भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में गिनी जाने वाली अरावली पहाड़ियां एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही हालिया फैसले पर रोक लगाते हुए यह संकेत दिया है कि अरावली की परिभाषा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष निकालना पर्यावरण और समाज दोनों के लिए घातक हो सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस विषय में अभी कई ऐसे पहलू हैं, जिनकी गहन और स्वतंत्र जांच जरूरी है।

फैसले पर रोक क्यों लगी
बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की सिफारिशों के आधार पर अरावली पहाड़ियों की एक नई परिभाषा को स्वीकार किया था। इस परिभाषा के अनुसार, आसपास की जमीन से कम से कम सौ मीटर ऊंचाई वाले भूभाग को ही अरावली पहाड़ी माना जाना था। इसी फैसले के बाद देश के कई हिस्सों में विरोध शुरू हो गया। पर्यावरणविदों, स्थानीय समुदायों और सामाजिक संगठनों ने आशंका जताई कि इस परिभाषा से अरावली के बड़े हिस्से को कानूनी संरक्षण से बाहर कर दिया जाएगा।
इन प्रतिक्रियाओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अपने ही आदेश को अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया। अदालत ने माना कि इस मामले में और अध्ययन तथा व्यापक परामर्श की आवश्यकता है।
नई उच्चस्तरीय समिति का प्रस्ताव
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की परिभाषा से जुड़े सभी पुराने प्रयासों और समितियों की सिफारिशों की समीक्षा के लिए एक नई उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा है। इस समिति का उद्देश्य केवल कागजी परिभाषा तय करना नहीं, बल्कि अरावली के भूगर्भीय, पर्यावरणीय और सामाजिक महत्व को समग्र रूप से समझना होगा।
अदालत ने अटॉर्नी जनरल से भी अनुरोध किया है कि वे समिति की संरचना और कार्यक्षेत्र को लेकर न्यायालय की सहायता करें। इससे यह साफ हो गया है कि अदालत इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से ले रही है।
अगली सुनवाई और आगे की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक नई समिति अपनी रिपोर्ट नहीं दे देती और उस पर अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं आ जाता, तब तक 20 नवंबर के आदेश के प्रभाव को रोका जाएगा। इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को तय की गई है। तब तक अरावली से जुड़े सभी निर्णय यथास्थिति में रहेंगे।
अरावली का पर्यावरणीय महत्व
अरावली केवल पहाड़ियों का समूह नहीं है, बल्कि यह उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ मानी जाती है। यह श्रृंखला राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली तक फैली हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार अरावली रेगिस्तान के फैलाव को रोकने, भूजल को रिचार्ज करने और स्थानीय जलवायु को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती है।
छोटी-छोटी, झाड़ियों से ढकी पहाड़ियां भी इस प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये वर्षा जल को रोकने, मिट्टी के कटाव को कम करने और जैव विविधता को बनाए रखने में मदद करती हैं।
विरोध की वजह क्या रही
नई परिभाषा को लेकर सबसे बड़ा विरोध इस बात पर हुआ कि केवल ऊंचाई के आधार पर अरावली को परिभाषित करना वैज्ञानिक दृष्टि से अधूरा है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे कई ऐसी पहाड़ियां, जो सौ मीटर से कम ऊंची हैं लेकिन पर्यावरणीय रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं, संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी।
इसी आशंका के चलते गुरुग्राम, उदयपुर और अन्य शहरों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों में किसान, स्थानीय निवासी, पर्यावरणविद, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।
अरावली और जन आंदोलन
अरावली संरक्षण से जुड़े आंदोलनों का इतिहास लंबा रहा है। पहले भी जब इन पहाड़ियों पर खतरा बढ़ा, तब लोग सड़कों पर उतरे। आंदोलनकारियों का कहना है कि अरावली की रक्षा केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि लोगों की आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
विशेषज्ञों की राय
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्वत प्रणालियों की पहचान केवल ऊंचाई से नहीं, बल्कि उनके पारिस्थितिकीय योगदान से होती है। अरावली भी इसी कसौटी पर परखी जानी चाहिए। भूगर्भीय संरचना, वन्यजीवों का आवास, जल संरक्षण क्षमता और जलवायु संतुलन जैसे पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस मुद्दे पर राजनीतिक हलकों में भी हलचल रही। कई नेताओं ने अरावली को क्षेत्र की जीवनरेखा बताया और कहा कि अगर यह पर्वत श्रृंखला कमजोर हुई तो उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा रेगिस्तान में बदल सकता है। उनका कहना है कि दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों का अस्तित्व भी कहीं न कहीं अरावली से जुड़ा हुआ है।
सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार का कहना है कि नई परिभाषा का उद्देश्य अरावली की सुरक्षा को कमजोर करना नहीं, बल्कि नियमों में एकरूपता और स्पष्टता लाना था। सरकार का दावा है कि इससे खनन को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी और अवैध गतिविधियों पर लगाम लगेगी।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि संरक्षित वन क्षेत्रों, पर्यावरण संवेदनशील इलाकों और आर्द्रभूमियों में खनन पर पूरी तरह रोक रहेगी। केवल कुछ रणनीतिक और विशेष खनिजों के मामलों में ही कानून के तहत छूट दी जा सकती है।
खनन और विकास की बहस
अरावली का मुद्दा विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की बहस को भी उजागर करता है। एक ओर खनन और निर्माण को रोजगार और विकास से जोड़ा जाता है, वहीं दूसरी ओर इसके पर्यावरणीय नुकसान दीर्घकालिक और अपूरणीय हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट का ताजा कदम इसी संतुलन को खोजने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
आगे क्या संभावनाएं हैं
अब सबकी नजर नई समिति की रिपोर्ट पर टिकी है। यह रिपोर्ट तय करेगी कि अरावली की परिभाषा किस आधार पर होनी चाहिए और किस तरह इसे कानूनी रूप से सुरक्षित किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप यह संकेत देता है कि पर्यावरण से जुड़े मामलों में अदालत अब और ज्यादा सतर्क रुख अपना रही है।
निष्कर्ष
अरावली पर सुप्रीम कोर्ट का अपने ही फैसले पर रोक लगाना भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह दिखाता है कि जब किसी निर्णय के व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव सामने आते हैं, तो न्यायपालिका पुनर्विचार से पीछे नहीं हटती। आने वाले समय में यह मामला न केवल अरावली के भविष्य, बल्कि देश की पर्यावरणीय नीति की दिशा भी तय कर सकता है।
