भारत के पास रेयर अर्थ मेटल्स (Rare Earth Metals) का विशाल भंडार मौजूद है — इतना बड़ा कि भारत इस मामले में दुनिया के शीर्ष पाँच देशों में शामिल है। ये वही कीमती धातुएं हैं जिनसे इलेक्ट्रिक गाड़ियों के मोटर, स्मार्टफोन, लैपटॉप, मिसाइल सिस्टम, और सैटेलाइट जैसी अत्याधुनिक तकनीकें बनती हैं।

लेकिन यह विडंबना है कि इस खजाने के बावजूद भारत को आज भी रेयर अर्थ से बने उत्पाद—खासकर रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स (REPMs)—चीन से खरीदने पड़ते हैं। सवाल यह उठता है कि जब हमारे पास संसाधन हैं, तो आत्मनिर्भरता अब तक क्यों नहीं आ सकी?
रेयर अर्थ मेटल्स क्या हैं और क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?
रेयर अर्थ तत्व कुल 17 प्रकार के होते हैं, जिनमें नियोडिमियम (Neodymium), प्रासियोडिमियम (Praseodymium), टर्बियम, डिस्प्रोसियम और लैंथेनम जैसे नाम शामिल हैं। ये धातुएं सीधे-सीधे हर उस उपकरण में इस्तेमाल होती हैं जो “स्मार्ट” या “ग्रीन टेक्नोलॉजी” से जुड़ा है—जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों के मोटर, पवन टरबाइन, मोबाइल स्पीकर, कंप्यूटर हार्ड डिस्क, और यहां तक कि आधुनिक हथियार प्रणालियां भी।
भारत में शुरुआत 1950 में, लेकिन कहानी अधूरी रह गई
भारत की रेयर अर्थ यात्रा की नींव 1950 में रखी गई थी, जब सरकार ने “इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड” (IREL) की स्थापना की। उस समय दुनिया में इन धातुओं की मांग बहुत कम थी, और उनका औद्योगिक महत्व पूरी तरह समझा नहीं गया था।
IREL ने शुरुआती दौर में बीच की रेत से मिलने वाले मोनाजाइट खनिज से दूसरे उपयोगी तत्व निकालने पर ध्यान केंद्रित किया। धीरे-धीरे रेयर अर्थ मेटल्स का वैश्विक महत्व बढ़ने लगा, लेकिन भारत में यह सेक्टर नियामकीय अड़चनों और धीमी प्रक्रियाओं में उलझा रहा।
चीन कैसे बना दुनिया का रेयर अर्थ सम्राट?
जहां भारत 1950 में इस दिशा में कदम बढ़ा चुका था, वहीं चीन ने 1980 के दशक से इस सेक्टर में आक्रामक निवेश शुरू किया। चीन ने खनन, प्रसंस्करण (processing) और मूल्य-वर्धन (value addition) की पूरी सप्लाई चेन विकसित कर ली।
आज स्थिति यह है कि दुनिया के कुल रेयर अर्थ उत्पादन का लगभग 70% हिस्सा अकेले चीन के पास है, जबकि भारत की उत्पादन क्षमता सालाना मात्र 3000 टन के आसपास है। तुलना में, चीन सालाना 2.7 लाख टन रेयर अर्थ निकालता है।
भारत क्यों पिछड़ गया?
भारत के रेयर अर्थ खनिज मुख्य रूप से मोनाजाइट रेत में पाए जाते हैं। इस रेत में थोरियम नामक रेडियोधर्मी तत्व भी मौजूद होता है, जिसे एटॉमिक मटीरियल की श्रेणी में रखा गया है। यही वजह है कि इन खनिजों के खनन और प्रोसेसिंग पर सख्त सरकारी नियंत्रण है।
इस रेडियोधर्मी नियंत्रण के चलते निजी कंपनियों की भागीदारी लगभग नाममात्र रही है। जब तक नीतियों में लचीलापन नहीं लाया गया, तब तक बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन संभव नहीं था।
IREL की भूमिका और चुनौतियाँ
IREL देश की अकेली बड़ी कंपनी है जो नियोडिमियम-प्रासियोडिमियम (NdPr) ऑक्साइड बनाती है—जो इलेक्ट्रिक मोटर्स में इस्तेमाल होने वाले रेयर अर्थ मैग्नेट्स के निर्माण में सबसे जरूरी तत्व है।
विजाग (आंध्र प्रदेश) में IREL का अत्याधुनिक प्लांट देश की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि, बीते साल से यह कंपनी बिना चेयरपर्सन और मैनेजिंग डायरेक्टर के काम कर रही है।
फिर भी, FY2023-24 में IREL ने 1012 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया। यह साबित करता है कि भारत में क्षमता है, बस नीति और प्रबंधन को मज़बूत दिशा की जरूरत है।
सरकार की नई पहलें: 7300 करोड़ की योजना और राष्ट्रीय मिशन
सरकार ने रेयर अर्थ प्रोसेसिंग यूनिट्स और सप्लाई चेन को बढ़ावा देने के लिए 7300 करोड़ रुपये की विशेष स्कीम शुरू की है।
इसके अलावा, अप्रैल 2025 में नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) की शुरुआत की गई है। इसके तहत देशभर में 1200 नए एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं।
राजस्थान के सिरोही और भीलवाड़ा जिलों में नियोडिमियम और अन्य रेयर तत्वों की खोज शुरू हो चुकी है। इस मिशन का लक्ष्य न केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाना है, बल्कि विदेशी खनन संपत्तियों का अधिग्रहण करके एक ग्लोबल सप्लाई नेटवर्क बनाना भी है।
आगे की राह: आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
भारत अब इस दिशा में ठोस कदम उठा रहा है कि वह “रेयर अर्थ इकोनॉमी” में आत्मनिर्भर बने। इसके लिए तकनीकी विकास, खनन सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को संतुलित रखना जरूरी होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत यदि निजी कंपनियों को नियंत्रित साझेदारी में अनुमति दे और प्रसंस्करण तकनीक को उन्नत करे, तो अगले 5 से 7 वर्षों में चीन पर निर्भरता काफी हद तक घटाई जा सकती है।
निष्कर्ष
भारत के पास जो रेयर अर्थ का खजाना है, वह भविष्य की तकनीक की “रीढ़” साबित हो सकता है। लेकिन इस दिशा में हमें सिर्फ खनन नहीं, बल्कि नीति-निर्माण, तकनीकी नवाचार और उद्योगिक साझेदारी में भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनना होगा।
अगर यह लक्ष्य हासिल कर लिया गया, तो भारत न केवल चीन पर निर्भरता कम करेगा, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता (global supplier) बन सकता है।
