इतिहास गवाह है कि जब भी वैश्विक संतुलन बिगड़ता है, जब शक्तिशाली राष्ट्र आपसी संवाद की जगह दबाव और ताकत का रास्ता चुनते हैं, तब दुनिया को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश कर चुकी दुनिया आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां अंतरराष्ट्रीय नियम, नैतिक समझौते और कूटनीतिक मर्यादाएं धीरे-धीरे कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था, जिसने दशकों तक बड़े टकरावों को रोके रखा, अब सवालों के घेरे में है।

इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका के जाने-माने सुरक्षा और कूटनीति विशेषज्ञ डॉक्टर रॉबर्ट फार्ले की चेतावनी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा है। उनका कहना है कि वर्ष 2026 दुनिया के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। यदि मौजूदा हालात ऐसे ही बने रहे, तो तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।
विशेषज्ञ की चेतावनी क्यों मानी जा रही है गंभीर
डॉक्टर रॉबर्ट फार्ले केवल एक विश्लेषक नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य रणनीति और कूटनीतिक इतिहास के गहन अध्येता माने जाते हैं। उन्होंने वाशिंगटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है और लंबे समय से वैश्विक संघर्षों पर लेखन करते रहे हैं। उनके अनुसार आज की दुनिया अस्थिरता के ऐसे चरण में प्रवेश कर चुकी है, जहां कई छोटे-छोटे संघर्ष एक साथ भड़क सकते हैं और धीरे-धीरे एक बड़े वैश्विक युद्ध का रूप ले सकते हैं।
उनका विश्लेषण बताता है कि मौजूदा दौर में अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व भूमिका कमजोर पड़ती नजर आ रही है। जिस तरह से अमेरिका आंतरिक राजनीतिक उलझनों और आर्थिक प्राथमिकताओं में उलझा है, उसने अन्य शक्तियों को आक्रामक होने का अवसर दिया है। ऐसे में कुछ भौगोलिक क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पहले से सुलग रही चिंगारी कभी भी भयानक आग में बदल सकती है।
ग्रीनलैंड: जहां बर्फ के नीचे छिपा है टकराव का खतरा
कुछ साल पहले तक ग्रीनलैंड को युद्ध संभावनाओं की सूची में शामिल करना कल्पना से परे लगता था। अमेरिका और डेनमार्क लंबे समय से सहयोगी रहे हैं और ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां भी बिना किसी बड़े विरोध के चलती रही हैं। लेकिन हाल के वर्षों में हालात तेजी से बदले हैं।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की बात ने यूरोप में हलचल मचा दी थी। सैन्य कार्रवाई की धमकी, आर्थिक दबाव और टैरिफ जैसे मुद्दों ने ट्रांसअटलांटिक संबंधों को तनावपूर्ण बना दिया। भले ही बाद में बयान नरम पड़े हों, लेकिन यूरोपीय देशों ने इसे हल्के में नहीं लिया। ग्रीनलैंड में संयुक्त यूरोपीय सैन्य उपस्थिति इस बात का संकेत है कि वे किसी भी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच किसी भी स्तर पर सैन्य या रणनीतिक टकराव हुआ, तो उसका असर केवल आर्कटिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। यह नाटो जैसे गठबंधनों की नींव को भी हिला सकता है, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।
यूक्रेन: लंबा युद्ध और बढ़ता खतरा
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध अब अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश करने की ओर बढ़ रहा है। यह युद्ध केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि इसमें अप्रत्यक्ष रूप से कई वैश्विक शक्तियां शामिल हो चुकी हैं। रूस धीरे-धीरे लेकिन रणनीतिक रूप से आगे बढ़ रहा है, जबकि यूक्रेन लगातार हवाई हमलों और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है।
2025 में शांति वार्ताओं की विफलता ने हालात को और गंभीर बना दिया। अमेरिका रूस को किसी ठोस समझौते के लिए राजी करने में असफल रहा, वहीं रूस की आंतरिक आर्थिक परेशानियां उसे और आक्रामक कदम उठाने के लिए मजबूर कर सकती हैं। यदि यूक्रेनी मोर्चा कमजोर पड़ता है, तो यूरोपीय देश सीधे हस्तक्षेप के लिए मजबूर हो सकते हैं।
फ्रांस और ब्रिटेन द्वारा रूसी शैडो फ्लीट पर सख्ती पहले ही तनाव को बढ़ा चुकी है। यदि किसी भी स्तर पर यूरोपीय और रूसी सैनिक आमने-सामने आए, तो यह संघर्ष सीमित नहीं रहेगा और पूरे महाद्वीप को अपनी चपेट में ले सकता है।
ताइवान: एशिया में सबसे संवेदनशील मोर्चा
पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में ताइवान लंबे समय से तनाव का केंद्र रहा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है। चीन लगातार अपनी सैन्य शक्ति का विस्तार कर रहा है और ताइवान को अपने क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा मानता है। दूसरी ओर, अमेरिका की सुरक्षा प्रतिबद्धता अब पहले जैसी स्पष्ट नहीं दिखाई देती।
डॉक्टर फार्ले के अनुसार, यदि अमेरिका अन्य क्षेत्रों में उलझा रहता है, तो चीन ताइवान को लेकर निर्णायक कदम उठा सकता है। ताइवान की सैन्य तैयारी सीमित है और वह बड़े पैमाने पर बाहरी समर्थन पर निर्भर करता है। ऐसे में किसी भी तरह की चूक पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंक सकती है।
ईरान: कमजोर लेकिन खतरनाक
2025 की शुरुआती झड़पों ने ईरान को राजनीतिक और आर्थिक रूप से कमजोर जरूर किया है, लेकिन उसकी सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव अब भी बना हुआ है। देश के भीतर असंतोष बढ़ रहा है और अंतरराष्ट्रीय दबाव भी चरम पर है। अमेरिका द्वारा संभावित हमलों की चेतावनी ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है।
ईरान के पतन या उस पर सीधे हमले की स्थिति में पूरा मध्य पूर्व अस्थिर हो सकता है। रूस और चीन ने ईरान में रणनीतिक निवेश किया है और वे इसे आसानी से छोड़ने वाले नहीं हैं। ऐसे में एक क्षेत्रीय संघर्ष वैश्विक शक्तियों को सीधे टकराव में ला सकता है।
भारत-पाकिस्तान: परमाणु तनाव का सबसे बड़ा खतरा
दक्षिण एशिया हमेशा से वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय रहा है। भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु संपन्न देश हैं और उनके बीच अविश्वास की दीवार बेहद ऊंची है। 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने एक बार फिर दिखा दिया कि दोनों देशों के बीच हालात कितनी जल्दी बिगड़ सकते हैं।
कश्मीर में आतंकी हमलों और उसके जवाब में की गई सैन्य कार्रवाइयों ने तनाव को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। आतंकवाद की जड़ें अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं, जिससे भविष्य में किसी भी छोटी घटना के बड़े युद्ध में बदलने का खतरा बना हुआ है। इस क्षेत्र में संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चीन, अमेरिका और रूस जैसे देश भी इसमें खिंच सकते हैं।
क्या तीसरा विश्वयुद्ध टल सकता है
इतिहास यह भी बताता है कि युद्ध अनिवार्य नहीं होते, यदि समय रहते संवाद, कूटनीति और समझदारी का रास्ता अपनाया जाए। डॉक्टर फार्ले की चेतावनी को डर फैलाने की बजाय एक गंभीर संकेत के रूप में देखना चाहिए। यदि वैश्विक शक्तियां अपनी जिम्मेदारी समझें और टकराव की जगह सहयोग को प्राथमिकता दें, तो 2026 को विनाश के साल बनने से रोका जा सकता है।
