वर्ष 2025 भारतीय आर्थिक इतिहास में उस दौर के रूप में दर्ज हो रहा है, जब भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले अपने सबसे निचले स्तर के आसपास पहुँच गया। विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी, अमेरिकी व्यापारिक नीतियों का दबाव, बढ़ता व्यापार घाटा, आयातित वस्तुओं पर अतिरिक्त लागत और एशियाई मुद्रा बाजारों में भारत की स्थिति ने रुपया को ऐसी चुनौती दी, जिसने लंबे समय से बाजार को विचलित कर रखा है। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस बार रुपया की कमजोरी केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार की सामान्य प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह भारत की वास्तविक आर्थिक स्थिति को दिखाने वाला संकेत है।

रुपए का 90 के स्तर तक गिरना
वर्ष के शुरुआती महीनों में रुपया लगभग 85 के आसपास कारोबार करता था। लेकिन दिसंबर 2025 के शुरुआती सप्ताह तक यह 90.10 से 90.20 की दहलीज पार कर गया। मुद्रा बाजार में यह स्तर केवल तकनीकी गिरावट नहीं, बल्कि आर्थिक संकेतों की गहराई दर्शाता है।
भारत के वित्तीय विशेषज्ञ बताते हैं कि वर्ष के दौरान लगातार डॉलर की मांग बढ़ती गई। विदेशी कंपनियां, विदेशी फंड और आयात आधारित उद्योग निरंतर डॉलर निकालते रहे। अक्टूबर-नवंबर आते-आते स्थिति यह हो गई कि विदेशी वित्तीय संस्थाओं ने जुलाई से दिसंबर के बीच कुल मिलाकर एक लाख करोड़ रुपये भारतीय बाजार से बाहर निकाल दिए।
पिछले तीन दशक की तुलना
यदि भारतीय रुपया—डॉलर संबंध का इतिहास देखें, तो वर्ष 1991 में एक डॉलर की कीमत लगभग 17.50 रुपये थी। आर्थिक उदारीकरण, निजी क्षेत्र के विस्तार और विदेशों में व्यापारिक संबंधों के बढ़ने के बाद रुपया स्वाभाविक रूप से कमजोर होना शुरू हुआ।
साल 2020 आते-आते डॉलर 75 रुपये पर पहुंच चुका था। अब, वर्ष 2025 के अंतिम चरण में यह 90 रुपये को पार कर गया। इस पूरे सफर को संख्या के बजाय आर्थिक परिस्थितियों से समझना अधिक महत्वपूर्ण है। भारत का व्यापार का पैमाना बढ़ा, लेकिन निर्यात का प्रवाह स्थिर नहीं हो पाया। उत्पादन लागत, कच्चे माल के आयात, तेल की जरूरतें और अमेरिकी बाजारों की प्रतिस्पर्धा के कारण भारत को लगातार डॉलर का भुगतान करना पड़ा।
अमेरिकी टैरिफ नीति का प्रभाव
रूपये की गिरावट में अमेरिका द्वारा लगाए गए अतिरिक्त शुल्कों का बहुत बड़ा योगदान है। अमेरिका ने 2025 के मध्य में भारत के निर्यात उत्पादों पर संयुक्त रूप से 50 प्रतिशत शुल्क लागू किया। इसमें 25 प्रतिशत प्रतिकार शुल्क शामिल था और 25 प्रतिशत रूस से कच्चे तेल की खरीदारी पर दंडात्मक स्वरूप में लगाया गया।
भारत लंबे समय से अमेरिका को जूते, वस्त्र, रत्न और आभूषण जैसी वस्तुएं निर्यात करता है। जिस बाजार में पहले भारतीय कंपनियों की पकड़ मजबूत थी, वही बाजार अब महंगा होते जाने के कारण प्रतिस्पर्धा खोता जा रहा है। कंपनियों के लिए यह स्थिति बेहद तनावपूर्ण है, क्योंकि उत्पादन लागत तो पहले ही बढ़ी हुई है और अमेरिकी शुल्क ने इसे और कठिन बना दिया।
व्यापार समझौते में देरी
वर्ष 2025 के शुरुआती महीनों में ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार बाधाओं को खत्म करने वाला समझौता नवंबर तक तैयार हो जाएगा। लेकिन जिस अनिश्चितता की आशंका थी, वह सच साबित हुई। समझौता आगे नहीं बढ़ा और स्थिति पहले से अधिक जटिल बन गई।
निवेशक समुदाय—जिसे सतर्क पूंजी समूह भी कहा जा सकता है—ऐसे निर्णयों से अस्थिर हो जाता है। जब निवेश बाधित होते हैं, विदेशी पूंजी वापस निकलती है और डॉलर की कमी महसूस होती है, तब रुपया अपने आप कमजोर होता है।
विदेशी निवेशकों की निकासी
विदेशी निवेशकों के लिए भारत लंबे समय तक उच्च प्रतिफल वाला बाजार रहा है। लेकिन वर्ष 2025 में अमेरिकी ब्याज दरें लगातार ऊंची रहीं। अमेरिका में बांड बाजार पर सबसे अधिक रिटर्न मिलने लगा। परिणामस्वरूप विदेशी कंपनियां और फंड अपने निवेश भारत से निकालकर अमेरिका में लगा रहे हैं।
जब किसी देश से पूंजी जाती है, तो उस धन का भुगतान विदेशी मुद्रा में होता है। इसका सीधा अर्थ है डॉलर की मांग बढ़ना। मांग बढ़ते ही उसका मूल्य बढ़ता है और उसके मुकाबले रुपया गिरता जाता है।
रिकॉर्ड व्यापार घाटा
अक्टूबर 2025 तक भारत का व्यापार घाटा 41.7 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया। यह अत्यधिक बड़ा घाटा है।
तेल, खाद्य तेल, सोना, धातु, चांदी और इलेक्ट्रॉनिक्स में भारत की निर्भरता पहले से ही ज्यादा रही है। जैसे-जैसे विश्व बाजार में इन वस्तुओं की कीमतें बढ़ीं, भारत को उनके लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़े।
दूसरी ओर निर्यात धीमा पड़ा, क्योंकि अमेरिकी शुल्क उच्च हो गए और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने भारत के मुकाबले सस्ती आपूर्ति शुरू कर दी।
क्या रुपए की गिरावट केवल भारत में हुई?
अनोखी बात यह है कि कई देशों की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले मजबूत हुई हैं। स्वीडिश क्रोन 9 प्रतिशत बढ़ गया, यूरो लगभग 11 प्रतिशत बढ़ गया और चीनी युआन भी स्थिर बना रहा।
इस तुलना से स्पष्ट रूप से यह प्रतीत होता है कि गिरावट केवल वैश्विक आर्थिक दबाव के कारण नहीं हुई बल्कि भारत के भीतर आर्थिक समस्या और निवेश प्रवाह में कमजोरी अधिक जिम्मेदार रही।
RBI की चुनौतियां
रिजर्व बैंक का काम बहुत कठिन हो गया है। रुपये को स्थिर करने के लिए बैंक ने जून से अक्टूबर के बीच लगभग 30 बिलियन डॉलर बाजार में बेचे। डॉलर बेचकर बैंक बाजार की मांग पूरा करता है, ताकि रुपया अत्यधिक नहीं गिरे।
लेकिन हर बार RBI के हस्तक्षेप से स्थिति सुधर जाए, यह संभव नहीं है। विदेशी मुद्रा भंडार सीमित है और लिक्विडिटी संतुलन लंबे समय तक बनाना चुनौती है।
केंद्रीय बैंक ने दिसंबर में बांड खरीद कार्यक्रम और डॉलर-स्वैप की रणनीति अपनाई, जिससे रुपया 91 के स्तर की ओर बढ़ने से कुछ समय के लिए बचा।
क्या आगे रुपया सुधर सकता है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि सुधार आएगा—लेकिन बहुत धीरे। इसके लिए तीन जरूरी बदलाव होंगे
निवेश प्रवाह वापस आए
अमेरिकी टैरिफ पुनरीक्षण हो
भारत का निर्यात फिर मजबूत हो
जब तक यह नहीं होगा, भारतीय रुपया कमजोर रहता रहेगा।
