दुनिया की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में प्रवेश कर चुकी है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद वैश्विक मंच पर अमेरिका की भूमिका को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। जिस अमेरिका ने दशकों तक लोकतंत्र, मानवाधिकार और संप्रभुता का पाठ पढ़ाया, वही अब खुले तौर पर सैन्य शक्ति और दबाव की भाषा बोलता नजर आ रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनका नया घोषित सिद्धांत है, जिसे उन्होंने ‘डोनरो डॉक्ट्रिन’ नाम दिया है।

वेनेजुएला में राष्ट्रपति को किसी आतंकी की तरह पकड़ने की कार्रवाई ने न केवल लैटिन अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया को चौंका दिया। इसके बाद ट्रंप की प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘डोनरो डॉक्ट्रिन’ का जिक्र होना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि यह महज एक देश तक सीमित कार्रवाई नहीं है, बल्कि अमेरिका की बदली हुई वैश्विक रणनीति का हिस्सा है।
डोनरो डॉक्ट्रिन को समझने के लिए इतिहास में झांकना जरूरी है। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिका के राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने एक सिद्धांत प्रस्तुत किया था, जिसे मोनरो डॉक्ट्रिन कहा गया। इसका मूल उद्देश्य यह था कि यूरोपीय शक्तियां अमेरिकी महाद्वीप में किसी भी तरह का उपनिवेश विस्तार न करें। उस समय इसे अमेरिका की सुरक्षा और स्वतंत्रता के लिए जरूरी कदम बताया गया था। धीरे-धीरे यही सिद्धांत अमेरिका की विस्तारवादी नीति का आधार बन गया।
समय के साथ मोनरो डॉक्ट्रिन का इस्तेमाल अमेरिका ने अपने हितों के लिए कई देशों में दखल देने के औचित्य के रूप में किया। क्यूबा, निकारागुआ, हैती और डोमिनिकन रिपब्लिक जैसे देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप इसी नीति के तहत सही ठहराया गया। अब दो सदियों बाद डोनाल्ड ट्रंप उसी विचार को नए नाम और नए तेवर के साथ सामने ला रहे हैं।
ट्रंप का कहना है कि पश्चिमी गोलार्ध अमेरिका का क्षेत्र है और यहां किसी भी ऐसे देश या ताकत को पनपने नहीं दिया जाएगा, जो अमेरिकी हितों के खिलाफ हो। वेनेजुएला के मामले में ट्रंप ने खुलकर कहा कि वहां की तेल इंडस्ट्री पर चीन, रूस और ईरान का प्रभाव अमेरिका की विदेश नीति के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है। यही तर्क देकर उन्होंने कार्रवाई को जायज ठहराने की कोशिश की।
अमेरिकी विदेश विभाग ने भी इसी सोच को सार्वजनिक मंच पर रखा। सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा गया कि यह अमेरिका का गोलार्ध है और राष्ट्रपति ट्रंप किसी भी कीमत पर राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे। इस बयान ने कई देशों को असहज कर दिया, क्योंकि यही तर्क रूस ने यूक्रेन पर हमला करते समय दिया था। तब अमेरिका ने रूस को आक्रामक और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करने वाला देश बताया था। अब वही अमेरिका खुद उसी भाषा में बात करता दिखाई दे रहा है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी एक इंटरव्यू में साफ कहा कि पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका अपने दुश्मनों, प्रतिद्वंद्वियों और विरोधियों को ऑपरेशन का आधार नहीं बनाने देगा। इस बयान ने यह संकेत दे दिया कि अमेरिका अब केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर सीधी कार्रवाई भी करेगा।
वेनेजुएला पर हमले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगला निशाना कौन होगा। ट्रंप की नजर अब ग्रीनलैंड पर बताई जा रही है। ग्रीनलैंड भले ही डेनमार्क का हिस्सा हो, लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक रूप से बेहद अहम बनाती है। आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों और संसाधनों की होड़ के बीच अमेरिका वहां अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। इससे यह आशंका भी पैदा हो गई है कि क्या अमेरिका नाटो के भीतर ही किसी तरह का टकराव मोल ले सकता है।
इसके अलावा ट्रंप ने कोलंबिया को भी खुले तौर पर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि अगर कोलंबिया ने अमेरिकी हितों के खिलाफ कदम उठाए, तो उसे भी वेनेजुएला जैसा अंजाम भुगतना पड़ सकता है। यह बयान अपने आप में लैटिन अमेरिका के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है।
क्यूबा को लेकर भी ट्रंप के बयान कम चिंताजनक नहीं हैं। उन्होंने कहा है कि क्यूबा जल्द गिरने वाला है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब क्यूबा पहले से ही आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि डोनरो डॉक्ट्रिन केवल एक नीति नहीं, बल्कि अमेरिका की उस बेचैनी का प्रतीक है, जो उसे बदलते वैश्विक संतुलन में महसूस हो रही है। चीन और भारत जैसे देश तेजी से उभर रहे हैं और अमेरिका की एकतरफा ताकत को चुनौती दे रहे हैं। ऐसे में अमेरिका अपने प्रभाव क्षेत्र को किसी भी कीमत पर बचाए रखना चाहता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भी अमेरिका ने साफ लिखा है कि वर्षों की अनदेखी के बाद अब वह पश्चिमी गोलार्ध में अपना वर्चस्व फिर से स्थापित करेगा। इसका मतलब साफ है कि आने वाले समय में अमेरिका इस क्षेत्र में राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य दखल बढ़ा सकता है।
यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों के लिए भी चुनौती है। अगर हर शक्तिशाली देश अपने प्रभाव क्षेत्र को बचाने के नाम पर दूसरे देशों में सरकारें गिराने लगे, तो वैश्विक व्यवस्था अराजकता की ओर बढ़ सकती है।
वेनेजुएला की घटना के बाद वैश्विक नेताओं की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है। अधिकांश देशों ने खुलकर प्रतिक्रिया नहीं दी है, मानो किसी को ट्रंप की नाराजगी का डर हो। यह स्थिति बताती है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर शक्ति संतुलन किस तरह बदल रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप का डोनरो डॉक्ट्रिन दरअसल मोनरो सिद्धांत का ही आधुनिक और ज्यादा आक्रामक संस्करण है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब अमेरिका इसे खुले तौर पर लागू करने की बात कर रहा है।
आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि वेनेजुएला के बाद अमेरिका किस दिशा में कदम बढ़ाता है। ग्रीनलैंड, कोलंबिया, क्यूबा या कोई और देश, लेकिन इतना तय है कि पश्चिमी गोलार्ध में तनाव बढ़ने वाला है।
यह दौर केवल अमेरिका और उसके निशाने पर आए देशों के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। क्योंकि अगर डोनरो डॉक्ट्रिन सफल होता है, तो यह वैश्विक राजनीति की दिशा ही बदल सकता है।
