अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। अमेरिका की एक अहम रक्षा रिपोर्ट ने न केवल चीन को नाराज़ कर दिया है, बल्कि भारत और पाकिस्तान को लेकर की गई टिप्पणियों ने एशिया की सुरक्षा राजनीति में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है, जब वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन तेजी से बदल रहा है और सैन्य, आर्थिक तथा रणनीतिक प्रतिस्पर्धा नए स्तर पर पहुंच चुकी है।

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय द्वारा अमेरिकी कांग्रेस को सौंपी गई इस वार्षिक रिपोर्ट में चीन की सैन्य क्षमताओं, उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं और पड़ोसी देशों के साथ उसके संबंधों पर विस्तृत विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट का केंद्र बिंदु चीन की बढ़ती सैन्य ताकत, उसके क्षेत्रीय दावे और भारत तथा पाकिस्तान के साथ उसके संबंध रहे हैं।
चीन की तीखी प्रतिक्रिया और कूटनीतिक असहजता
रिपोर्ट सामने आते ही चीन ने इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। बीजिंग का कहना है कि अमेरिका लगातार वही आरोप दोहरा रहा है और इस तरह की रिपोर्ट्स वैश्विक रणनीतिक स्थिरता को नुकसान पहुंचा सकती हैं। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बयान जारी कर कहा कि अमेरिका अपने ही सैन्य विस्तार और परमाणु आधुनिकीकरण को सही ठहराने के लिए चीन को निशाना बना रहा है।
चीन का यह भी कहना है कि अमेरिका खुद दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु शक्ति है और उसे हथियारों की दौड़ को बढ़ावा देने के बजाय निरस्त्रीकरण की दिशा में जिम्मेदारी निभानी चाहिए। इस प्रतिक्रिया से साफ है कि अमेरिका और चीन के बीच अविश्वास की खाई अभी भी गहरी बनी हुई है।
रिपोर्ट में भारत-चीन संबंधों का विश्लेषण
अमेरिकी रिपोर्ट में भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बीते कुछ वर्षों से चले आ रहे तनाव का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि हाल के समय में दोनों देशों के बीच रिश्तों में कुछ सुधार के संकेत मिले हैं, लेकिन आपसी अविश्वास अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन एलएसी पर तनाव को सीमित स्तर तक कम करके इसका रणनीतिक लाभ उठाना चाहता है। इसका एक उद्देश्य भारत के साथ संबंधों को स्थिर करना बताया गया है, जबकि दूसरा उद्देश्य अमेरिका और भारत के बीच बढ़ती नजदीकी को संतुलित करना माना जा रहा है।
इस संदर्भ में रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि उच्च-स्तरीय बैठकों और संवाद के माध्यम से दोनों देशों ने सीमा प्रबंधन और द्विपक्षीय संपर्क बढ़ाने पर सहमति जताई है। इसमें सीधी उड़ानों की बहाली, वीजा प्रक्रिया में सुधार और शैक्षणिक व मीडिया आदान-प्रदान जैसे विषय शामिल बताए गए हैं।
भारत की सतर्कता और रणनीतिक संतुलन
हालांकि रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारत चीन के इरादों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। सीमा विवाद, सैन्य गतिविधियां और क्षेत्रीय दावे भारत के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। लगातार बनी रहने वाली आशंकाएं और सीमित विश्वास द्विपक्षीय रिश्तों की गति को प्रभावित कर सकते हैं।
भारत की रणनीति इस समय संतुलन बनाए रखने की रही है, जहां वह एक ओर चीन के साथ संवाद बनाए रखता है, वहीं दूसरी ओर अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ अपने रिश्तों को भी मजबूत करता है।
अरुणाचल प्रदेश और क्षेत्रीय दावों का ज़िक्र
अमेरिकी रिपोर्ट में चीन के तथाकथित ‘मुख्य हितों’ का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि चीन ने अपने राष्ट्रीय हितों की परिभाषा को व्यापक करते हुए ताइवान, दक्षिण चीन सागर, सेनकाकू द्वीप समूह और भारत के अरुणाचल प्रदेश को भी इसमें शामिल कर लिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, इन क्षेत्रों को लेकर चीन किसी भी प्रकार के समझौते की गुंजाइश नहीं देखता और इन्हें अपनी संप्रभुता से जोड़कर देखता है। यह रुख क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
चीन की सैन्य रणनीति और दीर्घकालिक लक्ष्य
रिपोर्ट में चीन की दीर्घकालिक रणनीति पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि चीन वर्ष 2049 तक एक शक्तिशाली राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। इस विज़न के तहत वह एक ऐसी सेना विकसित करना चाहता है, जो आधुनिक तकनीक से लैस हो और किसी भी संघर्ष में प्रभावी भूमिका निभा सके।
इस रणनीति में चीन की सैन्य क्षमताओं का तेजी से विस्तार, नई मिसाइल प्रणालियों का विकास और वैश्विक स्तर पर प्रभाव बढ़ाने की कोशिश शामिल है।
इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों पर दावा
रिपोर्ट में सबसे अधिक चर्चा उस दावे को लेकर हुई है, जिसमें कहा गया है कि चीन ने अपनी नई सैन्य सुविधाओं में बड़ी संख्या में इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात की हैं। इस दावे को चीन ने सिरे से खारिज करते हुए इसे अमेरिका की एकतरफा सोच बताया है।
अमेरिकी विश्लेषण के अनुसार, इस तरह की तैनाती से चीन की परमाणु जवाबी क्षमता मजबूत हो सकती है। वहीं चीन का कहना है कि इस तरह के आरोप वैश्विक तनाव को बढ़ाने वाले हैं।
पाकिस्तान और चीन की बढ़ती नजदीकी
रिपोर्ट में चीन और पाकिस्तान के संबंधों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। इसमें कहा गया है कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग लगातार गहराता जा रहा है। चीन ने पाकिस्तान को आधुनिक लड़ाकू विमान, नौसैनिक उपकरण और अन्य सैन्य तकनीक उपलब्ध कराई है।
इस सहयोग को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के संदर्भ में अहम माना जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि चीन द्वारा विकसित किए गए कुछ लड़ाकू विमानों में कई अन्य देश भी रुचि दिखा रहे हैं।
सैन्य सहयोग से आगे रणनीतिक साझेदारी
चीन और पाकिस्तान का संबंध केवल सैन्य आपूर्ति तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देश रणनीतिक साझेदारी को नए स्तर पर ले जाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसमें बुनियादी ढांचे, रक्षा उत्पादन और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
इस सहयोग का असर दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति पर भी पड़ सकता है, जिसे लेकर भारत और अन्य देशों की नजर बनी हुई है।
वैश्विक समुद्री मार्गों में चीन की दिलचस्पी
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि चीन कुछ महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों और क्षेत्रों में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहा है। इसमें अफ्रीका और मध्य पूर्व के कुछ हिस्सों का भी उल्लेख किया गया है।
इन क्षेत्रों को वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। चीन की बढ़ती दिलचस्पी को उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं से जोड़कर देखा जा रहा है।
अमेरिका-चीन रिश्तों का वर्तमान परिदृश्य
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिका और चीन के बीच संवाद के कुछ चैनल खुले हुए हैं और दोनों पक्ष तनाव कम करने के उपायों पर बातचीत कर रहे हैं। इसमें सैन्य स्तर पर संपर्क बढ़ाने और गलतफहमियों को दूर करने की कोशिशों का उल्लेख किया गया है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रयासों के बावजूद दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और अविश्वास बना रहेगा।
निष्कर्ष
अमेरिकी रक्षा रिपोर्ट पर चीन की नाराज़गी केवल एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत भी है। भारत और पाकिस्तान का इसमें शामिल होना दिखाता है कि दक्षिण एशिया अब वैश्विक रणनीति का एक अहम हिस्सा बन चुका है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिका, चीन, भारत और पाकिस्तान अपने-अपने हितों के बीच संतुलन कैसे साधते हैं और क्या यह संतुलन क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करेगा या नई चुनौतियां पैदा करेगा।
