मध्य प्रदेश को वर्षों से ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता रहा है। यह पहचान केवल एक उपनाम नहीं बल्कि गर्व, संरक्षण और जैव विविधता की प्रतिबद्धता का प्रतीक मानी जाती रही है। लेकिन अब यही पहचान सवालों के घेरे में है। बीते छह वर्षों में प्रदेश में 262 बाघों की मौत ने इस गौरवशाली छवि को गहरी चोट पहुंचाई है। इनमें से लगभग 120 बाघों की मौत अवैध शिकार से जुड़ी होने की आशंका ने वन्यजीव संरक्षण तंत्र की कमजोरियों को उजागर कर दिया है।

यह आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि जंगलों में फैली उस खामोश चीख की गवाही देते हैं, जो न कैमरों में दिखती है और न ही फाइलों में ठीक से दर्ज होती है।
आंकड़ों के पीछे छुपा संकट
वर्ष 2019 से 2025 के बीच मध्य प्रदेश के विभिन्न टाइगर रिजर्व, नेशनल पार्क और संरक्षित वन क्षेत्रों से लगातार बाघों की मौत की खबरें सामने आती रहीं। साल 2025 में ही 54 बाघों की मृत्यु दर्ज की गई, जिसने वन विभाग और राज्य सरकार दोनों के दावों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए।
कई मामलों में मौत का कारण प्राकृतिक बताया गया, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे मामले भी हैं जिनमें जहर, करंट ट्रैप, फंदे और गोली लगने के संकेत मिले। यही वजह है कि विशेषज्ञ और वन्यजीव कार्यकर्ता मानते हैं कि असली आंकड़े इससे भी ज्यादा हो सकते हैं।
अवैध शिकार का अंतरराष्ट्रीय जाल
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बाघों के अवैध शिकार में अंतरराष्ट्रीय तस्कर गिरोहों की संलिप्तता की आशंका जताई जा रही है। बाघ की खाल, हड्डियां, दांत और अन्य अंग अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहद महंगे दामों पर बिकते हैं।
सूत्रों के अनुसार, यह तस्करी केवल स्थानीय शिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े हुए हैं। कुछ मामलों में इंटरपोल द्वारा वांछित तस्करों के नाम भी जांच के दायरे में आए हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह अपराध कितना संगठित और खतरनाक है।
जंगलों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
इतनी बड़ी संख्या में बाघों की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जंगलों की सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत है। टाइगर रिजर्व में तैनात वन रक्षक, गश्ती दल, कैमरा ट्रैप और तकनीकी निगरानी के बावजूद यदि शिकार हो रहा है, तो यह व्यवस्था की असफलता को दर्शाता है।
कई इलाकों में कर्मचारियों की कमी, सीमित संसाधन और भ्रष्टाचार के आरोप भी सामने आते रहे हैं। वनकर्मियों पर दबाव, लंबी ड्यूटी और अपर्याप्त सुविधाएं भी संरक्षण प्रयासों को कमजोर बनाती हैं।
टाइगर संरक्षण योजनाओं की सच्चाई
सरकार की ओर से समय-समय पर बाघ संरक्षण योजनाओं की घोषणाएं होती रही हैं। करोड़ों रुपये के बजट, आधुनिक तकनीक और सामुदायिक भागीदारी की बातें की जाती हैं। लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इन दावों से अलग नजर आती है।
कई संरक्षण योजनाएं कागजों में सफल दिखती हैं, जबकि जंगलों में बाघ असुरक्षित बने हुए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि संरक्षण केवल आंकड़ों और रिपोर्टों से नहीं, बल्कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और ईमानदार क्रियान्वयन से संभव है।
स्थानीय समुदाय और शिकार की मजबूरी
कुछ मामलों में यह भी सामने आया है कि स्थानीय ग्रामीण शिकार गिरोहों के दबाव में आ जाते हैं। गरीबी, बेरोजगारी और लालच के कारण उन्हें तस्करों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। यह समस्या केवल कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असंतुलन की भी है।
यदि स्थानीय समुदाय को संरक्षण का भागीदार नहीं बनाया गया, तो जंगलों की सुरक्षा अधूरी ही रहेगी।
पर्यावरण संतुलन पर गहरा असर
बाघ केवल एक जानवर नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखने वाली प्रजाति है। बाघों की संख्या घटने से जंगलों में शाकाहारी जानवरों की संख्या असंतुलित हो जाती है, जिससे वनस्पति और जैव विविधता पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।
इसका सीधा असर जल स्रोतों, जलवायु और मानव जीवन पर भी पड़ता है। इसलिए बाघों की मौत केवल वन्यजीव संकट नहीं, बल्कि पर्यावरणीय आपदा का संकेत है।
जांच और जवाबदेही की जरूरत
इतनी बड़ी संख्या में मौतों के बावजूद यदि जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो यह समस्या और गंभीर होती जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि हर बाघ की मौत की स्वतंत्र, पारदर्शी और समयबद्ध जांच होनी चाहिए।
केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरे नेटवर्क को उजागर करना जरूरी है जो इस अवैध कारोबार को चला रहा है।
क्या टाइगर स्टेट की पहचान खतरे में है
मध्य प्रदेश ने वर्षों की मेहनत से टाइगर स्टेट की पहचान बनाई थी। लेकिन अगर यही स्थिति बनी रही, तो यह पहचान खोखली साबित हो सकती है। बाघों की संख्या बढ़ाने के दावे तब तक बेमानी हैं, जब तक उनकी सुरक्षा सुनिश्चित न हो।
आज जरूरत है आत्ममंथन की, सख्त कार्रवाई की और ईमानदार प्रयासों की, ताकि आने वाली पीढ़ियां बाघ को केवल किताबों और तस्वीरों में न देखें।
