दिसंबर के शुरूआती सप्ताह में अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में एक नई हलचल पैदा हो गई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने दावा किया कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन युद्ध के अंत की दिशा में गंभीर इच्छा प्रकट कर चुके हैं। ये वह युद्ध है जिसने यूरोप की रणनीतिक स्थिति, विश्व की ऊर्जा आधारशिला, रक्षा-नीतियों तथा वैश्विक आर्थिक समीकरणों को झकझोरकर रख दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध वर्ष 2022 में शुरू हुआ था और लगभग चार साल से अधिक समय से यह संघर्ष न केवल सैन्य, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।

ट्रंप ने ओवल ऑफिस में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दावा किया कि एक विशेष अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने मॉस्को में पुतिन के साथ लंबी बैठक की और उस बैठक से यह संकेत स्पष्ट हुआ कि रूस बातचीत के माध्यम से युद्ध को समाप्त करने को इच्छुक है। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान के बाद न केवल विश्लेषकों में बहस शुरू हो गई, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस संभावना से उत्साहित दिखाई दिया कि शायद लंबे समय से चल रही हिंसा और तनाव आखिरकार शांति-समाधान के रास्ते तक पहुंच सके।
मॉस्को में पांच घंटे की बैठक और युद्ध-विराम की उम्मीद
यह बैठक लगभग पांच घंटे चली, जिसमें अमेरिकी शांति-समाधान विशेष दूतों ने क्षेत्रीय समझौते, भविष्य में सुरक्षा गारंटी, यूक्रेन की पुनर्निर्माण आवश्यकताओं तथा रूस की रणनीतिक चिंताओं पर विस्तृत चर्चा की। इस वार्ता की विशेषता यह रही कि इसमें सिर्फ संघर्ष विराम की चर्चा नहीं की गई, बल्कि युद्ध के बाद यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था कैसी होगी, इस पर भी गंभीर विमर्श हुआ।
बैठक में शामिल दूतों में स्टीव व्हिटकॉफ और जेरेड कुशनर प्रमुख थे। हालांकि आधिकारिक स्तर पर बैठक का ब्यौरा बहुत सीमित रूप से साझा किया गया, किंतु ट्रंप के संकेत एक ऐसे मोड़ का संकेत देते दिखे जहां से वार्ता गंभीर तर्ज पर शुरू हो सकती है।
यूक्रेन मुद्दे पर रूस का दृष्टिकोण अब पहले जैसा आक्रामक नहीं दिख रहा। बीते महीनों में आर्थिक प्रतिबंधों ने रूस की आर्थिक गति को प्रभावित किया है, ऊर्जा व्यापार पर प्रतिबंधों का असर हुआ है, और पश्चिमी देशों में गेहूं निर्यात सहित कई प्रमुख मुद्दों पर कठिनाइयां देखने को मिली हैं। ऐसे में पुतिन की ओर से शांति-वार्ता को महत्व देना कई स्रोतों के अनुसार व्यावहारिक रणनीति भी हो सकती है।
अमेरिका-रूस के बीच वर्षों बाद उच्चस्तरीय वार्ता
रूस-यूक्रेन संघर्ष के शुरू होने के बाद वाशिंगटन और मॉस्को के बीच संवाद लगभग ठप हो चुका था। राजनयिक स्तर पर कई बार छोटे प्रतिनिधिमंडल आपसी संपर्क में रहे, परंतु इतने लंबे और औपचारिक संवाद लगभग तीन वर्षों बाद पहली बार हुए। क्रेमलिन के वरिष्ठ सलाहकार ने इसे अब तक की सबसे महत्वपूर्ण बातचीत बताया। हालांकि वे इस बात पर दृढ़ रहे कि यूक्रेन के कुछ क्षेत्रीय मुद्दों, खासकर पूर्वी हिस्से की राजनीतिक स्थिति पर कोई स्पष्ट सहमति अभी नहीं बनी है।
यूक्रेन वर्तमान में पश्चिमी सैन्य-सहयोग पर निर्भर है। अमेरिका और यूरोप द्वारा दिए जा रहे हथियार, तकनीकी सहायता तथा आर्थिक पैकेज उसके संघर्ष को जारी रखने की मुख्य रीढ़ रहे हैं। लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय समर्थन में कुछ धीमापन देखा जा रहा है, विशेषकर अमेरिका में नेतृत्व परिवर्तन के साथ।
संभावित समझौते के ढांचे की रूपरेखा
वार्ता के बाद जिन विषयों पर सहमति-संकेत मिले, उनमें अस्थायी युद्धविराम, विशिष्ट सैनिक क्षेत्रों से हटाव, ऊर्जा पाइपलाइन के परिचालन-विकल्प, फूड-कॉरिडोर सुरक्षा, तथा युद्धोत्तर व्यापार पुनर्संचालन जैसी बातें प्रमुख मानी जा रही हैं। रूस ने इसके पूर्व कई बार कहा था कि यूक्रेन की वर्तमान नेतृत्व-व्यवस्था के साथ वार्ता व्यर्थ है, लेकिन अब स्वर थोड़ा बदला हुआ प्रतीत हो रहा है।
ट्रंप ने अपने बयान में इशारा किया कि यदि आगामी महीनों में राजनीतिक स्तर पर सक्रियता बढ़ती है, तो यूक्रेन संकट समाधान के अधिक निकट हो सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि समझौते की राह कठिन है और इसके बीच कई स्तर पर कूटनीतिक-अड़चनें भी आती रहेंगी।
यूरोप की प्रतिक्रिया
यूरोपियन संघ पहले से ही युद्ध के दुष्परिणामों से जूझ रहा है। ऊर्जा-कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि, प्राकृतिक-गैस आपूर्ति व्यवधान, कृषि-आयातों सहित कई मुद्दे मुख्य आर्थिक संकट का कारण बने। यदि युद्ध समाप्ति की ठोस स्थिति बनती है, तो यूरोप ऊर्जा नीतियां स्थिर कर सकेगा। साथ ही सुरक्षा खर्च में कटौती संभव होगी।
फ्रांस, जर्मनी और पोलैंड युद्ध के शुरुआती चरण में यूक्रेन के समर्थक मोर्चे पर अग्रणी रहे। अब उनकी भूमिका मध्यस्थता में बदलती दिख सकती है, जो अमेरिका को सहयोग देने की दिशा में स्पष्ट दिखाई देती है।
यूक्रेन की प्रतिक्रिया और भविष्य की दिशा
यूक्रेन का रुख फिलहाल कड़ा है। वह रूस से हटाए गए क्षेत्रों को वापस लेने की मांग पर अविचल है, साथ ही युद्ध क्षति-मुआवजे की मांग भी रख रहा है। यूक्रेन के राष्ट्रपति ने पिछले कुछ समय में कहा था कि अगर युद्ध समाप्त करना है, तो संप्रभुता और सीमा की बहाली अनिवार्य है। इस समस्या को रूस चुनौती देता रहा है।
लेकिन युद्ध जितना लंबा होता जा रहा है, यूक्रेन पर आर्थिक-दबाव बढ़ता जा रहा है। देश के पुनर्निर्माण कार्य, लाखों विस्थापित नागरिकों की व्यवस्था और घटते औद्योगिक-आधार ने स्थिति को और जटिल बनाया है।
यदि कूटनीतिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो संभव है कि किसी अस्थायी राजनीतिक-संरचना के साथ समाधान की ओर प्रगति हो। यूक्रेन को मिलने वाली सैन्य सहायता आगे किस स्तर पर जारी रहेगी, यह भी आने वाले महीनों में तय होगा।
भविष्य का परिदृश्य
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह युद्ध अब दुनिया की कूटनीति का सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। आने वाले समय में यदि अमेरिका, रूस और यूरोप आपसी सहमति की दिशा में बढ़ते हैं, तो समाधान संभव है। हालांकि एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि युद्ध-बाद यूक्रेन को सुरक्षा-गारंटी कौन देगा और किस रूप में। इस सवाल का उत्तर अभी नहीं है।
फिर भी ट्रंप का बयान दुनिया भर की चर्चा में है, क्योंकि यह युद्ध-समीकरण बदलने का संकेत माना जा रहा है।
