सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी SIP को भारतीय निवेशकों के लिए एक ऐसी व्यवस्था के रूप में पेश किया गया था, जो बाजार की उठापटक से डरने के बजाय अनुशासन और धैर्य सिखाए। SIP का मकसद था कि निवेशक हर महीने तय रकम निवेश करे, बाजार ऊपर जाए या नीचे, ताकि लंबे समय में औसत लागत घटे और कंपाउंडिंग के जरिए संपत्ति का निर्माण हो सके। लेकिन समय के साथ यह साफ होता जा रहा है कि SIP भले ही एक अनुशासित निवेश साधन हो, निवेशक खुद अभी भी भावनाओं के जाल से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाए हैं।

बीते कुछ वर्षों में SIP बंद करने का जो ट्रेंड सामने आया है, वह इसी भावनात्मक कमजोरी को उजागर करता है। बाजार में जैसे ही गिरावट आती है या रिटर्न उम्मीद से कम दिखने लगता है, बड़ी संख्या में निवेशक SIP को बीच रास्ते में ही रोक देते हैं। दिसंबर 2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि म्यूचुअल फंड में SIP के जरिए आने वाला निवेश 6 प्रतिशत से ज्यादा घट चुका है, जो निवेशकों की बढ़ती बेचैनी का सीधा संकेत है।
SIP स्टॉपेज रेशियो क्यों बन गया चिंता का संकेत
एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड ऑफ इंडिया के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है। पिछले पांच वर्षों में SIP बंद करने की रफ्तार लगातार बढ़ी है। जहां कुछ साल पहले SIP stoppage ratio सामान्य रूप से 40 से 50 प्रतिशत के आसपास रहता था, वहीं अब यह ऐतिहासिक स्तर से कहीं ऊपर पहुंच चुका है। वित्त वर्ष 2022 में यह अनुपात लगभग 41 प्रतिशत था, जो 2023 में बढ़कर करीब 57 प्रतिशत हो गया। 2024 में थोड़ी राहत दिखी, लेकिन 2025 में यह उछलकर 75 प्रतिशत से ज्यादा पहुंच गया। वित्त वर्ष 2026 में तो स्थिति और गंभीर हो गई, जब दिसंबर तक यह अनुपात लगभग 99 प्रतिशत के करीब दर्ज किया गया।
इसका मतलब यह है कि जितनी नई SIP शुरू हो रही हैं, लगभग उतनी ही SIP बंद भी की जा रही हैं। यह आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि निवेशकों का भरोसा लंबे समय तक टिक नहीं पा रहा है। ऊपर से देखने पर भले ही SIP निवेश का कुल आंकड़ा बढ़ता दिखे, लेकिन अंदरखाने तस्वीर कमजोर होती जा रही है।
SIP कल्चर मजबूत दिखता है, लेकिन नींव हिल रही है
पिछले कुछ वर्षों में SIP निवेश के कुल आंकड़े नए रिकॉर्ड बनाते नजर आए हैं। हर महीने म्यूचुअल फंड में SIP के जरिए आने वाली रकम सुर्खियां बनती रही है। इससे यह धारणा बनी कि भारत में SIP कल्चर तेजी से मजबूत हो रहा है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक सच्चाई छिपी है, जिस पर कम चर्चा होती है।
असल समस्या यह नहीं है कि लोग SIP शुरू नहीं कर रहे, बल्कि यह है कि बहुत कम SIP इतनी लंबी चल पा रही हैं कि निवेशक को उनका वास्तविक फायदा मिल सके। नई SIP का रजिस्ट्रेशन धीमा हुआ है, जबकि बंद होने वाली SIP की संख्या तेजी से बढ़ी है। यानी SIP एक लंबी दौड़ का निवेश साधन होने के बावजूद, अधिकतर निवेशक इसे कुछ सालों से ज्यादा नहीं चला पा रहे हैं।
बाजार की गिरावट और डर का रिश्ता
SIP का सबसे बड़ा फायदा बाजार की गिरावट के दौरान मिलता है। जब बाजार नीचे जाता है, तब वही मासिक निवेश ज्यादा यूनिट्स खरीदता है और निवेश की औसत लागत घट जाती है। इसे ही rupee cost averaging कहा जाता है। सिद्धांत रूप में यही वह समय होता है, जब निवेशक को SIP जारी रखनी चाहिए।
लेकिन व्यवहारिक हकीकत इससे उलट है। जैसे ही बाजार गिरता है, पोर्टफोलियो लाल निशान में दिखने लगता है और निवेशक घबराने लगता है। उसे लगता है कि उसका पैसा डूब रहा है, जबकि असल में वह भविष्य के लिए सस्ते दाम पर यूनिट्स खरीद रहा होता है। इसी डर के चलते SIP रोक दी जाती है। कई निवेशक सोचते हैं कि हालात सुधरने पर दोबारा निवेश करेंगे, लेकिन जब तक वे लौटते हैं, बाजार अक्सर ऊपर जा चुका होता है।
आर्थिक मजबूरी भी बनती है वजह
हर बार SIP बंद करने की वजह डर ही नहीं होती। कई बार वास्तविक आर्थिक मजबूरियां भी निवेशकों को यह फैसला लेने पर मजबूर कर देती हैं। नौकरी जाना, मेडिकल इमरजेंसी, घरेलू खर्चों का बढ़ना या बिजनेस में नुकसान जैसी स्थितियां निवेशक की प्राथमिकताएं बदल देती हैं। ऐसे समय में SIP रोकना उन्हें तत्काल राहत देता है।
कोरोना काल इसका बड़ा उदाहरण रहा है। उस दौर में अनिश्चितता बढ़ते ही SIP stoppage ratio में तेज उछाल देखा गया। हालांकि समस्या तब शुरू होती है, जब मजबूरी खत्म होने के बाद भी निवेशक दोबारा SIP शुरू नहीं करता।
अधूरी समझ और गलत उम्मीदें
SIP को लेकर एक बड़ी समस्या यह भी है कि कई नए निवेशक इसे शॉर्ट टर्म कमाई का जरिया मान लेते हैं। बुल मार्केट के दौरान जब चारों तरफ रिटर्न की चर्चा होती है, तो उम्मीदें बहुत बढ़ जाती हैं। जैसे ही किसी साल या कुछ महीनों में प्रदर्शन कमजोर पड़ता है, निवेशक निराश होकर SIP बंद कर देता है।
कुछ निवेशक सिर्फ इसलिए SIP रोक देते हैं क्योंकि उनका फंड एक साल में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाया। वे यह भूल जाते हैं कि SIP का असली फायदा पांच, दस या बीस साल के लंबे समय में दिखता है, न कि कुछ महीनों में।
डायरेक्ट प्लान और रेगुलर प्लान का फर्क
आंकड़े यह भी बताते हैं कि जिन निवेशकों के पास सलाहकार की मदद होती है, वे SIP को ज्यादा समय तक जारी रखते हैं। रेगुलर प्लान में निवेश करने वाले निवेशक बाजार की गिरावट के दौरान भी अपेक्षाकृत शांत रहते हैं। इसके उलट डायरेक्ट प्लान में निवेश करने वाले लोग भावनात्मक फैसले जल्दी लेते हैं।
पांच साल से ज्यादा चलने वाली SIP में डायरेक्ट प्लान का हिस्सा काफी कम है, जबकि रेगुलर प्लान में यह अनुपात ज्यादा है। इसका मतलब साफ है कि सलाहकार की मौजूदगी निवेशकों को घबराहट में गलत फैसले लेने से बचाती है।
SIP बंद करना आज पहले से ज्यादा आसान
टेक्नोलॉजी ने SIP शुरू करना जितना आसान बना दिया है, उसे बंद करना उससे भी ज्यादा सरल हो गया है। मोबाइल ऐप या एक क्लिक में SIP रोक दी जाती है। एक-दो खराब महीनों के बाद बिना ज्यादा सोचे यह फैसला ले लिया जाता है। शॉर्ट टर्म में यह कदम राहत देता है, लेकिन लॉन्ग टर्म में इसका नुकसान बहुत बड़ा होता है।
SIP बीच में रोकने से होने वाला असली नुकसान
SIP से दौलत बनाने का सबसे बड़ा हथियार कंपाउंडिंग है। कंपाउंडिंग को समय चाहिए। अगर निवेशक बीच में SIP रोक देता है, तो सबसे ज्यादा नुकसान इसी कंपाउंडिंग का होता है। उदाहरण के तौर पर अगर कोई निवेशक हर महीने पांच हजार रुपये की SIP करता है और औसतन 12 प्रतिशत रिटर्न मिलता है, तो पांच साल में उसका निवेश लगभग चार लाख रुपये तक पहुंच सकता है। दस साल में यह रकम करीब ग्यारह लाख रुपये हो जाती है। पंद्रह साल में यह बढ़कर तेईस लाख रुपये और बीस साल में लगभग छियालीस लाख रुपये तक पहुंच सकती है।
अगर वही निवेशक दस साल के बाद SIP रोक देता है, तो वह बीस साल की अवधि की तुलना में अपनी संभावित संपत्ति का बड़ा हिस्सा गंवा देता है। कंपाउंडिंग का असली जादू दूसरे दशक में दिखता है, लेकिन ज्यादातर निवेशक वहां तक पहुंचने से पहले ही बाहर निकल जाते हैं।
बाजार के सबसे अच्छे दिन चूक जाना
इक्विटी बाजार में रिटर्न कुछ चुनिंदा दिनों में बनता है। अगर निवेशक SIP रोक देता है, तो बाजार की तेज रिकवरी के सबसे अहम दिन मिस हो जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि अगर कोई निवेशक बाजार के दस सबसे अच्छे दिन मिस कर देता है, तो उसका रिटर्न आधे से भी कम हो सकता है। तीस सबसे अच्छे दिन मिस करने पर पूरा रिटर्न लगभग खत्म हो सकता है।
यही वजह है कि SIP इसलिए फेल नहीं होती क्योंकि बाजार रिटर्न नहीं देता, बल्कि इसलिए फेल होती है क्योंकि निवेशक उसे बीच में छोड़ देता है। सबसे ज्यादा पैसा वही बनता है, जब निवेश जारी रखना सबसे ज्यादा मुश्किल लगता है।
SIP निवेशकों के लिए सबक
SIP का असली फायदा उन्हीं निवेशकों को मिलता है, जो बाजार की सुस्ती और गिरावट के दौरान भी धैर्य बनाए रखते हैं। अस्थायी सुकून के लिए SIP रोकना आसान है, लेकिन इसका नुकसान स्थायी होता है। अगर निवेशक SIP को एक लंबी यात्रा माने और भावनाओं के बजाय योजना पर भरोसा करे, तो यही SIP भविष्य में मजबूत वित्तीय सुरक्षा का आधार बन सकती है।
