।
इंटरव्यू और फाइनल मेरिट पर भी असर
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई उम्मीदवार लिखित परीक्षा में जनरल कट-ऑफ पार करता है, तो इंटरव्यू और आगे की प्रक्रिया में उसे जनरल उम्मीदवार माना जाएगा। इससे चयन प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनेगी।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि सरकारी नौकरियों में अब प्राथमिकता योग्यता को दी जाएगी, न कि केवल जाति या वर्ग को। यह निर्णय सामाजिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांत को मजबूत करता है।
यह फैसला न केवल वर्तमान भर्ती प्रक्रियाओं को प्रभावित करेगा, बल्कि आने वाले वर्षों में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में चयन के तरीकों को भी नई दिशा देगा।
