‘थर्ड वर्ल्ड’ शब्द का जन्म बीसवीं सदी के मध्य में हुआ। इसकी उत्पत्ति फ्रांसीसी डेमोग्राफर अल्फ़्रेड सॉवी ने 1952 में की थी, जिन्होंने इसे तीसरे एस्टेट यानी किसानों, मजदूरों और सामान्य जनता के संदर्भ में इस्तेमाल किया। इसका मूल अर्थ उन देशों के लिए था जो वैश्विक शक्तिशाली राष्ट्रों की तुलना में पिछड़े, शोषित और उपेक्षित थे।
शीत युद्ध के दौरान दुनिया तीन भागों में बंट गई थी। अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले पूंजीवादी देशों को ‘पहली दुनिया’ कहा गया, जबकि सोवियत संघ और उसके गुट को ‘दूसरी दुनिया’ का दर्जा मिला। इसके बाहर वे राष्ट्र रहे जो किसी भी गुट से सीधे जुड़े नहीं थे और स्वतंत्र रहकर अपनी राह बनाना चाहते थे, इन्हें तीसरी दुनिया कहा गया।

समय के साथ ‘थर्ड वर्ल्ड’ का अर्थ बदलता गया। अब इसे प्रायः गरीब, विकासशील या निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक पिछड़ापन प्रमुख आधार बन गया।
थर्ड वर्ल्ड की आधुनिक समझ
आज के संदर्भ में थर्ड वर्ल्ड शब्द अपमानजनक माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी इसे 2022 में अप्रचलित और अपमानजनक करार दिया। आधुनिक समय में इन देशों के लिए ‘ग्लोबल साउथ’, ‘विकासशील देश’ या ‘निम्न एवं मध्यम आय वाले देश’ जैसे शब्द प्रयोग किए जाते हैं।
ऐसे देश जिनकी आर्थिक संरचना प्राथमिक उत्पादों पर आधारित है, औद्योगिक विकास कम है, राजनीतिक अस्थिरता अधिक है और प्रति व्यक्ति आय न्यूनतम है, उन्हें अब विकासशील देशों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
थर्ड वर्ल्ड देशों की सूची
संयुक्त राष्ट्र ने सबसे कम विकसित देशों की सूची तैयार की है। इसमें अधिकांश अफ्रीकी देशों को शामिल किया गया है। 44 देशों में से 32 अफ्रीका के हैं, 8 एशिया के, 3 प्रशांत क्षेत्र के और 1 कैरिबियन क्षेत्र का। उदाहरण के लिए अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल और यमन एशिया के ऐसे देशों में आते हैं जिन्हें पारंपरिक अर्थों में तीसरी दुनिया का हिस्सा माना जाता था।
भारत, हालांकि गुट-निरपेक्ष आंदोलन का हिस्सा रहा और ऐतिहासिक रूप से थर्ड वर्ल्ड में आता था, वर्तमान आर्थिक संदर्भ में इसे इस श्रेणी में नहीं रखा जाता। भारत अब उभरती हुई अर्थव्यवस्था है और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
अमेरिका की नई नीति और भारत
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति ने घोषणा की है कि तीसरी दुनिया के देशों के नागरिकों को अमेरिका में प्रवेश पर स्थायी रूप से रोक लगा दी जाएगी। हालांकि उन्होंने स्पष्ट नहीं किया कि कौन से देश इस श्रेणी में शामिल होंगे। इससे वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और आर्थिक बहस शुरू हो गई है।
भारत को वर्तमान समय में इस नीति के दायरे में नहीं रखा गया है। इसकी अर्थव्यवस्था विश्व स्तर पर उभरती हुई मानी जाती है, लेकिन देश में आर्थिक असमानता और कुछ क्षेत्रों में विकास की कमी चिंता का विषय है।
थर्ड वर्ल्ड अवधारणा का राजनीतिक और आर्थिक महत्व
अमेरिकी समाजशास्त्री इर्विन लुई हॉरोविट्ज़ ने इसे शीत युद्ध के दौरान राजनीतिक अवधारणा माना। वहीं, वर्ल्ड बैंक के हॉलिस चेनेरी ने कहा कि तीसरी दुनिया का टर्म अब अपनी उपयोगिता खो चुका है। दक्षिण कोरिया जैसे उन्नत देशों और सोमालिया जैसे कमजोर देशों को एक साथ शामिल करना इसे अप्रचलित बनाता है।
आज, किसी देश को विकासशील, फ्रंटियर या सबसे कम विकसित के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। यह विभाजन वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक संरचना को समझने में मदद करता है।
निष्कर्ष
थर्ड वर्ल्ड अवधारणा ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रही है। हालांकि आधुनिक समय में यह शब्द अपमानजनक और अप्रचलित माना जाता है। वैश्विक दृष्टिकोण में भारत अब इस श्रेणी में नहीं आता और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की वजह से विश्व आर्थिक मानचित्र पर मजबूती से खड़ा है।
