मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से महज़ बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित केकड़िया गांव, बाहर से देखने पर एक सामान्य ग्रामीण इलाका लगता है। लेकिन जैसे ही इस गांव की गलियों और घरों में कदम रखते हैं, शिक्षा की जमीनी हकीकत सामने आने लगती है। लगभग चार हजार की आबादी वाला यह गांव भोपाल जिले का सबसे बड़ा आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जिसे पर्यटन ग्राम का दर्जा भी दिया गया है। शहर की चमक-दमक से इतनी नज़दीकी के बावजूद यहां की आदिवासी बेटियों के सपने आठवीं कक्षा के बाद अक्सर अधूरे रह जाते हैं।

आठवीं के बाद क्यों रुक जाती है पढ़ाई
केकड़िया गांव में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की व्यवस्था तो है, लेकिन जैसे ही बेटियां आठवीं कक्षा पास करती हैं, उनके सामने एक कठिन सवाल खड़ा हो जाता है। आगे पढ़ना है या नहीं। गांव में हाई स्कूल की सुविधा नहीं है। नजदीकी हाई स्कूल करीब सात किलोमीटर दूर स्थित है, जहां तक पहुंचने का रास्ता जंगल से होकर गुजरता है। न बस है, न ऑटो, न कोई सुरक्षित परिवहन साधन।
सुबह-सुबह जंगल के रास्ते पैदल जाना और शाम को वापस लौटना, यह सोचकर ही कई परिवार सहम जाते हैं। जंगली जानवरों का डर, सुनसान रास्ता और सुरक्षा को लेकर चिंता अभिभावकों को बेटियों को आगे पढ़ाने से रोक देती है।
जंगल का रास्ता और डर की परछाइयां
जिस रास्ते से होकर छात्राओं को स्कूल जाना पड़ता है, वह पूरी तरह जंगल से घिरा है। बरसात के दिनों में यह रास्ता और भी खतरनाक हो जाता है। कीचड़, फिसलन और पानी से भरे नाले इस सफर को और कठिन बना देते हैं। कई बार जंगली जानवरों के दिखने की घटनाएं भी सामने आती हैं।
बेटियों के माता-पिता के लिए यह सिर्फ दूरी का सवाल नहीं, बल्कि सुरक्षा और सम्मान का भी मुद्दा है। ग्रामीण समाज में आज भी बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंता सबसे बड़ी वजह बन जाती है, जिसके चलते शिक्षा पीछे छूट जाती है।
शिक्षा अभियानों की जमीनी सच्चाई
सरकार की ओर से स्कूल चलें हम अभियान, नई शिक्षा नीति और ड्रॉपआउट कम करने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। कागजों में आंकड़े बेहतर दिखते हैं, लेकिन केकड़िया जैसे गांवों में इन अभियानों की हकीकत कुछ और ही बयां करती है।
यहां प्राथमिक स्तर पर नामांकन तो अच्छा है, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर पहुंचते-पहुंचते छात्राओं की संख्या तेजी से घट जाती है। कारण साफ है, सुविधा और सुरक्षा का अभाव।
बेटियों के सपने और मजबूरी
केकड़िया गांव की कई बेटियां डॉक्टर, टीचर या पुलिस बनने का सपना देखती हैं। लेकिन आठवीं के बाद यह सपना अक्सर घर की चारदीवारी में कैद हो जाता है। कुछ परिवारों में जल्दी शादी का दबाव होता है, तो कुछ में घरेलू जिम्मेदारियां पढ़ाई पर भारी पड़ जाती हैं।
बेटियां खुद भी चाहती हैं कि वे आगे पढ़ें, लेकिन रोज सात किलोमीटर जंगल पार करना उनके लिए आसान नहीं है। कई बार परिवारों ने शुरुआत में स्कूल भेजने की कोशिश की, लेकिन डर और असुरक्षा के चलते पढ़ाई छुड़वा दी।
लड़कों और लड़कियों की शिक्षा में फर्क
गांव में यह फर्क साफ दिखाई देता है कि लड़कों की पढ़ाई आठवीं के बाद भी जारी रहती है, जबकि लड़कियों की संख्या धीरे-धीरे कम हो जाती है। लड़कों के लिए जंगल का रास्ता उतना बड़ा मुद्दा नहीं बनता, लेकिन बेटियों के मामले में समाज ज्यादा सतर्क और सख्त हो जाता है।
यह फर्क सिर्फ सोच का नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।
परिवहन की सबसे बड़ी कमी
अगर केकड़िया गांव से हाई स्कूल तक कोई नियमित बस या सरकारी परिवहन सुविधा होती, तो हालात काफी हद तक बदल सकते थे। कई अभिभावकों का मानना है कि सुरक्षित बस सेवा मिलने पर वे अपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए जरूर तैयार हो जाएंगे।
लेकिन अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था जमीन पर नजर नहीं आती। निजी साधन गरीब आदिवासी परिवारों की पहुंच से बाहर हैं।
शिक्षकों और स्थानीय लोगों की चिंता
गांव के शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता इस स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ हैं। उनका कहना है कि अगर गांव में ही हाई स्कूल खोल दिया जाए या परिवहन सुविधा उपलब्ध करा दी जाए, तो ड्रॉपआउट की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।
वे मानते हैं कि शिक्षा सिर्फ स्कूल खोलने से नहीं, बल्कि सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करने से पूरी होती है।
सरकार और प्रशासन से उम्मीदें
ग्रामीणों की मांग है कि शिक्षा को लेकर नीति बनाते समय जमीनी परिस्थितियों को समझा जाए। राजधानी के इतने पास होने के बावजूद अगर बेटियां पढ़ाई से वंचित हैं, तो यह व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
केकड़िया जैसे गांवों में शिक्षा के लिए विशेष योजना, छात्रावास, स्थानीय हाई स्कूल या सुरक्षित परिवहन जैसी सुविधाएं समय की मांग बन चुकी हैं।
सामाजिक बदलाव की जरूरत
इस समस्या का समाधान सिर्फ सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि सामाजिक सोच में बदलाव से भी जुड़ा है। जब तक बेटियों की शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक ऐसी कहानियां सामने आती रहेंगी।
केकड़िया की बेटियां आज भी उम्मीद लगाए बैठी हैं कि एक दिन उनके गांव में भी ऐसा स्कूल होगा, जहां तक पहुंचने के लिए जंगल पार नहीं करना पड़ेगा।
निष्कर्ष
केकड़िया गांव की कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उन हजारों आदिवासी बस्तियों की हकीकत है, जहां शिक्षा का रास्ता आज भी मुश्किलों से भरा है। आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर आदिवासी बेटियां यह सवाल पूछती हैं कि क्या शिक्षा का अधिकार सिर्फ कागजों तक सीमित है या जमीन पर भी उतरेगा।
