भारत के संसदीय इतिहास में ऐसे अवसर बहुत कम देखने को मिलते हैं जब किसी गीत का नाम पूरे सदन की बहस का केंद्र बन जाए। बीते सोमवार को लोकसभा में “वंदे मातरम” के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर चर्चा की शुरुआत हुई। यह चर्चा किसी साधारण परंपरा या औपचारिकता का हिस्सा नहीं थी, बल्कि एक ऐतिहासिक भाव-भूमि पर आधारित विमर्श था। जिस गीत ने लोगों को स्वतंत्रता की दीवानगी दी, उन्हें आंदोलन के मार्ग पर धकेला, और देश को जोड़ने की प्रेरणा दी—उसी गीत के इतिहास पर आज फिर से प्रश्न उठे, तर्क गढ़े गए और प्रतितर्क प्रस्तुत हुए।

यह बहस महज़ एक सांस्कृतिक गीत पर नहीं रही। इसने स्वतंत्रता संग्राम के पृष्ठों, नेताओं की विचारधारा, राजनीतिक संगठन-संघर्ष, विभाजन के दौर की सीमाओं और आज की राजनीति की दिशा तक को स्पर्श किया।
संसद में चर्चा की शुरुआत—प्रधानमंत्री ने इतिहास के पन्नों से उठाया सवाल
प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अपने वक्तव्य में यह प्रश्न उठाया—
“जब वंदे मातरम महात्मा गांधी को राष्ट्रीय भावना का प्रतीक दिखता था, जब यह जनता के दिलों में राष्ट्रगीत के रूप में बस चुका था, तो इसके साथ अन्याय क्यों किया गया?”
यह सवाल चर्चा का मूल बना। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह गीत सिर्फ धुन नहीं था—यह स्वतंत्रता संघर्ष की प्रतीक शक्ति था। उन्होंने कहा कि स्वदेशी आंदोलन के उभार में, असहयोग की बेला में, और बंगाल में विभाजन के खिलाफ जनसमूहों के बीच वंदे मातरम की पंक्तियां हथियार की तरह उठीं।
प्रधानमंत्री ने बात को आगे बढ़ाते हुए इतिहास की उन घटनाओं का उल्लेख किया जब मुस्लिम लीग के विरोध के बाद वंदे मातरम पर सवाल खड़े किए गए। उन्होंने दावा किया कि जवाहरलाल नेहरू द्वारा इस विषय की जांच शुरू करना एक ऐतिहासिक समझौता था, जिसने वंदे मातरम के मूल रूप को सीमित कर दिया।
उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस की नेतृत्वकारी स्थिति उस समय मुस्लिम लीग के विरोध से कमजोर हुई और इस दबाव का परिणाम देश के स्वाभाविक भावनातंत्र पर पड़ा। प्रधानमंत्री ने कहा—
“जब 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं, तो इस ऐतिहासिक सत्य को सामने रखना आवश्यक है।”
बापू की लिखी पंक्तियों की प्रतिध्वनि फिर से सुनी गई
प्रधानमंत्री ने दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित “इंडियन ओपिनियन” में बापू के लिखे उस लेख का उल्लेख किया जिसमें गांधी ने वंदे मातरम को राष्ट्रीय भावना का स्वर बताया था। उन्होंने यह कहा—
“गांधी जी मानते थे कि यह गीत देशभक्ति को तीव्र करता है।”
प्रधानमंत्री ने इसके बाद यह प्रश्न दोबारा उठाया—
“जब इसे राष्ट्रगीत जैसा दर्जा मिलता दिख रहा था, तब इसके अंशों में कटौती क्यों की गई?”
इसी संदर्भ में उन्होंने आपातकाल की घटनाओं को भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि जब वंदे मातरम 100 वर्ष का हुआ, तब देश लोकतांत्रिक संकट से गुजर रहा था—जेल, सेंसरशिप, और दमन का दौर था।
प्रधानमंत्री ने धारणा रखी कि गीत की भावभूमि समय-समय पर राजनीतिक गणनाओं में दबती गई और यह सदन के सामने इतिहास को पुनर्स्थापित करने का अवसर है।
विपक्ष ने पलटवार किया—दलीलें, तर्क, इतिहास और वर्तमान के संदर्भ
प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद विपक्ष की प्रतिक्रियाएं तेज़ हो गईं।
प्रियंका गांधी—“जरूरी मुद्दों से ध्यान हटाया जा रहा है”
प्रियंका गांधी ने अपने संबोधन में कहा—
“जब बेरोज़गारी, महंगाई, आरक्षण, परीक्षा-पेपर लीक, किसानों की दुर्दशा और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा नहीं हो रही, तब इस विषय को प्राथमिकता क्यों?”
उन्होंने कहा कि यह बहस जनता को भ्रमित करने की राजनीतिक रणनीति है।
उन्होंने आगे यह कहा—
“जितने वर्षों से प्रधानमंत्री सत्ता में हैं, उससे अधिक वर्ष नेहरू जेल में रहे।”
इसके बाद उन्होंने नेहरू की उपलब्धियों का विस्तृत उल्लेख किया—
● अंतरिक्ष संस्थान की स्थापना
● AIIMS
● IIT
● बड़े सार्वजनिक उपक्रम
● आधुनिक उद्योग-संरचना
उन्होंने कहा—
“नेहरू ने देश को दिशा दी, उनकी दृष्टि दूरगामी थी।”
गौरव गोगोई—“राष्ट्रीय गीत का दर्जा कांग्रेस ने दिया”
उन्होंने संविधान सभा की बहसों का हवाला दिया और कहा—
“वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत का दर्जा देने का प्रस्ताव कांग्रेस ने रखा और उसे मंजूरी दिलाई।”
उन्होंने वह ऐतिहासिक संदर्भ भी सामने रखा जिसमें यह तय हुआ—
● जन गण मन को राष्ट्रगान
● वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत
उन्होंने कहा कि इस निर्णय में राजेंद्र प्रसाद, पंत, मौलाना आजाद और राजगोपालाचारी जैसे नेता शामिल थे।
ओवैसी—“भावना थोपना संविधान के खिलाफ”
एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा—
“वंदे मातरम गाने को बाध्य करना संविधान के मूल अधिकारों के विपरीत है।”
उन्होंने अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देते हुए कहा—
“मैं ईश्वर के अलावा किसी की आराधना नहीं कर सकता, यह मेरा संवैधानिक अधिकार है।”
उन्होंने कहा कि भारत की पहचान “हम भारत के लोग” से शुरू होती है, न कि किसी एक सांस्कृतिक प्रतीक से।
अन्य विपक्षी सवाल—RSS की भूमिका का संदर्भ
संसद परिसर के बाहर नेताओं ने आरएसएस की भूमिका पर सवाल रखा।
उन्होंने पूछा—
“स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान किस मोर्चे पर योगदान था?”
यह बहस और तीखी हो गई जब यह मुद्दा राष्ट्रवाद, इतिहास और संगठन की वैचारिक पृष्ठभूमि में प्रवेश कर गया।
150 वर्ष का पड़ाव—क्यों यह चर्चा राष्ट्रीय स्मृति में महत्वपूर्ण है?
किसी गीत की चर्चा इसलिए नहीं होती क्योंकि वह लोकप्रिय है। चर्चा इसलिए होती है क्योंकि वह सामूहिक चेतना को आकार देता है।
वंदे मातरम—
● आंदोलन की मशाल था
● ब्रिटिश शासन विरोध की ज्वाला था
● बंगाल के विभाजन के समय जन-विद्रोह का प्रतीक था
● विद्यालयों, सभाओं, यात्रा-मार्गों पर लगातार गाया जाता रहा
इतिहासविदों का मानना है कि “भारत माता” की अवधारणा ने जनता को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़ा।
इसी भावभूमि पर वापस लौटती चर्चा यह संकेत देती है कि आज की राजनीति इतिहास को नए संदर्भों में इस्तेमाल कर रही है।
भविष्य क्या है?—कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं
बात तथ्य की नहीं, भावना और व्याख्या की है।
क्यों—
● क्या नया व्यक्तित्व-निर्माण हो रहा है?
● क्या इतिहास मानकों को बदल रहा है?
● या यह चुनावी विमर्श की तैयारी है?
इनका उत्तर समय देगा।
पर यह निर्विवाद है कि इस गीत ने भारत को उत्प्रेरित किया, और आज भी इसकी प्रतिध्वनि संवेदनाओं में कायम है।
