देशभर में किसान आंदोलनों और उनकी आवाज़ के तरीकों को लेकर लगातार बहस जारी है। लेकिन नर्मदापुरम और इटारसी जिलों में हुई एक घटना ने इस चर्चा को और तेज़ कर दिया है। घटना तमिलनाडु से शुरू हुई और मध्य प्रदेश में आकर ठहर गई, जहाँ किसानों के एक बड़े समूह को उनकी मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही रोक दिया गया। सरकार के इस कदम ने न केवल उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ तेज़ कर दीं बल्कि इसने प्रशासनिक कार्रवाई और लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
यह कहानी सिर्फ ट्रेन से उतारे गए किसानों की नहीं है — यह कहानी है संघर्ष, अधिकारों, आवाज़, और उन समस्याओं की जो आज भी भारत के विशाल किसान समुदाय का पीछा नहीं छोड़तीं।

दिल्ली की राह में किसानों को अचानक रोका गया
सोमवार शाम लगभग वह समय था जब जीटी एक्सप्रेस नर्मदापुरम रेलवे स्टेशन से गुजरने वाली थी। ट्रेन में तमिलनाडु के लगभग 100 किसान सवार थे, जिनके पास अपने अधिकारों से जुड़ी मांगों को दिल्ली तक ले जाने की तैयारी थी। ये किसान राष्ट्रीय दक्षिण भारतीय नदी संपर्क किसान संगठन के बैनर तले लामबंद होकर राजधानी में प्रदर्शन करना चाहते थे।
लेकिन प्लेटफॉर्म पर उनका स्वागत किसी सामान्य यात्री की तरह नहीं हुआ। बड़ी संख्या में पुलिस बल मौजूद था, जिसे पहले से सूचना थी कि किसान दिल्ली की ओर प्रदर्शन के लिए बढ़ रहे हैं। जैसे ही ट्रेन पहुँची, पुलिस ने किसी भी आपत्ति या चर्चा का अवसर दिए बिना किसानों को ट्रेन से नीचे उतरने को कहा।
किसानों ने विरोध जताया, सवाल किए, लेकिन पुलिस का आदेश अटल था —
“सभी नीचे उतरें, आगे नहीं जा सकते।”
उनके लिए यह पल बेहद अप्रत्याशित था। दिल्ली तक पहुँचने का उनका रास्ता वहीं रुक गया।
पुलिस की कार्रवाई पर भड़का किसानों का गुस्सा — स्टेशन पर अर्धनग्न विरोध
जैसे ही किसान ट्रेन से उतारे गए, उनके भीतर आक्रोश दौड़ गया। वे कई दिनों की यात्रा करके, कई राज्यों से गुजरकर दिल्ली के लिए निकले थे। अचानक बीच रास्ते रोक देना उनके लिए अपमान की तरह लगा।
कुछ ही मिनटों में स्थिति गरम हो गई। नाराज़ किसानों ने स्टेशन परिसर में ही अर्धनग्न होकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विरोध अत्यंत प्रतीकात्मक था — यह दर्शाता था कि किसानों को उनके अधिकारों से “नंगा” कर दिया गया है, उनकी आवाज़ दबाई जा रही है, और उन्हें उनके संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करने से दूर रखा जा रहा है।
किसान तमिल भाषा में जोरदार नारे लगाने लगे। पुरुष किसान अर्धनग्न होकर रेल ट्रैक और प्लेटफॉर्म पर बैठ गए। बुजुर्गों के चेहरे पर असमंजस था, जबकि महिलाएँ भी इस निर्णय को अपमानजनक मानते हुए प्रशासन के खिलाफ खड़ी रहीं। यह दृश्य वहाँ मौजूद हर व्यक्ति को हिला देने वाला था।
प्रशासन मूकदर्शक — बाद में भोजन और ठहरने का इंतजाम
हंगामा बढ़ता देख प्रशासन तुरंत हरकत में आया। नर्मदापुरम शहर के एक निजी गार्डन में सभी किसानों को ले जाया गया, जहाँ व्यवस्था की गई —
- खाने का इंतजाम
- रात में रुकने की व्यवस्था
- अगली सुबह वापस भेजने की तैयारी
हालाँकि किसान दिल्ली जाना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया कि उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा। किसानों को यह फैसला गलत लगा। उनका कहना था कि वे किसी हिंसक आंदोलन में शामिल नहीं थे, वे तो केवल अपनी समस्याओं की आवाज़ दिल्ली तक पहुँचाना चाहते थे।
इटारसी में भी दोहराई गई वही कार्रवाई
नर्मदापुरम में हुए घटनाक्रम से कुछ घंटे पहले ही इटारसी स्टेशन पर यही कहानी दोहराई गई। इटारसी रेलवे स्टेशन पर तमिलनाडु एक्सप्रेस से लगभग 80 किसानों को उतारा गया। किसानों की जानकारी प्रशासन को पहले से मिल चुकी थी। पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल इन किसानों के लिए प्लेटफॉर्म पर पहले से ही तैनात थे।
उन्हें ट्रेन से उतारा गया, तुरंत बसों में बैठाया गया और नर्मदापुरम ले जाया गया। उन्हें भी वही पूर्व-निर्धारित गार्डन में ठहराया गया। दोनों जगहों की घटनाओं को मिलाकर कुल लगभग 180 किसान मध्य प्रदेश में रोक लिए गए।
किसानों का सवाल — “हमें दिल्ली जाने से क्यों रोका गया?”
किसानों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी वैधानिक कारण बताए रोका गया है। वे अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करना चाहते थे लेकिन सरकार ने उन्हें “धमकी” की तरह देखा। उनका कहना था:
- वे शांतिपूर्ण मार्च पर थे
- उनके पास आवश्यक दस्तावेज थे
- वे किसी अवैध गतिविधि में शामिल नहीं थे
- पुलिस ने उनके साथ बदसलूकी की
- उन्हें अपमानित किया गया
किसान नेताओं का कहना था कि यह राज्यों के बीच असमान व्यवहार का मामला भी है — दक्षिण भारत के किसानों को इस तरह रोकना “दक्षिण-उत्तर विभाजन” की मानसिकता जैसा लगता है।
प्रशासन की दलील — “कानून-व्यवस्था के खतरे की आशंका थी”
स्थानीय प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर कोई विस्तृत बयान नहीं दिया, लेकिन ऑफ-द-रिकॉर्ड सूत्रों से यह बात सामने आई: प्रदर्शनकारी समूह अचानक बहुत बड़ा हो सकता था, जिससे
- दिल्ली में कानून और व्यवस्था पर असर पड़ सकता था
- आंदोलन अनियंत्रित हो सकता था
- यातायात और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती थी
हालाँकि किसानों ने इन तर्कों को खारिज किया और कहा कि प्रशासन बिना कारण के उन्हें आंदोलन से रोक रहा है।
घटना ने खड़े किए कई बड़े सवाल
- क्या किसी समूह को दिल्ली जाने से रोकना लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है?
- क्या दक्षिण भारतीय किसानों के साथ भेदभाव हुआ?
- क्या सरकार आंदोलन से डर रही है?
- क्या पुलिस की यह कार्रवाई वैधानिक है?
- क्या किसानों को पहले से किसी तरह की सूचना दी गई थी?
यह घटना सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रही — सोशल मीडिया पर कुछ ही घंटों में वायरल होने लगी।
सोशल मीडिया पर बहस — “किसानों का अपमान” बनाम “सुरक्षा जरूरी”
सोशल मीडिया दो हिस्सों में बँट गया।
पहला पक्ष:
- इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन बता रहा है
- किसानों को अपमानित करने की घटना बता रहा है
- अर्धनग्न प्रदर्शन को “विवशता का प्रतीक” बता रहा है
दूसरा पक्ष:
- कह रहा है कि सुरक्षा और अनुमति प्रक्रिया आवश्यक है
- सरकार को बड़े प्रदर्शनों को नियंत्रित करने का अधिकार है
यह बहस अब बढ़ती जा रही है।
किसानों की मांगें क्या थीं?
ये किसान “नदी संपर्क योजना” से जुड़ी कई मांगों को लेकर दिल्ली पहुँच रहे थे। उनकी मुख्य मांगें थीं:
- दक्षिण भारत की नदियों को उत्तर भारत से जोड़ने की योजना लागू की जाए
- उनकी जमीनों और पानी के अधिकार सुरक्षित हों
- सूखा और जल संकट से राहत मिले
- सिंचाई की सुविधाएँ बराबरी के साथ मिले
वे इस विषय पर केंद्र सरकार का ध्यान चाहते थे।
नर्मदापुरम प्रशासन का अंतिम फैसला — “सभी किसान वापस भेजे जाएंगे”
रात देर तक चले ड्रामे और विरोध के बाद प्रशासन ने यह सुनिश्चित किया कि अगले दिन सभी किसानों को तमिलनाडु वापस भेज दिया जाएगा। उनके लिए विशेष बसें और ट्रेन टिकट की व्यवस्था की जा रही थी। किसानों ने जाने से पहले अपने गुस्से और निराशा को मीडिया के सामने खुलकर रखा।
किसानों की आवाज़ — “हम डरने वाले नहीं हैं”
प्रदर्शन में शामिल एक बुजुर्ग किसान ने कहा:
“हम अपने अधिकारों के लिए हजारों किलोमीटर चले हैं। ट्रेन से उतार देने से हमारा संघर्ष नहीं रुकेगा।”
एक महिला किसान ने कहा:
“हमें लगा जैसे अपराधी हों। क्या दिल्ली हमारी नहीं है?”
उनके शब्द और चेहरों पर छलकता दर्द इस पूरे घटनाक्रम की गहराई को समझाता था।
निष्कर्ष — यह घटना संघर्ष, व्यवस्था और अधिकारों की टकराहट का प्रतीक
नर्मदापुरम और इटारसी की यह घटना सिर्फ “ट्रेन से उतारे गए किसान” भर की कहानी नहीं है। यह उस जटिल वास्तविकता का प्रतिबिंब है जिसमें आज भी भारतीय किसान जी रहे हैं। यह मामला लोकतंत्र, अधिकार, सुरक्षा, संवेदनशीलता और प्रशासनिक व्यवहार की परतों को उजागर करता है।
