लखनऊ के काकोरी स्थित उनके घर के बाहर शाम ढल चुकी थी। शीतल लहरों से गुजरती हवा में एक भारी सन्नाटा पसरा हुआ था। वहीं भीतर, वह व्यक्ति जिसने दशकों तक मंच पर जीवंत किरदारों को सांसें दीं, शांत था। वरिष्ठ रंगकर्मी और फिल्म अभिनेता विनय श्रीवास्तव का जाना रंगकर्म से जुड़े हर व्यक्ति के लिए एक ऐसा पल है जिसे शब्दों में समेटना सहज नहीं है। लंबे समय से श्वास संबंधी समस्या से संघर्ष कर रहे विनय धीरे-धीरे उन आवाजों और तालियों से दूर हो गए, जिनसे उनका पूरा जीवन रोशन हुआ।

उनकी अंतिम यात्रा लखनऊ के बैकुंठ धाम में होगी। यह वही शहर है जहां उन्होंने पहली बार मंच की रोशनी को महसूस किया, वही शहर जहां उनके लिखे, बोले और निभाए गए संवाद पीढ़ियों तक याद रहेंगे।
छोटे शहर से बड़े मंच तक की यात्रा
विनय का अभिनयन किसी प्रशिक्षण संस्थान की देन नहीं था, बल्कि उनके भीतर जन्मा एक स्वाभाविक अनुभव था। बचपन से ही कला और साहित्यिक अभियानों की ओर झुकाव ने उन्हें सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल किया। शुरूआती वर्षों में स्थानीय नाट्य मंडलियों से जुड़ना उनके लिए केवल मंच तक पहुंचने का साधन नहीं था, बल्कि यह उनकी सीख का आधार बना। यही वह समय था जब ‘अभिनय’ उनके लिए अनायास शौक नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य बन गया।
वे अपनी आवाज के उतार-चढ़ाव, गहरी अभिव्यक्ति और स्पष्ट संवाद शैली के लिए पहचाने जाते थे। अभिनय करते समय वे चरित्र की भावनाओं में इस तरह ढल जाते थे कि दर्शक यह भूल जाते थे कि मंच पर कोई कलाकार मौजूद है, बल्कि एक वास्तविक चरित्र सामने है।
रंगमंच से पहचान, सिनेमा से विस्तार
विनय का वास्तविक योगदान रंगमंच में ही अधिक रहा, लेकिन फिल्मों, टीवी धारावाहिकों और सांस्कृतिक मंचन में उनकी मौजूदगी लगातार बनी रही। लखनऊ, वाराणसी और पूर्वांचल के अनेक क्षेत्रों में आयोजित उत्सवों में उनकी प्रस्तुतियां लोगों के बीच चर्चा का विषय रहती थीं।
उनकी खासियत यह थी कि वह किसी भी भूमिका की सीमाओं को तोड़कर उसमें एक नवीनता जोड़ देते थे। चाहे किसी गांव के सहज किसान की भूमिका हो, किसी संवेदनशील पिता का चित्रण हो या किसी संघर्षरत व्यक्ति के जीवन की तकलीफों को दिखाना हो, विनय हर बार अपने अभिनय में इतना विस्तार जोड़ देते थे कि दर्शक उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ जाते थे।
मंच के बाहर विनय की सादगी
जो लोग उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे, वे हमेशा कहते हैं कि विनय जितने बड़े कलाकार थे, उतने ही सहज व्यक्ति भी। वे अपने साथ जुड़े नए कलाकारों को हमेशा अवसर देते थे। उनके संवाद, सलाह और कला की समझ आज भी उन युवा कलाकारों के अनुभव का आधार है जो कला में अपना भविष्य तलाश रहे हैं।
वे मानते थे कि रंगकर्म केवल प्रदर्शन नहीं है बल्कि अपने समय की परिस्थिति, समाज के अनुभव और मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्षों की वास्तविक अभिव्यक्ति है। इसी कारण उनकी हर प्रस्तुति समाज के किसी न किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व करती दिखती थी।
बीमारी से संघर्ष और शांत विदाई
बीते कुछ महीनों से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी। श्वास संबंधी समस्या के चलते कई अवसरों पर वे सार्वजनिक आयोजनों से दूर रहे। उनकी अनुपस्थिति ने रंगमंडलियों में उनकी कमी का एहसास कराया, लेकिन वे अक्सर अपने निकटतम साथियों से कहा करते थे कि मंच कभी किसी एक व्यक्ति से नहीं चलता। यह पीढ़ियों से चलती विरासत है।
आज वे इस विरासत को पीछे छोड़कर चले गए हैं, लेकिन उनका काम, उनका व्यक्तित्व, उनकी वाणी और उनका अभिनय कला जगत में हमेशा जीवित रहेगा।
परतों में जीवन और व्यक्तित्व
विनय उस पीढ़ी से जुड़े थे जिसे मंच का अर्थ केवल प्रदर्शन नहीं बल्कि जीवन दर्शन था। उनकी समग्र यात्रा अपने भीतर संघर्ष, समर्पण, संवेदना और सृजन की धड़कन समेटे हुए थी।
अगर उन्हें परिभाषित किया जाए तो वे केवल अभिनेता नहीं, बल्कि भावनाओं के संरक्षक, विचारों के प्रसारक और संवेदना के रचनाकार थे।
कल्पना की रोशनी में विनय की विरासत
रंगमंच ऐसे ही व्यक्तित्वों की वजह से जीवित रहता है। विनय ने अपने जीवन में ना सिर्फ किरदारों को जिया बल्कि उन्हें गहरा अर्थ भी दिया। उनकी कही पंक्ति आज भी याद की जा सकती है।
“जो चरित्र मंच पर जन्म लेता है, वह कभी मरता नहीं। दर्शक उसे अपने भीतर रखते हैं और वहीं से वह आगे जीता रहता है।”
आज यही भावना उन्हें अमर बना देती है।
