जब भी गल्फ देशों का नाम लिया जाता है, तो अधिकतर लोगों के मन में सबसे पहले कांच और स्टील से बनी ऊंची-ऊंची इमारतों की तस्वीर उभरती है। दुबई, दोहा या अबू धाबी जैसे शहरों की पहचान गगनचुंबी टावरों, रिकॉर्ड तोड़ ऊंचाई और आधुनिक वास्तुकला से जुड़ी हुई है। लेकिन इसी खाड़ी क्षेत्र में एक ऐसा देश भी है, जो आधुनिकता की दौड़ में शामिल होने के बावजूद अपनी सादगी, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान को सबसे ऊपर रखता है। यह देश है ओमान।

ओमान की राजधानी मस्कट में कदम रखते ही यह फर्क साफ नजर आने लगता है। यहां न तो आसमान छूती इमारतें दिखाई देती हैं और न ही ऊंचाई की कोई होड़। शहर का स्वरूप शांत, संतुलित और प्रकृति के करीब दिखाई देता है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सोच-समझकर अपनाई गई नीति का परिणाम है।
ओमान की शहरी योजना का दर्शन
ओमान की सरकार और शासकों ने शुरुआत से ही यह फैसला किया कि विकास का मतलब सिर्फ ऊंची इमारतें और चमक-दमक नहीं है। उनके लिए विकास का अर्थ है परंपरा, संस्कृति और प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना। इसी सोच के तहत शहरी नियोजन में यह नियम बनाया गया कि किसी भी इमारत की ऊंचाई एक तय सीमा से अधिक नहीं होगी।
मस्कट और उसके आसपास के इलाकों में अधिकतर इमारतें पहाड़ों, समुद्र और ऐतिहासिक किलों की ऊंचाई से ज्यादा नहीं बनाई जातीं। इससे शहर का प्राकृतिक सौंदर्य बना रहता है और पुरानी विरासत आधुनिक ढांचे में दबकर गायब नहीं होती।
सुल्तान कबूस की विरासत
ओमान की यह नीति देश के दिवंगत शासक सुल्तान कबूस बिन सईद की सोच का हिस्सा रही है। उन्होंने देश को आधुनिक बनाने के साथ-साथ उसकी आत्मा को बचाए रखने पर जोर दिया। सुल्तान कबूस का मानना था कि अगर ओमान भी बाकी देशों की तरह ऊंची इमारतों की दौड़ में शामिल हो गया, तो उसकी पहचान खो जाएगी।
उनके शासनकाल में यह स्पष्ट निर्देश दिया गया कि शहरों का विकास पारंपरिक ओमानी वास्तुकला के अनुरूप होगा। सफेद या हल्के रंग की इमारतें, मेहराबदार खिड़कियां और कम ऊंचाई वाले भवन ओमान की शहरी पहचान बने।
प्राकृतिक भूगोल का सम्मान
ओमान का भूगोल भी इसकी इमारतों की ऊंचाई तय करने में अहम भूमिका निभाता है। मस्कट चारों ओर से पहाड़ों और अरब सागर से घिरा हुआ है। ऊंची इमारतें बनाने से न केवल प्राकृतिक दृश्य प्रभावित होता, बल्कि भूकंपीय और पर्यावरणीय जोखिम भी बढ़ सकता था।
यहां की सरकार ने तय किया कि शहर का विस्तार क्षैतिज होगा, न कि ऊर्ध्वाधर। इससे हवा, रोशनी और खुले स्थानों की उपलब्धता बनी रहती है और शहर दमघोंटू नहीं बनता।
धार्मिक और सांस्कृतिक सम्मान
ओमान में मस्जिदों और ऐतिहासिक स्थलों को विशेष सम्मान दिया जाता है। मस्कट की प्रसिद्ध सुल्तान कबूस ग्रैंड मस्जिद इसका उदाहरण है। इस भव्य मस्जिद के निर्माण में भारतीय बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है और इसकी ऊंचाई को इस तरह संतुलित रखा गया है कि यह शहर पर हावी न लगे, बल्कि उसकी शोभा बढ़ाए।
यहां यह मान्यता है कि धार्मिक और ऐतिहासिक इमारतें ही शहर की पहचान होनी चाहिए, न कि व्यावसायिक टावर।
दुबई से अलग रास्ता
दुबई ने खुद को वैश्विक व्यापार और पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए ऊंची इमारतों और रिकॉर्ड तोड़ परियोजनाओं का रास्ता चुना। वहीं ओमान ने पर्यटन के लिए प्रकृति, शांति और सांस्कृतिक अनुभव को अपना हथियार बनाया।
ओमान आने वाले पर्यटक यहां पहाड़ों, रेगिस्तान, समुद्र तट, पुराने किले और पारंपरिक बाजारों का अनुभव लेने आते हैं। उन्हें यहां सुकून और संतुलन मिलता है, जो गगनचुंबी शहरों में दुर्लभ हो चुका है।
आधुनिकता के बावजूद सादगी
यह कहना गलत होगा कि ओमान आधुनिक नहीं है। यहां आधुनिक सड़कें, बंदरगाह, हवाई अड्डे और सुविधाएं मौजूद हैं। लेकिन इन सबको इस तरह विकसित किया गया है कि वे परंपरा के साथ टकराव में न आएं।
ओमान की इमारतें भले ही ऊंची न हों, लेकिन उनकी गुणवत्ता, डिजाइन और उपयोगिता किसी भी आधुनिक शहर से कम नहीं है।
स्थानीय लोगों की सोच
ओमान के नागरिक भी इस नीति का समर्थन करते हैं। उनके लिए यह गर्व की बात है कि उनका देश अपनी पहचान बनाए रखते हुए आगे बढ़ रहा है। वे मानते हैं कि ऊंची इमारतें कुछ समय के लिए आकर्षण पैदा कर सकती हैं, लेकिन संस्कृति और प्रकृति ही किसी देश को स्थायी पहचान देती है।
दुनिया के लिए एक संदेश
आज जब कई देश विकास को केवल ऊंचाई और भव्यता से जोड़कर देखते हैं, ओमान एक अलग उदाहरण पेश करता है। यह बताता है कि विकास और सादगी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
ओमान की सड़कों पर चलते हुए यह एहसास होता है कि यहां इंसान, प्रकृति और परंपरा के बीच एक अनकहा समझौता है। यही कारण है कि यहां दुबई जैसी ऊंची इमारतें नहीं दिखतीं और शायद इसी वजह से ओमान सबसे अलग नजर आता है।
