अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हमेशा से ही शक्तियों के बीच तनाव और टकराव ने वैश्विक संतुलन को प्रभावित किया है। जनवरी 2026 की शुरुआत में वेनेज़ुएला के मामले ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वयं शनिवार को घोषणा की कि अमेरिका ने वेनेज़ुएला की राजधानी काराकास में हवाई हमला किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया। इस अचानक और नाटकीय कदम ने न केवल अमेरिका और वेनेज़ुएला के बीच संबंधों को बल्कि पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दृष्टिकोण को भी प्रभावित किया।

वेनेज़ुएला के खिलाफ इस कदम को दुनिया के कई देशों ने एकतरफ़ा और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के उल्लंघन के रूप में देखा। इस मामले में भारत ने सतर्कता और कूटनीतिक विवेक के साथ प्रतिक्रिया दी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि वेनेज़ुएला में हालिया घटनाक्रम गहरी चिंता का विषय हैं और भारत वहां की बदलती स्थिति पर नज़र बनाए हुए है। मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि भारत वेनेज़ुएला के लोगों की सुरक्षा और उनकी भलाई के लिए अपने समर्थन को कायम रखता है और सभी संबंधित पक्षों से अपील करता है कि मुद्दों का समाधान शांतिपूर्ण और बातचीत के माध्यम से किया जाए।
इससे पहले, भारत सरकार ने अपने नागरिकों को वेनेज़ुएला की यात्रा के प्रति सतर्क किया और सभी गैर-जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दी। यह कदम इस बात का संकेत है कि भारत अपनी नागरिक सुरक्षा को प्राथमिकता देता है और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी सक्रिय है।
भारत की प्रतिक्रिया और विपक्ष का दृष्टिकोण
भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर अपनी चिंता जताई। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि कांग्रेस पार्टी वेनेज़ुएला में अमेरिका की कार्रवाई पर गहरी चिंता व्यक्त करती है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून और सिद्धांतों का एकतरफ़ा उल्लंघन स्वीकार्य नहीं है। इस बयान से यह स्पष्ट है कि भारत में राजनीतिक दल भी अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर संवेदनशील दृष्टिकोण रखते हैं और वैश्विक राजनीति में संतुलन की आवश्यकता को महत्व देते हैं।
भारत के बयान और विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाओं से यह समझा जा सकता है कि देश वैश्विक घटनाओं पर सतर्कता और विवेक के साथ प्रतिक्रिया करता है, खासकर जब इसमें सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रीय संप्रभुता जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हों।
ईरान की प्रतिक्रिया
ईरान ने वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में स्पष्ट किया कि अमेरिकी सैन्य हमला वेनेज़ुएला की राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन है। उनका कहना है कि यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून का प्रत्यक्ष उल्लंघन है, खास तौर पर चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का, जो बल प्रयोग और धमकी से रोकता है। ईरान ने सभी देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपील की कि वे अमेरिका की इस गैरकानूनी आक्रामकता को रोकें।
ईरान के दृष्टिकोण से यह कदम केवल वेनेज़ुएला के लिए खतरा नहीं है बल्कि पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र चार्टर आधारित सुरक्षा ढांचे को कमजोर करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका के देशों का वैश्विक राजनीति में सक्रिय प्रभाव है और वे अपने दृष्टिकोण से अंतरराष्ट्रीय नियमों की रक्षा करना चाहते हैं।
मलेशिया की प्रतिक्रिया
मलेशिया ने भी इस मामले में स्पष्ट विरोध जताया। मलेशिया के राष्ट्रपति अनवर इब्राहिम ने सोशल मीडिया के माध्यम से अमेरिकी कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के उल्लंघन के रूप में बताया। उन्होंने लिखा कि वेनेज़ुएला के लोगों को अपना राजनीतिक भविष्य खुद तय करने का अधिकार है और किसी बाहरी शक्ति द्वारा मौजूदा सरकार के प्रमुख को हटाना एक खतरनाक मिसाल पेश करता है।
मलेशिया की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट होता है कि दक्षिण-पूर्व एशियाई देश भी अंतरराष्ट्रीय मामलों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और वे किसी भी तरह के विदेशी हस्तक्षेप का विरोध करते हैं।
विश्व स्तर पर प्रतिक्रिया और प्रभाव
वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर प्रभाव डाला। कई देशों ने इसे संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के रूप में देखा। हिज़्बुल्लाह और ईरान ने अमेरिका की कार्रवाई का विरोध किया और संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद को सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की।
भारत, ईरान, मलेशिया और अन्य देशों की प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक राजनीति में एक तरफ़ा सैन्य कदम केवल शांति और स्थिरता के लिए खतरा नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संगठनात्मक ढांचे के लिए भी चुनौती बनता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दिया कि अंतरराष्ट्रीय संबंध अब केवल सैन्य शक्ति या आर्थिक दबाव पर आधारित नहीं रह गए हैं। आज, कूटनीतिक समझ, संवेदनशील दृष्टिकोण और शांतिपूर्ण समाधान ही देशों के बीच संतुलन बनाए रखने का एकमात्र तरीका है।
