भोपाल की सुबह हमेशा की तरह शांत थी, लेकिन कलेक्ट्रेट परिसर की दहलीज़ पर जैसे कोई अदृश्य बेचैनी हवा में घुली हुई थी। मंगलवार का दिन—वह दिन, जब आम लोग अपने छोटे-बड़े दुख, संघर्ष और उम्मीदें लेकर प्रशासन के दरवाज़े पर दस्तक देते हैं। कलेक्ट्रेट परिसर के गलियारे में कदमों की आवाज़ें गूँज रही थीं। कोई आवेदन हाथ में लिए था, कोई फाइलों का भारी पुलिंदा, तो कोई उम्मीदों से भरी नज़रों के साथ अपने नंबर का इंतज़ार कर रहा था।
उसी भीड़ में एक महिला भी खड़ी थी। चेहरे पर थकान, आँखों में असुरक्षा की परछाईं और व्यवहार में एक अजीब-सी काँपती दृढ़ता। यह संत हिरदाराम नगर की वही महिला थी, जो बाद में उस दिन की सबसे चर्चित शिकायत लेकर अधिकारियों के सामने पहुँची। उसकी शिकायत सिर्फ एक घरेलू विवाद नहीं थी—उसके शब्दों में टूटी हुई जिंदगी की पुकार थी।

“साहब! मेरा पति मुझे बांग्लादेशी महिला के लिए छोड़ गया…”
जब उसका नंबर आया, तो वह धीरे-धीरे उठी। हाथों में कागज़ थे, लेकिन असली बोझ तो वह था जो उसके दिल पर था। एडीएम और मौजूद अधिकारियों के सामने बैठते ही उसकी आवाज़ हल्की-सी कांपी, लेकिन भीतर के दर्द ने उसे साहस दिया।
“साहब… मेरा पति मुझे छोड़कर एक बांग्लादेशी महिला के साथ रह रहा है…”
कमरे में एक हलचल-सी फैल गई। अधिकारी सजग हुए। बाकी लोगों ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा।
महिला ने कहना शुरू किया— उसके ससुराल वाले राजगढ़ जिले के देवगढ़ के पास रहते हैं। कई महीनों से उसका पति उससे मारपीट कर उसे घर से निकाल देता है। उसने जब विरोध किया, तो आरोप लगाया कि पति रिश्ते में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं रखता, क्योंकि वह एक “बांग्लादेशी महिला” के साथ रह रहा है। “उस महिला का कोई पता नहीं, साहब… मेरे पति ने मुझे घर से बाहर कर दिया… मैं जब ससुराल पहुंची, तो मारपीट करके भगा दिया गया…”
उसकी आँखों से बहते आँसू और टूटी आवाज़ ने पूरे माहौल को कुछ देर के लिए स्थिर बना दिया। उसने बताया कि उसने नरसिंहगढ़ थाने में शिकायत की, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। यह वही शिकायत थी, जिसे सुनकर अधिकारियों ने फाइल एडीएम को दी, और फिर उन्होंने इसे तत्काल राजगढ़ एसपी को जांच के लिए भेजने का निर्देश दिया।
भोपाल की जनसुनवाई—जहाँ दर्दों की कतार लगती है
उस दिन कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में कुल 135 लोग अपनी परेशानी लेकर पहुँचे थे। हर किसी के पास एक समस्या थी—कुछ छोटी, कुछ बड़ी, और कुछ बिल्कुल दिल दहला देने वाली। जनसुनवाई का उद्देश्य ही यह है कि आम लोगों की आवाज़ सीधे प्रशासन तक पहुँचे। लेकिन यह मंच सिर्फ शिकायत दर्ज करने की औपचारिकता नहीं है—यह उन लोगों के लिए आखिरी सहारा होता है जिनके जीवन में कहीं कोई सुनने वाला नहीं बचा।
एक ओर महिला पति के दूसरी महिला के साथ रहने की शिकायत कर रही थी, वहीं दूसरी ओर कोई अपनी पेंशन से जुड़े संघर्ष सुना रहा था, तो कोई घरेलू हिंसा का दर्द लेकर आया था।
“मनमाना ब्याज लगाकर मेरा मकान हड़पना चाहते हैं…”
भीड़ में खड़ी एक और महिला ने अधिकारियों के सामने अपनी समस्या रखी। छाया सिकरवार—नवीबाग स्थित इंडस रेजेंसी की निवासी। उसकी कहानी भी दुख से भरी थी, लेकिन उसका दर्द अलग था। “साहब, मेरे पति चार साल पहले बिना बताए चले गए… और अब बैंक व कर्मचारी मेरे मकान पर कब्ज़ा करवाना चाहते हैं…”
उसके पति संजय सिंह सिकरवार सेना से रिटायर्ड हैं। उन्होंने 42 लाख रुपये का मकान खरीदा था—21 लाख नकद और 21 लाख का बैंक से लोन।
लेकिन पति के अचानक गायब होने के बाद एक-एक कागज़ बोझ बनता गया। बैंक कहता है—जीवित प्रमाण पत्र दो, नहीं तो पेंशन रुकी रहेगी। बिना पेंशन के EMI देना नामुमकिन, और EMI के बिना बैंक का दबाव बढ़ता गया। “मकान मेरे नाम पर नहीं, साहब… पति के नाम पर है… मैंने पेंशन से 11 लाख 62 हजार चुका दिए… फिर भी परेशान करते हैं…” महिला का दर्द प्रशासन ने सुना और जांच भोपाल एसडीएम को सौंप दी गई।
“शराबी पति मेरी तीन साल की बेटी को भी नहीं लौटा रहा…”
जनसुनवाई में एक और महिला आई, जो बार-बार आँसू पोंछते हुए अपनी बात कह रही थी। उसका पति शराब के नशे में रोज मारपीट करता। सालों की सहनशीलता के बाद जब वह पुलिस के पास गई, तो स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया।
फिर एक दिन पति ने उसकी तीन साल की बच्ची को अपने पास रख लिया। “साहब, वो शराबी है… बच्ची की देखभाल नहीं कर पाएगा… मेरी बच्ची मुझे वापस दिलवाइए…” उसकी आवाज़ में वह पीड़ा थी, जिसे न कोई कानून माप सकता है और न कोई कागज़ समझ सकता है।
दंगा पीड़ित कालूराम का गुस्सा
135 शिकायतों में एक आवेदन दंगा पीड़ित कालूराम का भी था। वह आर्थिक सहायता मांगने के लिए आया था। लेकिन आवेदन नहीं स्वीकारे जाने पर वह गुस्से में अधिकारियों को धमकाने लगा। हालाँकि, बाद में उसकी शिकायत दर्ज की गई और जांच के लिए भेजी गई।
यह दृश्य जनसुनवाई में अक्सर दिख जाता है—जहाँ उम्मीदें टूटने पर लोग तुनक जाते हैं। क्योंकि यहाँ हर इंसान अपनी आखिरी उम्मीद लेकर बैठा होता है।
प्रशासन ने क्या कहा?
उस दिन कुल 135 शिकायतें दर्ज की गईं। अधिकारियों ने हर केस को गंभीरता से सुनने का दावा किया। एडीएम सुमित पांडे और अंकुर मेश्राम ने विभागों को निर्देश दिए कि— “शिकायतों का जल्द से जल्द निराकरण किया जाए।”
लेकिन असली सवाल यही है— क्या प्रशासनिक प्रक्रिया उतनी तेज़ और न्यायपूर्ण होगी, जितनी शिकायतें दर्दनाक हैं?
जनसुनवाई से निकलते लोग—कुछ संतुष्ट, कुछ उदास
शाम ढलते-ढलते कलेक्ट्रेट परिसर में सन्नाटा बढ़ने लगा था। भीड़ छंट चुकी थी। किसी के चेहरे पर उम्मीद की मुस्कान थी, तो कोई निराश होकर लौट रहा था।
बांग्लादेशी महिला के साथ पति के रहने के आरोप वाली महिला धीरे-धीरे बाहर निकली।
उसके कदम भारी थे, लेकिन मन में यह तसल्ली थी कि कम से कम उसकी बात सुनी गई।
क्या उसे न्याय मिलेगा—यह आने वाले दिनों की कहानी होगी।
लेकिन इस दिन की गवाही यह थी कि समाज में हर दिन कितनी महिलाएँ, कितने परिवार और कितने लोग अपनी अदृश्य लड़ाइयाँ लड़ रहे हैं।
जनसुनवाई सिर्फ शिकायत का मंच नहीं, यह टूटे हुए दिलों की मरहमगाह है
यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि उन असंख्य लोगों की है जो घरेलू हिंसा, मानसिक उत्पीड़न, पुलिस की उदासीनता और परिवारों की जटिल समस्याओं के बीच जीवन जी रहे हैं। जनसुनवाई का यह मंच उन लोगों के लिए आशा का अंतिम सिरा है, जिन्हें कहीं और सुनवाई नहीं मिलती।
इस दिन दर्ज हुई 135 शिकायतें हमें याद दिलाती हैं कि विकास की रफ़्तार के बीच सामाजिक पीड़ा की परतें अभी भी गहरी हैं। और शायद… इन्हीं आवाज़ों को सुनकर ही समाज थोड़ा-थोड़ा बेहतर होता है।
