विजय मोहन कृष्णा निधन की खबर ने फिल्म इंडस्ट्री, रंगमंच और कॉर्पोरेट जगत को एक साथ गहरे शोक में डुबो दिया है। एक ऐसे व्यक्तित्व का जाना जिसने अपने जीवन में कई भूमिकाएं निभाईं—कभी मंच पर कलाकार बनकर, कभी बड़े उद्योग समूह के रणनीतिकार के रूप में और कभी साहसी पर्वतारोही के तौर पर।

करीब आठ दशक तक सक्रिय जीवन जीने वाले विजय मोहन कृष्णा ने अपने काम, व्यक्तित्व और जज्बे से अलग पहचान बनाई। उन्होंने केवल फिल्मों में ही नहीं, बल्कि थिएटर और कॉर्पोरेट जगत में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। उनके निधन के बाद देशभर से कलाकारों, उद्योगपतियों और उनके प्रशंसकों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
विजय मोहन कृष्णा निधन से थम गया एक बहुमुखी जीवन का सफर
विजय मोहन कृष्णा निधन सिर्फ एक कलाकार के जाने की खबर नहीं है, बल्कि एक ऐसे इंसान की विदाई है जिसने जीवन के कई क्षेत्रों में असाधारण योगदान दिया।
वे उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में शामिल थे जिन्होंने एक साथ दो बिल्कुल अलग दुनिया—कॉर्पोरेट और कला—में सफलता हासिल की। एक तरफ वे बड़े उद्योग समूह के वरिष्ठ पद पर जिम्मेदारियां निभाते रहे, वहीं दूसरी तरफ थिएटर और फिल्मों में भी सक्रिय रहे।
उनका जीवन यह दिखाता है कि जुनून और अनुशासन के साथ किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल की जा सकती है।
थिएटर से शुरू हुआ विजय मोहन कृष्णा का अभिनय सफर
विजय मोहन कृष्णा निधन के बाद उनके लंबे अभिनय करियर की चर्चा फिर से होने लगी है। उनका अभिनय सफर 1960 के दशक में दिल्ली के थिएटर मंच से शुरू हुआ था।
दिल्ली के सांस्कृतिक माहौल में उस समय थिएटर का खास महत्व था। वहीं से उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं और धीरे-धीरे रंगमंच पर अपनी पहचान बनाई।
रंगमंच के साथ उनका रिश्ता बेहद गहरा था। थिएटर ने ही उन्हें एक कलाकार के रूप में गढ़ा और उनकी अभिनय क्षमता को नई दिशा दी।
‘डांस लाइक ए मैन’ ने दिलाई खास पहचान
थिएटर जगत में विजय मोहन कृष्णा की सबसे चर्चित भूमिकाओं में से एक महेश दत्तानी के प्रसिद्ध नाटक “डांस लाइक ए मैन” में निभाया गया किरदार था।
इस नाटक में उन्होंने एक भरतनाट्यम डांसर की भूमिका निभाई थी, जिसे दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने खूब सराहा। यह किरदार उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक मंच पर निभाया।
इतने लंबे समय तक किसी एक भूमिका को निभाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इस नाटक के जरिए उन्होंने भारतीय रंगमंच में अपनी अलग पहचान बनाई।
देवदास में नारायण मुखर्जी बनकर जीता दर्शकों का दिल
फिल्मी दुनिया में भी विजय मोहन कृष्णा की मौजूदगी खास रही। विजय मोहन कृष्णा निधन की चर्चा के साथ उनकी सबसे यादगार भूमिका संजय लीला भंसाली की फिल्म “देवदास” में निभाए गए किरदार की भी खूब याद की जा रही है।
इस फिल्म में उन्होंने शाहरुख खान के पिता नारायण मुखर्जी की भूमिका निभाई थी। यह किरदार सख्त स्वभाव और पारंपरिक सोच का प्रतिनिधित्व करता था।
हालांकि फिल्म में उनकी स्क्रीन उपस्थिति सीमित थी, लेकिन उनके अभिनय की गहराई ने इस भूमिका को यादगार बना दिया।
छोटी भूमिकाओं में भी छोड़ते थे गहरी छाप
विजय मोहन कृष्णा ने कई फिल्मों में छोटी लेकिन प्रभावशाली भूमिकाएं निभाईं। उनकी खासियत यह थी कि चाहे किरदार छोटा हो या बड़ा, वे उसे पूरी ईमानदारी से निभाते थे।
“गांधी”, “गुजारिश” और “पीके” जैसी फिल्मों में उनकी मौजूदगी ने दर्शकों को प्रभावित किया। वे उन कलाकारों में थे जो अभिनय को सिर्फ पेशा नहीं बल्कि कला मानते थे।
कॉर्पोरेट दुनिया में भी शानदार करियर
विजय मोहन कृष्णा निधन के साथ उनके कॉर्पोरेट करियर की चर्चा भी उतनी ही हो रही है जितनी उनके अभिनय की।
उन्होंने लगभग 45 वर्षों तक एक बड़े औद्योगिक समूह के साथ काम किया और वहां वरिष्ठ नेतृत्व की भूमिका निभाई। उनके कार्यकाल में कंपनी ने कई चुनौतियों का सामना किया और कठिन दौर से बाहर निकली।
व्यवसायिक रणनीति और प्रबंधन क्षमता के कारण वे उद्योग जगत में भी बेहद सम्मानित थे।
साहसी पर्वतारोही भी थे विजय मोहन कृष्णा
बहुत कम लोग जानते हैं कि विजय मोहन कृष्णा एक साहसी पर्वतारोही भी थे।
जब अधिकांश लोग सत्तर साल की उम्र में आरामदायक जीवन चुनते हैं, तब उन्होंने लद्दाख की करीब 20,000 फीट ऊंची चोटियों तक ट्रेकिंग की।
उनकी रोमांचप्रियता यहीं खत्म नहीं होती। उन्होंने अंटार्कटिका और दक्षिण अमेरिका जैसे दुर्गम क्षेत्रों में भी ट्रेकिंग की।
सादगी भरा जीवन और बड़े शौक
इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद विजय मोहन कृष्णा का जीवन बेहद सादगी भरा था।
वे अक्सर खुद गाड़ी चलाकर दफ्तर जाते थे और प्रकृति से जुड़ाव बनाए रखते थे। वाइल्ड लाइफ, ट्रेकिंग और मोटर रेसिंग जैसे शौक उनके जीवन का हिस्सा थे।
उनका मानना था कि इंसान को अपने काम के साथ-साथ जीवन का आनंद लेना भी जरूरी है।
कलाकारों और उद्योग जगत ने जताया शोक
विजय मोहन कृष्णा निधन की खबर सामने आते ही कला और उद्योग जगत से कई लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
कई प्रसिद्ध कलाकारों ने उनके साथ बिताए पलों को याद करते हुए कहा कि वे बेहद विनम्र और प्रेरणादायक व्यक्तित्व थे।
रंगमंच से जुड़े कई लोगों ने उन्हें भारतीय थिएटर की मजबूत परंपरा का प्रतिनिधि बताया।
उनके जीवन से क्या सीख मिलती है
विजय मोहन कृष्णा का जीवन कई मायनों में प्रेरणादायक रहा।
उन्होंने यह साबित किया कि जीवन में एक ही पहचान होना जरूरी नहीं है। इंसान अगर चाहे तो कई क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा दिखा सकता है।
उनकी कहानी यह भी बताती है कि उम्र कभी भी किसी सपने को पूरा करने में बाधा नहीं बनती।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर विजय मोहन कृष्णा निधन केवल एक कलाकार की विदाई नहीं है, बल्कि एक ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व की विदाई है जिसने अपने जीवन से यह साबित किया कि जुनून, मेहनत और जिजीविषा से इंसान हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकता है।
थिएटर के मंच से लेकर फिल्मों के पर्दे और कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक, उन्होंने हर जगह अपनी अलग छाप छोड़ी। आने वाली पीढ़ियां उनके जीवन और काम से प्रेरणा लेती रहेंगी।
