विश्व राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीच एक नया मोड़ आ गया है। अमेरिका ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित रेको डीक खदान में 1.3 बिलियन डॉलर का निवेश करने का ऐलान किया है। यह कदम अमेरिका के हालिया ‘प्रोजेक्ट वॉल्ट’ का हिस्सा है, जिसे पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2 फरवरी, 2026 को लॉन्च किया था। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी उद्योग और सुरक्षा के लिए आवश्यक क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति सुनिश्चित करना और चीन पर उनकी निर्भरता कम करना है।

बलूचिस्तान को अक्सर खजानों की धरती कहा जाता रहा है। यहां की बंजर भूमि के भीतर विशाल सोने, तांबे और रेयर अर्थ मिनरल्स का भंडार मौजूद है। रेको डीक खदान को दुनिया का सबसे बड़ा गोल्ड-कॉपर डिपॉजिट माना जाता है। यहां अनुमानित 5.9 बिलियन टन अयस्क मौजूद है, जिसमें लगभग 0.41 प्रतिशत तांबा और 41.5 मिलियन औंस सोने का भंडार शामिल है। यह खजाना अफगानिस्तान की सीमा तक फैले चागाई पहाड़ों में स्थित है, जो ज्वालामुखी चेन का हिस्सा है।
प्रोजेक्ट वॉल्ट और अमेरिका का रणनीतिक कदम
‘प्रोजेक्ट वॉल्ट’ को डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के ‘स्ट्रैटेजिक क्रिटिकल मिनरल्स रिजर्व’ के निर्माण के लिए शुरू किया है। इसका मकसद चीन के दबदबे को चुनौती देना और ग्लोबल मार्केट को नया आकार देना है। इस प्रोजेक्ट के तहत अमेरिका ने 10 अरब डॉलर का लोन मंजूर किया है, जबकि कुल प्रोजेक्ट का खर्च 12 अरब डॉलर होगा। इसमें अमेरिका के अंदर कई माइनिंग और प्रोसेसिंग प्रोजेक्ट्स शामिल हैं, लेकिन विदेश में किया गया एकमात्र बड़ा निवेश रेको डीक खदान में है।
अमेरिका का लक्ष्य बलूचिस्तान की खनिज संपदा को सुरक्षित रूप से हासिल करना और उसे अपने डिफेंस, इलेक्ट्रिक वाहन और टेक्नोलॉजी सेक्टर के लिए इस्तेमाल करना है। इसके पीछे चीन की सप्लाई चेन पर बढ़ती पकड़ को चुनौती देना भी मुख्य कारण है।
बलूचिस्तान का खजाना
रेको डीक खदान में तांबा, सोना और कई रेयर अर्थ मिनरल्स का विशाल भंडार है। यह क्षेत्र न केवल खनिज संपदा से समृद्ध है, बल्कि इसकी भौगोलिक स्थिति और रणनीतिक महत्व भी विशेष है। चागाई पहाड़ों में स्थित यह खदान पाकिस्तान के लिए आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों का भी केंद्र रही है।
पिछले वर्षों में, चीन भी इस क्षेत्र में निवेश और अनुसंधान में रुचि रखता रहा है। लेकिन अब अमेरिका ने भी इस क्षेत्र में कदम रखा है। 2011 में पाकिस्तान ने चिली और कनाडा की कंपनियों को माइनिंग राइट्स देने से मना कर दिया था, और मामला इंटरनेशनल कोर्ट तक पहुंचा। अब अमेरिका ने 1.3 बिलियन डॉलर का निवेश कर इस परियोजना को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है।
सुरक्षा और राजनीतिक जोखिम
बलूचिस्तान में अलगाववादी मूवमेंट और सुरक्षा संबंधी समस्याएं हैं। बावजूद इसके, अमेरिका ने निवेश को प्राथमिकता दी है। यह दिखाता है कि अमेरिका इस क्षेत्र के खनिज संसाधनों को लेकर गंभीर है और इसे चीन के प्रभाव से बचाने के लिए रणनीतिक कदम उठा रहा है। रेको डीक में अमेरिकी निवेश का उद्देश्य केवल खनिज हासिल करना नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार में अमेरिकी प्रभुत्व सुनिश्चित करना भी है।
प्रोजेक्ट वॉल्ट का वैश्विक महत्व
प्रोजेक्ट वॉल्ट सिर्फ अमेरिका के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक खनिज बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण है। अमेरिका इस प्रोजेक्ट के माध्यम से चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। यह प्रोजेक्ट इलेक्ट्रिक कार, उन्नत तकनीकी उपकरणों और डिफेंस सेक्टर में उपयोग होने वाले महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करेगा। रेको डीक खदान में निवेश करने से अमेरिका को उच्च गुणवत्ता वाले सोने, तांबे और रेयर अर्थ मिनरल्स सीधे हासिल होंगे।
बलूचिस्तान में अमेरिकी कदम का असर
पाकिस्तान के लिए यह निवेश आर्थिक रूप से लाभकारी हो सकता है, लेकिन इसमें कई राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियां हैं। अमेरिका का यह कदम पाकिस्तान के खजाने पर सीधे प्रभाव डालता है। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी यह एक बड़ी जिम्मेदारी है कि विदेशी निवेश सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से हो।
निष्कर्ष
अमेरिका ने बलूचिस्तान के सोने और तांबे के भंडार पर अपनी नजर गड़ा दी है। 1.3 बिलियन डॉलर के निवेश के साथ अमेरिका न केवल चीन की सप्लाई चेन पर चुनौती डाल रहा है, बल्कि वैश्विक खनिज बाजार में अपनी प्रभुत्व की स्थिति भी मजबूत कर रहा है। रेको डीक खदान में निवेश के फैसले ने क्षेत्रीय राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य को नया मोड़ दिया है।
