वैश्विक टेक्नोलॉजी और व्यापार जगत में एक बार फिर अमेरिका और चीन के रिश्ते चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच लंबे समय से जारी टैरिफ युद्ध, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक तनाव के बीच ट्रंप प्रशासन ने सेमीकंडक्टर सेक्टर को लेकर बड़ा फैसला लिया है। इस फैसले ने न सिर्फ अमेरिकी कंपनियों बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़े तमाम देशों को अस्थायी राहत दी है।

अमेरिका ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चीन से आयात होने वाले सेमीकंडक्टर चिप्स पर नए टैरिफ तत्काल लागू नहीं किए जाएंगे। ट्रंप प्रशासन के अनुसार यह टैरिफ 23 जून 2027 से प्रभावी होंगे। यानी फिलहाल करीब डेढ़ साल तक चीनी सेमीकंडक्टर चिप्स पर कोई नया शुल्क नहीं लगाया जाएगा और मौजूदा जीरो-ड्यूटी व्यवस्था बनी रहेगी।
सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए यह घोषणा इसलिए भी अहम है क्योंकि आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले चिप्स लगभग हर क्षेत्र में इस्तेमाल हो रहे हैं। मोबाइल फोन, लैपटॉप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमोबाइल, रक्षा उपकरण और हेल्थ टेक्नोलॉजी तक में सेमीकंडक्टर की भूमिका निर्णायक है।
ट्रंप प्रशासन का रुख और उसका कारण
अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव के बयान के मुताबिक चीन की ओर से सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री पर दबदबा बनाने की कोशिशों को अमेरिका गैर-वाजिब मानता है। अमेरिका का आरोप है कि चीन सरकारी सब्सिडी, राज्य समर्थित कंपनियों और आक्रामक औद्योगिक नीतियों के जरिए वैश्विक चिप बाजार में अनुचित बढ़त हासिल करना चाहता है।
हालांकि इन आरोपों के बावजूद ट्रंप प्रशासन ने यह भी माना है कि अचानक टैरिफ लगाने से अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं को बड़ा झटका लग सकता है। अमेरिका की कई टेक कंपनियां अभी भी चीनी सप्लाई चेन पर निर्भर हैं। ऐसे में तुरंत टैरिफ लगाने से लागत बढ़ने, उत्पादन बाधित होने और महंगाई बढ़ने का खतरा है।
इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने टैरिफ को 2027 तक टालने का फैसला लिया है। यह कदम रणनीतिक रूप से अमेरिका को समय देता है ताकि वह घरेलू सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत कर सके और वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार कर सके।
बाइडेन प्रशासन की जांच और उसका असर
यह फैसला उस एक साल लंबी जांच के बाद सामने आया है, जिसकी शुरुआत बाइडेन प्रशासन के कार्यकाल में हुई थी। इस जांच का मकसद यह समझना था कि चीनी सेमीकंडक्टर आयात अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यापार और तकनीकी नेतृत्व पर किस तरह असर डाल रहे हैं।
जांच में यह बात सामने आई कि चीन का चिप उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और वह कुछ क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियों को कड़ी चुनौती दे रहा है। हालांकि यह भी स्वीकार किया गया कि तत्काल टैरिफ लगाने से अमेरिका को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इसीलिए ट्रंप प्रशासन ने जांच के निष्कर्षों को आधार बनाते हुए एक चरणबद्ध रणनीति अपनाने का फैसला किया। इसके तहत पहले चेतावनी दी गई, फिर टैरिफ की घोषणा को आगे के लिए टाल दिया गया।
2027 तक का समय क्यों अहम है
2027 तक का समय अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस दौरान अमेरिका अपने देश में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने पर जोर देगा। कई बड़े निवेश पहले ही घोषित किए जा चुके हैं, जिनका उद्देश्य अमेरिका को चिप निर्माण में आत्मनिर्भर बनाना है।
इसके अलावा अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर एक मजबूत और सुरक्षित सप्लाई चेन तैयार करना चाहता है। इसमें एशिया, यूरोप और अन्य तकनीकी रूप से सक्षम देशों की भूमिका अहम मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2027 तक अमेरिका इस स्थिति में आ सकता है कि उसे चीनी चिप्स पर उतनी निर्भरता न रहे। तब टैरिफ लगाने का असर सीमित होगा और घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिलेगा।
चीनी सामान पर आगे क्या असर पड़ सकता है
हालांकि फिलहाल सेमीकंडक्टर चिप्स पर टैरिफ टाल दिए गए हैं, लेकिन यह साफ है कि अमेरिका का रुख नरम नहीं हुआ है। चिप इंडस्ट्री से जुड़ी एक और जांच के नतीजों का इंतजार किया जा रहा है, जिसके आधार पर अन्य चीनी टेक्नोलॉजी उत्पादों पर भी शुल्क लगाया जा सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वे स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और जरूरत पड़ने पर सख्त कदम उठाए जाएंगे। इसका मतलब यह है कि 2027 तक भले ही राहत हो, लेकिन आगे चलकर व्यापार तनाव फिर बढ़ सकता है।
वैश्विक बाजार की प्रतिक्रिया
इस घोषणा के बाद वैश्विक बाजारों में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली है। टेक कंपनियों ने राहत की सांस ली है क्योंकि अचानक लागत बढ़ने का खतरा टल गया है। वहीं निवेशकों को यह संकेत भी मिला है कि अमेरिका और चीन के बीच तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि उसे फिलहाल टाल दिया गया है।
एशियाई बाजारों में सेमीकंडक्टर कंपनियों के शेयरों में स्थिरता देखी गई, जबकि अमेरिकी टेक सेक्टर में भी सकारात्मक माहौल बना। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है।
भारत और अन्य देशों के लिए क्या मायने
भारत जैसे देशों के लिए यह फैसला अहम है क्योंकि वे भी वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का हिस्सा बनना चाहते हैं। अमेरिका-चीन तनाव के चलते कई कंपनियां वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग हब तलाश रही हैं। भारत इस मौके का फायदा उठाने की कोशिश में है।
अगर अमेरिका 2027 के बाद सख्त टैरिफ लागू करता है, तो इससे चीन के बाहर चिप मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिल सकता है। यह भारत, वियतनाम और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए अवसर पैदा कर सकता है।
टैरिफ से आगे की रणनीति
ट्रंप प्रशासन का यह फैसला दिखाता है कि अमेरिका अब केवल टैरिफ पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति पर काम कर रहा है। घरेलू उत्पादन बढ़ाना, तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देना और सहयोगी देशों के साथ साझेदारी मजबूत करना इस रणनीति के प्रमुख हिस्से हैं।
सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में प्रतिस्पर्धा केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक शक्ति संतुलन से भी जुड़ी हुई है। यही वजह है कि अमेरिका इस क्षेत्र में हर कदम सोच-समझकर उठा रहा है।
आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका 2027 में वास्तव में टैरिफ लागू करता है या फिर हालात को देखते हुए रणनीति में फिर बदलाव करता है। फिलहाल इतना तय है कि चीनी सेमीकंडक्टर पर टैरिफ टालने का फैसला वैश्विक टेक जगत के लिए एक बड़ी अस्थायी राहत है।
