जब भी ईरान और अमेरिका या इसराइल के बीच टकराव की स्थिति बनती है, तब पूरी दुनिया की निगाहें मध्य-पूर्व पर टिक जाती हैं। खासतौर पर यह सवाल ज़ोर पकड़ता है कि आखिर मुस्लिम बहुल देश इस संघर्ष में किसके साथ खड़े होंगे। बाहर से देखने पर लगता है कि धार्मिक पहचान के आधार पर इस्लामी देशों को ईरान के समर्थन में एकजुट होना चाहिए, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और विरोधाभासी है।

ईरान जब वैश्विक मंच पर अमेरिका या इसराइल को चुनौती देता है, तो वह खुद को केवल एक राष्ट्र के रूप में नहीं बल्कि एक इस्लामी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। उसके नेता बार-बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि मुस्लिम देशों को बाहरी ताक़तों के दबाव में नहीं आना चाहिए और एक-दूसरे की मज़बूती को साझा ताक़त मानना चाहिए। लेकिन दशकों के अनुभव बताते हैं कि इस्लामी पहचान अब तक इतनी प्रभावशाली नहीं बन पाई है कि वह राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा चिंताओं और भू-राजनीतिक समीकरणों पर भारी पड़ सके।
इस्लामी एकता की अपील और ज़मीनी सच्चाई
करीब डेढ़ दशक पहले ईरान के एक शीर्ष राजनयिक ने खुले मंच से कहा था कि मुस्लिम देशों को बाहरी शक्तियों, विशेष रूप से अमेरिका, के बहकावे में आकर आपस में लड़ना नहीं चाहिए। उनका तर्क था कि जब भी कोई मुस्लिम देश मज़बूत होता है, तो पूरी इस्लामी दुनिया को खुश होना चाहिए, क्योंकि एक की ताक़त दूसरे की ताक़त होती है।
यह विचार सुनने में जितना आकर्षक लगता है, व्यवहार में उतना ही कठिन साबित हुआ है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस्लामी दुनिया किसी एक राजनीतिक विचारधारा, सुरक्षा दृष्टिकोण या साझा रणनीति से संचालित नहीं होती। हर देश की अपनी प्राथमिकताएं हैं, अपनी ऐतिहासिक स्मृतियां हैं और अपने डर हैं।
1979 की क्रांति के बाद बदला संतुलन
ईरान की 1979 की इस्लामिक क्रांति ने मध्य-पूर्व की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। यह पहली बार था जब किसी देश ने खुले तौर पर अमेरिकी प्रभाव वाली व्यवस्था को चुनौती दी और खुद को एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित किया। इस क्रांति के बाद ईरान न केवल पश्चिमी ताक़तों से टकराया, बल्कि क्षेत्र के कई मुस्लिम देशों के लिए भी एक असहज पड़ोसी बन गया।
खाड़ी के अधिकतर देशों में राजशाही व्यवस्था है। उन्हें हमेशा यह डर रहा है कि ईरान की क्रांतिकारी विचारधारा उनके यहां भी अस्थिरता फैला सकती है। यही वजह है कि धार्मिक समानता के बावजूद राजनीतिक अविश्वास गहराता चला गया।
अमेरिका के साथ रिश्ते और मजबूरी का गठबंधन
मध्य-पूर्व के अधिकांश इस्लामी देश अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं। उनकी सुरक्षा, हथियारों की आपूर्ति और रणनीतिक संरक्षण काफी हद तक वॉशिंगटन पर निर्भर करता है। ऐसे में जब ईरान अमेरिका से टकराता है, तो ये देश दुविधा में पड़ जाते हैं।
एक ओर उन्हें अपनी मुस्लिम जनता के सामने यह दिखाना होता है कि वे किसी मुस्लिम देश पर हुए हमले का समर्थन नहीं कर रहे हैं। दूसरी ओर वे अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को भी खराब नहीं करना चाहते। यही कारण है कि अक्सर ये देश कड़े शब्दों में निंदा तो करते हैं, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर तटस्थ या मौन बने रहते हैं।
चीन, रूस और सीमित समर्थन की राजनीति
ईरान के चीन और रूस के साथ रिश्ते अपेक्षाकृत मज़बूत हैं, लेकिन यह समर्थन भी सीमाओं में बंधा हुआ है। ये दोनों देश अमेरिका के साथ सीधे सैन्य टकराव से बचना चाहते हैं। वे ईरान को कूटनीतिक और आर्थिक समर्थन तो देते हैं, लेकिन खुली जंग में कूदने से परहेज करते हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि ईरान अंतरराष्ट्रीय मंच पर पूरी तरह अकेला नहीं है, लेकिन उसे वह व्यापक और खुला समर्थन भी नहीं मिल पाता जिसकी उसे उम्मीद रहती है।
तुर्की का दोहरा चेहरा
तुर्की अक्सर ईरान के पक्ष में बयान देता हुआ दिखता है और इस्लामी पहचान की बात भी करता है। लेकिन तुर्की नाटो का सदस्य है और उसके पश्चिमी देशों से गहरे रणनीतिक संबंध हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय स्तर पर तुर्की और ईरान के हित कई बार टकराते भी रहे हैं।
सीरिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक समय ईरान समर्थित सरकार को बनाए रखने में तुर्की की भूमिका निर्णायक रही, लेकिन मौजूदा स्थिति में वहां की सत्ता संरचना ईरान के बजाय तुर्की के प्रभाव में मानी जा रही है। इससे यह साफ हो जाता है कि धार्मिक पहचान से अधिक अहमियत क्षेत्रीय प्रभाव और रणनीतिक लाभ को दी जाती है।
अमेरिकी सैन्य ठिकाने और यथार्थ की दीवार
मध्य-पूर्व में अमेरिका के कई देशों में सैन्य ठिकाने हैं। यदि अमेरिका ईरान पर हमला करता है, तो इन ठिकानों का इस्तेमाल होना लगभग तय माना जाता है। ऐसे में यह उम्मीद करना कि ये देश धार्मिक एकजुटता के नाम पर ईरान के साथ खड़े हो जाएंगे, व्यावहारिक नहीं लगता।
ईरान ने भी यह स्पष्ट संकेत दिया है कि अगर उस पर हमला हुआ, तो उन देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता है। यह चेतावनी बताती है कि संघर्ष की स्थिति में पूरा क्षेत्र इसकी चपेट में आ सकता है।
औपचारिक निंदा और वास्तविक दूरी
पिछले साल जब ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले हुए थे, तब 20 से अधिक मुस्लिम देशों ने सार्वजनिक रूप से इसकी निंदा की थी। इनमें खाड़ी से लेकर दक्षिण एशिया और अफ्रीका तक के देश शामिल थे। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये बयान ज़्यादातर प्रतीकात्मक थे।
असल में ये देश अपनी वैश्विक छवि और घरेलू जनमत को संतुलित करना चाहते थे। व्यवहारिक स्तर पर उन्होंने न तो ईरान के पक्ष में कोई ठोस कदम उठाया और न ही इसराइल या अमेरिका के साथ अपने रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव किया।
इसराइल के साथ संबंध और बदलती प्राथमिकताएं
पिछले कुछ दशकों में कई मुस्लिम देशों ने इसराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं। यह बदलाव अपने आप में दिखाता है कि धार्मिक विरोध के बजाय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।
जब लेबनान में ईरान समर्थित संगठन को इसराइल के खिलाफ कार्रवाई से रोका गया, या जब सीरिया की नई सत्ता ने इसराइल के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया, तो यह स्पष्ट हो गया कि ईरान का प्रभाव क्षेत्र सिकुड़ रहा है।
शिया-सुन्नी विभाजन की गहरी जड़ें
ईरान शिया बहुल देश है, जबकि इस्लामी दुनिया का बड़ा हिस्सा सुन्नी है। यह धार्मिक विभाजन सदियों पुराना है और राजनीतिक संघर्षों में बार-बार उभरता रहा है। 1979 की क्रांति के बाद यह दरार और गहरी हो गई।
खाड़ी देशों को यह डर रहा है कि ईरान शिया समुदायों के ज़रिए उनके यहां अस्थिरता फैलाने की कोशिश कर सकता है। बहरीन, इराक और यमन जैसे देशों में ईरान पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं।
परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय चिंता
ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने भी इस्लामी देशों की चिंता बढ़ाई है। कई देशों को यह डर है कि अगर ईरान परमाणु शक्ति बनता है, तो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा।
यही वजह है कि जब ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला हुआ, तो कई देशों ने राहत की सांस भी ली, भले ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसकी निंदा की हो।
खाड़ी देशों की चुप्पी और कूटनीतिक संतुलन
ईरान में हालिया विरोध प्रदर्शनों पर सऊदी अरब, यूएई और क़तर जैसे देशों की चुप्पी भी बहुत कुछ कहती है। ये देश नहीं चाहते कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो, क्योंकि इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल सकती है।
हाल के वर्षों में ईरान और सऊदी अरब के रिश्तों में सुधार हुआ है, राजनयिक संबंध बहाल हुए हैं और निवेश के रास्ते खुले हैं। लेकिन अविश्वास अब भी बना हुआ है।
ओमान की मध्यस्थता की भूमिका
इस पूरे समीकरण में ओमान एक ऐसा देश है, जो लगातार मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का रास्ता अक्सर ओमान के ज़रिए ही खुलता है।
हाल ही में तेहरान में हुई उच्चस्तरीय बैठकें इस बात का संकेत देती हैं कि ईरान अभी भी बातचीत का विकल्प खुला रखना चाहता है और सीधे टकराव से बचने की कोशिश कर रहा है।
सऊदी-ईरान प्रतिद्वंद्विता की निरंतरता
सऊदी अरब और ईरान की प्रतिद्वंद्विता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक भी है। एक ओर राजशाही मॉडल है, दूसरी ओर इस्लामिक क्रांति का विचार।
यह टकराव दशकों से चला आ रहा है और इसमें कमी के संकेत बहुत सीमित हैं। यही कारण है कि इस्लामी एकता की बातें अक्सर भाषणों तक सीमित रह जाती हैं।
पाकिस्तान की दुविधा और सीमाई चिंता
पाकिस्तान का मामला और भी जटिल है। वह लंबे समय से अमेरिका का सहयोगी रहा है, जबकि ईरान अमेरिका के सबसे बड़े आलोचकों में से एक है। दोनों देशों के बीच सीमाई तनाव भी समय-समय पर सामने आता रहा है।
पाकिस्तान नहीं चाहता कि ईरान में अस्थिरता फैले, क्योंकि इससे उसकी 900 किलोमीटर लंबी सीमा प्रभावित होगी। शरणार्थी संकट, हथियारों की तस्करी और आतंकवाद जैसे खतरे बढ़ सकते हैं।
पाकिस्तानी विश्लेषकों का मानना है कि ईरान में किसी भी तरह का सत्ता परिवर्तन या बाहरी हस्तक्षेप पूरे क्षेत्र के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।
इस्लामी देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती
अगर अमेरिका और ईरान के बीच खुला युद्ध होता है, तो इस्लामी देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की होगी। उन्हें अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक संबंध भी बचाने हैं और मुस्लिम दुनिया में अपनी साख भी।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में बहुत कम देश अमेरिका को सैन्य सहयोग देने से इनकार कर पाएंगे। अतीत में ऐसा हुआ है, लेकिन तब और अब की वैश्विक राजनीति में बड़ा अंतर है।
निष्कर्ष: पहचान बनाम हित
ईरान संकट ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि इस्लामी दुनिया किसी एक पहचान के तहत एकजुट नहीं है। यहां धर्म से अधिक ताक़तवर तत्व राष्ट्रीय हित, सुरक्षा चिंताएं और वैश्विक गठबंधन हैं।
जब तक इस्लामी देशों के बीच साझा राजनीतिक दृष्टि और रणनीति नहीं बनती, तब तक धार्मिक एकता केवल भाषणों और बयानों तक ही सीमित रहेगी। ईरान की स्थिति इस सच्चाई का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है।
