भारत के स्वतंत्रता संग्राम की गाथाओं में ‘वंदे मातरम’ का नाम हमेशा गूंजता रहा है। यह गीत केवल एक राष्ट्रगान नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता की भावना और जनमानस की आत्मा का प्रतीक बन चुका है। 1875 में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत बांग्ला और संस्कृत मिश्रित भाषा में था। इस गीत में उन्होंने बंगाल के समाज, संस्कृति और जनता के संघर्ष को शब्दों में पिरोया।

1885 में अपनी विवादस्पद कृति ‘आनंदमठ’ में इसे शामिल कर बंकिम चंद्र ने इसे और व्यापक दृष्टि दी। यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के लिए केवल गीत नहीं, बल्कि उनके हौसले और जुनून का प्रतीक बन गया। बाद में रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत के लिए एक मधुर और भावपूर्ण धुन बनाई, जिसने इसे और लोकप्रिय और सामूहिक रूप से गाए जाने योग्य बनाया।
150 साल पूरे होने पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में इस विषय को उठाया और कहा कि कांग्रेस ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1937 के फ़ैज़ाबाद अधिवेशन से पहले ‘वंदे मातरम’ के कुछ अहम हिस्सों को हटा दिया था। उनका तर्क था कि यह कदम अन्यायपूर्ण था और इससे विभाजन के बीज बोए गए।
राजनीतिक विवाद और BJP की पहल
बीजेपी के कई नेताओं का मानना है कि ‘वंदे मातरम’ को शैक्षणिक संस्थानों में गाना अनिवार्य होना चाहिए। उनका तर्क है कि यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सम्मान और भारतीयता की पहचान है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 10 नवंबर को घोषणा की कि राज्य के स्कूलों और कॉलेजों में ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य रूप से गाया जाएगा।
योगी आदित्यनाथ ने बाराबंकी जिले में कहा, “जो भी वंदे मातरम का विरोध कर रहा है, वह भारत माता का विरोध कर रहा है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि आज भी कुछ लोग रहेंगे जो भारत में रहेंगे, लेकिन ‘वंदे मातरम’ नहीं गाएंगे। इस बयान ने विपक्ष और मुस्लिम नेताओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और बहस
समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री जी की कुर्सी जब हिलने लगती है, तब साम्प्रदायिक दृष्टिकोण उभर आता है। उन्होंने याद दिलाया कि संविधान निर्माता और स्वतंत्रता सेनानी इस विषय पर बहस करके ही राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत निर्धारित कर चुके थे।
सपा सांसद ज़ियाउर्रहमान बर्क ने कहा कि किसी को इस गीत को गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि संविधान ने सभी को स्वतंत्रता दी है। इसी तरह सपा विधायक इक़बाल महमूद ने स्पष्ट किया कि वे राष्ट्रगान का सम्मान करते हैं और गाते हैं, लेकिन ‘वंदे मातरम’ का समर्थन या विरोध व्यक्तिगत विवेक पर निर्भर होना चाहिए।
इतिहास में ‘वंदे मातरम’ का महत्व
‘वंदे मातरम’ का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम के साथ गहरा जुड़ा हुआ है। 1905 में बंगाल के विभाजन के विरोध में यह गीत जनता के लिए एक हथियार बन गया। बंकिम चंद्र ने इसमें बंगाल की धरती, जनता और उस समय की आबादी का उल्लेख किया।
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक़ुल्लाह ख़ान जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे अपने आंदोलनों में गाया। अंग्रेज़ शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में यह गीत जनमानस को प्रेरित करता रहा। इसे हिंदू-मुस्लिम सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने साझा राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में अपनाया।
1937 का विवाद और धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम’ को लेकर विभाजनकारी मुद्दों से बचने के लिए समिति बनाई। कई मुस्लिम संगठनों और अन्य धार्मिक समुदायों ने इस गीत के कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई। अंततः इसे केवल शुरुआती दो अंतरों तक सीमित किया गया, जिसमें कोई धार्मिक पहलू नहीं था।
इसके बावजूद आरएसएस और हिंदू महासभा ने पूरे गीत को अपनाने की मांग की, जबकि मुस्लिम लीग ने इसका विरोध किया। इस विवाद ने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का चयन धर्म और राजनीति से प्रभावित हो सकता है।
वर्तमान बहस: शिक्षा और संवैधानिक दृष्टि
आज के समय में भी यह बहस जारी है कि क्या ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य रूप से स्कूलों और कॉलेजों में गाया जाना चाहिए। बीजेपी का मत है कि इसे राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक बनाना चाहिए, जबकि विपक्षी दल इसे जबरदस्ती थोपने के खिलाफ हैं।
यह बहस केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 सभी नागरिकों को सांस्कृतिक और धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं। इसलिए किसी को भी किसी गीत को गाने के लिए बाध्य करना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है।
निष्कर्ष
‘वंदे मातरम’ का 150वां वर्ष न केवल इतिहास और गौरव का प्रतीक है, बल्कि यह आधुनिक राजनीति में सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के मुद्दे को भी उजागर करता है। प्रधानमंत्री, राज्य सरकार और विपक्ष के बीच चल रही बहस यह दिखाती है कि कैसे एक गीत आज भी राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
इस बहस ने यह स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता संग्राम के प्रतीक आज भी समाज में विचारों और दृष्टिकोणों को प्रभावित करते हैं। आने वाले समय में यह देखना रोचक होगा कि शिक्षा और राजनीतिक निर्णयों में इस गीत की भूमिका किस तरह तय होती है।
