रूस-यूक्रेन युद्ध ने पिछले कई वर्षों में वैश्विक राजनीति की परिभाषाएँ बदल दी हैं। सैन्य संघर्ष, मानवीय संकट, अर्थव्यवस्था की जंग, ऊर्जा-अधिकार और सुरक्षा-गतिशीलता—इन सभी पहलुओं ने विश्व शक्तियों को अपने-अपने मोर्चों पर निर्णय लेने के लिए मजबूर किया। इसी दिशा में सोमवार की शाम ब्रिटेन के लंदन शहर में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई, जिसने यूरोपीय-अमेरिकी शक्ति समीकरणों को फिर से संतुलित करने का प्रयास किया। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीएर स्टार्मर से मुलाकात की। इस मुलाकात का आज का संदर्भ केवल एक राजनयिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक मोड़ था।

यह बैठक ऐसे समय में हुई जब अमेरिका ने युद्ध समाप्त करने के लिए एक विस्तृत और विभाजन-आधारित शांति-योजना सामने रखी है। यह योजना केवल युद्धविराम नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक समझौते का प्रारूप है। इस योजना में वह सवाल सबसे बड़ा है जिसका उत्तर कोई स्पष्ट रूप से नहीं देना चाहता—क्या यूक्रेन को डोनबास क्षेत्र या उसके किसी हिस्से को रूस को सौंपना पड़ेगा? यदि ऐसा होता है, तो क्या इसे स्थायी शांति माना जा सकेगा, या यह आने वाले वर्षों में एक नया संघर्ष-बिंदु बनेगा?
यही प्रश्न लंदन के 10 डाउनिंग स्ट्रीट में नेताओं की मेज़ के केंद्र में रहा।
क्यों लंदन बना चर्चा का मंच? राजनीतिक गणनाएं और कूटनीतिक संकेत
लंदन को इस बैठक के लिए चुनना केवल भौगोलिक सुविधा नहीं था। यूरोप की भू-राजनीति में आज ब्रिटेन एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। ब्रेक्ज़िट के बाद उसकी भूमिका यूरोपीय संघ के बाहर रहते हुए भी सामरिक रूप से भीतर ही सक्रिय बनी हुई है। ब्रिटिश सरकार समझती है:
● ऊर्जा सुरक्षा
● रक्षा खरीद
● हथियार आपूर्ति
● साइबर-सुरक्षा ढांचा
इन सभी क्षेत्रों में यूक्रेन युद्ध ने ब्रिटेन को प्राथमिक स्तंभ की स्थिति दी है।
इसके अलावा, ब्रिटेन वह देश है जिसने आरंभ से ही रूस के विरुद्ध कठोर प्रतिबंधों को लागू करने में अग्रणी भूमिका निभाई। ऐसे में जेलेंस्की का यह दौरा केवल समर्थन-प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक संदेश-संकेत भी था—
“युद्ध-निर्णय यूरोप तय करेगा, दबाव नहीं बनाएगा।”
बैठक के आरंभ में प्रधानमंत्री कीएर स्टार्मर ने कहा—
“हम जेलेंस्की पर किसी समझौते का दबाव नहीं डालेंगे। शांति न्यायपूर्ण और स्थायी होनी चाहिए।”
यह बयान अमेरिका-यूक्रेन के बीच बनते तनाव को संतुलित करने जैसा था।
अमेरिका की योजना—जिसे पढ़ भी नहीं पाया यूक्रेन?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में यह दावा किया था कि—
“जेलेंस्की ने प्रस्ताव को अब तक पढ़ा तक नहीं।”
यह टिप्पणी केवल व्यक्तिगत तंज नहीं थी। इसके पीछे रणनीतिक अर्थ था। ट्रंप प्रशासन चाहता है कि—
युद्ध लंबा न चले, बल्कि किसी समझौता-रूप में शांत हो जाए।
इसके पीछे अमेरिका के कई आंतरिक कारण हैं—
● रक्षा-व्यय पर बढ़ता दबाव
● घरेलू राजनीतिक दबाव
● नई एशियाई प्राथमिकताएं
● चीन के साथ प्रतिस्पर्धा
अमेरिका का सोचना है कि
“यूक्रेन को जो नहीं बचाया जा सकता, उसे गंवाकर युद्ध रोक दिया जाए।”
लेकिन यूक्रेन ऐसा क्यों नहीं कर रहा?
क्योंकि उसका राजनीतिक अस्तित्व उसी भूमि पर टिका है।
कीव के लिए यह सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है—
यह पहचान है, सेना-स्थिति है, उद्योग-बुनियादी ढांचा है और जनसंख्या की सुरक्षा है।
सवाल यह है—
अगर समझौते में डोनबास रूस को जाता है, तो क्या भविष्य में वह क्षेत्र कभी लौट सकेगा?
यही वह बिंदु है जहां यूरोप अब अमेरिकी दबाव से अलग राय बना रहा है।
मैक्रों, मर्ज और स्टार्मर—तीनों के दृष्टिकोण अलग-अलग क्यों?
फ्रांस का दृष्टिकोण
फ्रांस कई वर्षों से यूरोप को सामरिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की बात करता रहा है। मैक्रों चाहते हैं—
● यूरोप की सुरक्षा केवल NATO-निर्भर न रहे
● यूक्रेन को दी जाने वाली न्यूनतम सुरक्षा किसी भी युद्धविराम से बड़ी हो
मैक्रों का उद्देश्य स्पष्ट है:
“रूस को इस युद्ध से रणनीतिक लाभ न मिले।”
जर्मनी का रुख
जर्मनी ने भारी सैन्य सहायता नहीं दी, लेकिन आर्थिक सहयोग सबसे अधिक दिया।
चांसलर मर्ज ने बैठक में कहा—
“कुछ बिंदुओं पर आपत्तियां हैं, इसी कारण हम यहाँ हैं। आने वाले दिन महत्वपूर्ण होंगे।”
जर्मनी की समस्या—
यदि युद्ध चलता रहा, तो यूरोप का ऊर्जा-संतुलन फिर संकट में जाएगा।
ब्रिटेन का रुख
ब्रिटेन हमेशा यूक्रेन का पूर्ण समर्थन करता रहा है।
ब्रिटेन का रुख—
“यदि युद्ध रुकेगा तो यूक्रेन की संप्रभुता कम नहीं होनी चाहिए।”
यूक्रेन क्या चाहता है?
जेलेंस्की ने स्पष्ट कहा—
“कुछ फैसले अकेले यूक्रेन नहीं कर सकता। यूरोप और अमेरिका दोनों की भूमिका अनिवार्य है।”
उनका मुख्य जोर इस बात पर है—
यूक्रेन को केवल युद्ध विराम नहीं चाहिए, बल्कि:
● स्थायी सुरक्षा समझौता
● अंतरराष्ट्रीय निगरानी तंत्र
● भविष्य में हमले का प्रतिबंध
यदि यह नहीं मिला तो युद्ध रुकने का अर्थ होगा—
“एक नया संघर्ष केवल रुका हुआ है, खत्म नहीं हुआ।”
युद्ध की जमीन पर ड्रोन-हमले जारी
जब कूटनीतिक भवन में बैठक चल रही थी, तब युद्धभूमि पर आग जारी रही।
सोमवार रात—
● ओखतिरका में ऊंची इमारतों पर हमले
● चेर्निहाइव में विस्फोट
● द्रोनों से 7 घायल
● किंडरगार्टन और गैस लाइनें प्रभावित
यूक्रेन ने दावा किया—
रूस ने 149 ड्रोन छोड़े, जिनमें 131 को नष्ट किया गया।
रूस ने पलटकर कहा—
“हमने 67 यूक्रेनी ड्रोन मार गिराए।”
कौन सच बोल रहा है?
यह युद्धों में कभी स्पष्ट नहीं होता।
सत्य दोनों में रहता है, लेकिन प्रमाण धुएँ में खो जाते हैं।
क्या यह युद्ध अब समाप्ति की ओर? या एक नए बंटवारे की ओर?
लंदन की बैठक ने एक बात तो स्पष्ट कर दी—
अब युद्ध का भविष्य केवल हथियार या मोर्चों से तय नहीं होगा।
निर्णय होगा—
किसके पास सामरिक सहनशीलता अधिक है?
● रूस—समय को हथियार बनाकर
● अमेरिका—फैसलों को तेज करके
● यूरोप—संतुलन बनाकर
● यूक्रेन—अपनी संप्रभुता बचाकर
अगले कुछ हफ्ते निर्णायक हो सकते हैं।
या छठे वर्ष में भी युद्ध जारी रह सकता है।
