दक्षिण एशिया की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। बांग्लादेश में फरवरी 2026 में होने वाले आम चुनावों से पहले अमेरिका का झुकाव जिस तरह जमात-ए-इस्लामी की ओर दिख रहा है, उसने नई दिल्ली से लेकर ढाका तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यह वही जमात-ए-इस्लामी है, जिसे लंबे समय तक कट्टरपंथी संगठन माना जाता रहा है, जिस पर बांग्लादेश में कई बार प्रतिबंध लग चुका है और जिसे भारत अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से संदेह की नजर से देखता आया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान की संभावित नजदीकी को लेकर जो संकेत सामने आए हैं, वे केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं हैं। इसका असर भारत-अमेरिका रिश्तों, भारत-बांग्लादेश संबंधों और पूरे दक्षिण एशिया की भू-राजनीति पर पड़ सकता है।
अमेरिकी आकलन और चुनावी गणित
अमेरिकी मीडिया में आई रिपोर्टों के मुताबिक, वॉशिंगटन का आकलन है कि बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी आगामी चुनावों में अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। इसी संभावना को देखते हुए अमेरिकी प्रशासन उसके साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
यह बदलाव इसलिए भी अहम है क्योंकि जमात-ए-इस्लामी को पारंपरिक रूप से पाकिस्तान समर्थक और कट्टर इस्लामी विचारधारा वाली पार्टी माना जाता रहा है। इसके बावजूद अमेरिका का यह मानना है कि बदलते राजनीतिक माहौल में जमात एक प्रभावशाली ताकत बनकर उभर सकती है, जिसे नज़रअंदाज़ करना भविष्य की रणनीति के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास और विवाद
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास बांग्लादेश में बेहद विवादास्पद रहा है। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान इस संगठन के कई नेताओं पर आम नागरिकों पर अत्याचार और पाकिस्तानी सेना का साथ देने के गंभीर आरोप लगे। उस दौर में जमात अलग बांग्लादेश के गठन का विरोध कर रही थी, क्योंकि उसके अनुसार यह इस्लामी पहचान के खिलाफ था।
इसके बाद के दशकों में भी जमात का नाम कई बार सांप्रदायिक हिंसा और अल्पसंख्यकों के खिलाफ घटनाओं से जोड़ा गया। भारत में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हुए हिंदू विरोधी दंगों में भी जमात से जुड़े संगठनों पर आरोप लगे। यही वजह है कि बांग्लादेश में अलग-अलग सरकारों ने समय-समय पर इस संगठन पर प्रतिबंध लगाए।
शेख हसीना का दौर और प्रतिबंध
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के शासनकाल में जमात-ए-इस्लामी पर सबसे कड़ा रुख अपनाया गया। उनके कार्यकाल में इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया गया और उसके कई नेताओं पर कानूनी कार्रवाई हुई। शेख हसीना को भारत का करीबी नेता माना जाता रहा है, और उनके शासन में भारत-बांग्लादेश संबंध अपेक्षाकृत मजबूत रहे।
हालांकि सत्ता से हटने के बाद शेख हसीना भारत में रह रही हैं और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने उन्हें दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। भारत ने उन्हें ढाका को सौंपने से इनकार किया, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में और तनाव आ गया।
जमात की बदली हुई रणनीति
हाल के वर्षों में जमात-ए-इस्लामी ने अपनी सार्वजनिक छवि को नरम करने की कोशिश की है। पार्टी अब खुद को भ्रष्टाचार विरोधी, पारदर्शिता और सुशासन की समर्थक के रूप में पेश कर रही है। जमात के प्रवक्ता मोहम्मद रहमान का कहना है कि पार्टी शरिया कानून लागू करने की कोई योजना नहीं रखती और महिलाओं के काम के घंटों को लेकर जो बातें कही गई थीं, वे अभी केवल प्रारंभिक विचार हैं।
इस बदली हुई भाषा और रणनीति का उद्देश्य स्पष्ट है। जमात अब खुद को मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा दिखाना चाहती है ताकि उसे व्यापक जनसमर्थन मिल सके और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता बढ़े।
अमेरिकी राजनयिकों के संकेत
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ढाका में तैनात एक अमेरिकी राजनयिक ने बंद कमरे की बैठक में कहा कि बांग्लादेश अब “इस्लामी हो चुका है” और जमात-ए-इस्लामी फरवरी के चुनाव में पहले से कहीं बेहतर प्रदर्शन करेगी। इस राजनयिक का यह भी कहना था कि अमेरिका चाहता है कि जमात उसके “दोस्त” बने।
हालांकि अमेरिकी दूतावास की ओर से आधिकारिक बयान में कहा गया कि अमेरिका किसी एक पार्टी का पक्ष नहीं लेता और बांग्लादेश के लोग जिस सरकार को चुनेंगे, अमेरिका उसके साथ काम करेगा। इसके बावजूद राजनयिकों के इन संकेतों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
आर्थिक दबाव और अमेरिकी रणनीति
अमेरिकी राजनयिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर जमात सत्ता में आती है और ऐसी नीतियां अपनाती है जो वॉशिंगटन को स्वीकार नहीं होंगी, तो अमेरिका आर्थिक दबाव डाल सकता है। खासतौर पर बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग का जिक्र किया गया है, जो अमेरिकी बाजार पर काफी हद तक निर्भर है।
यह बयान बताता है कि अमेरिका राजनीतिक संवाद के साथ-साथ आर्थिक हथियार का इस्तेमाल भी अपनी रणनीति में शामिल कर रहा है।
भारत की चिंता क्यों बढ़ रही है
भारत के लिए जमात-ए-इस्लामी हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। भारत ने 2019 में जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी के चैप्टर को गैरकानूनी संगठन घोषित किया था और 2024 में भी इस पर प्रतिबंध जारी रखा गया।
भारत को डर है कि अगर बांग्लादेश में जमात सत्ता या मजबूत प्रभाव हासिल करती है, तो इसका असर सीमा सुरक्षा, आतंकवाद और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है। जमात को पाकिस्तान समर्थक मानने की धारणा भी भारत की चिंता को बढ़ाती है।
भारत-अमेरिका संबंधों पर असर
विश्लेषकों का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी के साथ अमेरिकी संपर्क भारत-अमेरिका संबंधों में एक और दरार पैदा कर सकता है। पहले से ही दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद चल रहे हैं, जिनमें व्यापार, टैरिफ, रूस से तेल खरीद और पाकिस्तान से जुड़े मसले शामिल हैं।
अगर अमेरिका बांग्लादेश में ऐसे राजनीतिक समूह के साथ नजदीकी बढ़ाता है, जिसे भारत अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है, तो यह विश्वास की कमी को और गहरा कर सकता है।
बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति
बांग्लादेश का इतिहास राजनीतिक उथल-पुथल से भरा रहा है। 1971 में आज़ादी के बाद से देश ने सैन्य तख्तापलट, तानाशाही और लोकतांत्रिक सरकारों के दौर देखे हैं। अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के बीच सत्ता संघर्ष ने भी देश की राजनीति को अस्थिर बनाए रखा।
अब जब शेख हसीना सत्ता से बाहर हैं और अंतरिम सरकार काम कर रही है, तब जमात-ए-इस्लामी को मुख्यधारा में लाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव बांग्लादेश की राजनीति की दिशा ही बदल सकता है।
पत्रकारों और विशेषज्ञों की राय
बांग्लादेश और भारत के कई वरिष्ठ पत्रकारों ने अमेरिकी नीति पर सवाल उठाए हैं। कुछ का कहना है कि इस तरह के ऑडियो लीक और रिपोर्ट्स के पीछे गहरी साजिश हो सकती है, जबकि अन्य इसे बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत मानते हैं।
विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि अमेरिका का यह रुख केवल जमात तक सीमित नहीं है, बल्कि वह बांग्लादेश में उभर रहे सभी इस्लामी राजनीतिक आंदोलनों के साथ संवाद के लिए तैयार है।
निष्कर्ष: दक्षिण एशिया के लिए बड़ा मोड़
अमेरिका और जमात-ए-इस्लामी के बीच बढ़ती नजदीकी केवल एक देश की राजनीति का मामला नहीं है। यह पूरे दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है। भारत के लिए यह स्थिति नई चुनौतियां लेकर आ सकती है, जबकि बांग्लादेश के लिए यह एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत हो सकती है।
आने वाले महीनों में बांग्लादेश के चुनाव और उसके बाद बनने वाली सरकार यह तय करेगी कि यह नजदीकी किस दिशा में जाती है और इसका क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या असर पड़ता है।
