पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच बढ़ते तनाव ने दक्षिण एशिया में नई राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों को जन्म दिया है। हाल ही में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने पाकिस्तान और तालिबान के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश की थी, लेकिन यह प्रयास पूरी तरह विफल रहा। तुर्की का मकसद इस विवाद में शांति स्थापित करना और क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना था, लेकिन पाकिस्तानी और तालिबानी दोनों पक्षों की आपसी असहमति ने इस मध्यस्थता को सफल नहीं होने दिया।

तुर्की ने कई बार तालिबान और पाकिस्तान के नेताओं को अंकारा बुलाकर वार्ता कराई, लेकिन दोनों पक्षों में कोई सहमति नहीं बन पाई। अफगान सरकार ने पाकिस्तानी दवाब और अवैध शर्तों को खारिज कर दिया, जिससे तुर्की को इस प्रयास से पीछे हटना पड़ा। इस स्थिति ने एर्दोगन और उनकी विदेश नीति को बड़ा झटका दिया।
पाकिस्तान और तालिबान के बीच बढ़ते तनाव की पृष्ठभूमि
पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तालिबान के शासन के बाद सीमा और सुरक्षा के मुद्दे लगातार गंभीर बने हुए हैं। पाकिस्तान की सेना ने हाल ही में तालिबान के खिलाफ हवाई हमले किए, जिसके जवाब में तालिबान ने सख्त रुख अपनाया। इस तनाव का परिणाम यह हुआ कि सीमा पर व्यापार पूरी तरह से बंद हो गया और पाकिस्तान को करोड़ों डॉलर का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
तालिबान ने भारत से मदद लेना शुरू कर दिया। भारत के समर्थन से तालिबान ने पाकिस्तान की रणनीति को विफल करने का प्रयास किया। तालिबान अब चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल कर रहा है, जिससे उसकी निर्भरता पाकिस्तानी कराची पोर्ट पर कम हो गई है।
तुर्की का मध्यस्थता प्रयास और विफलता
तुर्की ने गाजा से लेकर सोमालीलैंड तक अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन पाकिस्तान और तालिबान के बीच विवाद की जटिलता ने इसे असफल कर दिया। तुर्की ने बार-बार दोनों पक्षों को अंकारा बुलाया और वार्ता कराने का प्रयास किया। लेकिन पाकिस्तान अपनी सुरक्षा और टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) के संदर्भ में कड़े रुख पर था।
टीटीपी आतंकवादी पाकिस्तानी सेना के लिए खतरा बन चुके हैं। ये लगातार हमले कर रहे हैं, जिससे पाकिस्तान तालिबान से मांग कर रहा है कि वे आतंकियों को सौंप दें और डूरंड लाइन पर 5 किलोमीटर का बफर जोन बनाएँ। अफगान तालिबानी सरकार ने इसे अवैध शर्त मानते हुए खारिज कर दिया।
तुर्की ने कतर और सऊदी अरब के प्रयासों के साथ तालिबान पर दबाव बनाने की कोशिश की, लेकिन तालिबानी नेतृत्व ने पाकिस्तान की मांगों को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। यह स्थिति तुर्की के लिए कड़ी चुनौती बन गई और उसे मध्यस्थता से पीछे हटना पड़ा।
भारत की भूमिका और चाबहार पोर्ट का महत्व
तालिबान अब भारत के समर्थन पर निर्भर हो गया है। ईरान में स्थित चाबहार पोर्ट के जरिए तालिबान को भारत से दवाइयां और आवश्यक सामग्री मिल रही है। इससे पाकिस्तानी व्यापारियों को गंभीर आर्थिक झटका लगा है। भारत की यह मदद अफगान तालिबानी सरकार की स्वतंत्रता और पाकिस्तान के दबाव को टालने की क्षमता को मजबूत कर रही है।
तालिबान के लिए चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इससे पाकिस्तान की सीमाओं पर दबाव कम हुआ है और तालिबान अब मध्य एशियाई देशों के साथ भी संबंध स्थापित कर रहा है।
पाकिस्तान की प्रतिक्रिया और सऊदी अरब की आशा
पाकिस्तान ने चेतावनी दी है कि अगर उसके देश पर कोई बड़ा आतंकी हमला होता है तो इसे तालिबान की जिम्मेदारी माना जाएगा। उसने कहा है कि अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाया जाएगा, जिसमें हवाई हमले भी शामिल हो सकते हैं।
सऊदी अरब अब केवल एक ऐसा देश है जो पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच शांति स्थापित कर सकता है। पाकिस्तान की कतर पर नाराजगी बढ़ रही है क्योंकि उसने तालिबान का पक्ष लेने का आरोप लगाया है।
टीटीपी आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा
टीटीपी आतंकवाद पाकिस्तान के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। तालिबान को पाकिस्तान की मांगों के तहत आतंकियों को सौंपना पड़ा तो यह उसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका कमजोर करने जैसा होगा। अफगान तालिबानी सरकार ने साफ कर दिया कि यह देश की संप्रभुता और सुरक्षा को खतरे में डालने वाले किसी दबाव को स्वीकार नहीं करेगी।
भविष्य की संभावनाएँ और क्षेत्रीय रणनीति
तालिबान की भारत और चाबहार पोर्ट के साथ साझेदारी अब पाकिस्तान की रणनीति को चुनौती दे रही है। तुर्की, कतर और सऊदी अरब के प्रयास फिलहाल विफल दिखाई दे रहे हैं। दक्षिण एशिया में सुरक्षा, व्यापार और राजनीतिक संतुलन पर इसका गहरा असर होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान और तालिबान के बीच संबंधों में तनाव बढ़ेगा। तालिबान भारत और ईरान से सहयोग लेकर अपनी रणनीति को और मजबूत करने की कोशिश करेगा। पाकिस्तान की सीमा और व्यापार पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा।
