भोपाल के जयप्रकाश अस्पताल (JP Hospital) में रात का सन्नाटा अब डर में बदल चुका है। मरीजों और उनके परिजनों के चेहरे पर इलाज से ज्यादा चिंता का कारण हैं — आवारा कुत्ते। हर शाम जैसे ही अस्पताल की लाइटें मंद पड़ती हैं, दर्जनों कुत्ते झुंड बनाकर वार्ड्स के बाहर और पार्किंग क्षेत्र में घूमने लगते हैं। यह दृश्य सिर्फ भोपाल का नहीं, बल्कि पूरा मध्यप्रदेश और देशभर में फैल चुके ‘स्ट्रे डॉग संकट’ की एक झलक है।
शुक्रवार, 7 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए सभी राज्यों को निर्देश दिया कि 8 हफ्तों के भीतर स्कूलों, अस्पतालों, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और हाईवे से सभी आवारा कुत्तों को हटाया जाए। अदालत ने इस मुद्दे को अब सिर्फ स्थानीय प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट करार दिया।

भोपाल का ग्राउंड ज़ीरो: “रात 8 बजे के बाद अस्पताल जंगल बन जाता है”
वन इंडिया हिंदी के संवाददाता एलएन मालवीय की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, जेपी अस्पताल में डॉग बाइट केस रोज़ाना सामने आ रहे हैं। एक मरीज के परिजन ने बताया,
> “रात 8 बजे के बाद पूरा अस्पताल डर का इलाका बन जाता है। कुत्ते झुंड बनाकर आते हैं, और कई बार वार्ड के अंदर तक घुस जाते हैं।”
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, हर दिन 150 से अधिक लोगों को एंटी-रेबीज़ वैक्सीन (ARV) लगाई जाती है। यानी, लगभग हर घंटे 6 मरीज डॉग बाइट के शिकार बन रहे हैं।
एक नर्स ने कहा,
> “कुत्ते सिर्फ बाहर ही नहीं, कई बार मरीजों के बेड के नीचे आ जाते हैं। सुरक्षा के लिए कोई गार्ड नहीं होता।
यह भयावह स्थिति सिर्फ एक अस्पताल की नहीं, बल्कि पूरे शहर की हकीकत है।
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आंकड़े जो चौंकाते हैं: मध्यप्रदेश में 10 लाख से अधिक आवारा कुत्ते
नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) की 2025 रिपोर्ट बताती है कि मध्यप्रदेश में कुल 10 लाख से ज्यादा स्ट्रे डॉग्स हैं, जिनमें भोपाल, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर और ग्वालियर जैसे 5 बड़े शहरों में ही लगभग 6 लाख हैं।
शहरवार स्थिति (जनवरी-जून 2025):
भोपाल: 10,769 डॉग बाइट केस (हर दिन औसतन 1,795)
इंदौर: 30,304 केस (सिर्फ छह महीनों में)
ग्वालियर: 11,902 केस
जबलपुर: 13,619 केस
उज्जैन: 10,296 केस
2022 से जनवरी 2025 तक पूरे राज्य में 3.39 लाख बाइट केस दर्ज हुए हैं। इनमें से 9 लोगों की मौत रेबीज़ संक्रमण से हुई है।
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सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश: “अब टालमटोल नहीं चलेगा”
जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजरिया की बेंच ने यह आदेश सुनाया। कोर्ट ने कहा कि लगातार बढ़ते बाइट केस नागरिकों की जान के साथ खिलवाड़ हैं।
फैसले में कहा गया:
> “राज्य सरकारें 8 हफ्तों के भीतर सार्वजनिक स्थलों से स्ट्रे डॉग्स हटाएं। स्कूलों, अस्पतालों, और सार्वजनिक परिसरों में फेंसिंग (बाड़) लगाई जाए। हर जिले में DM को नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए।”
इसके साथ कोर्ट ने ABC (Animal Birth Control) रूल्स के पालन का भी आदेश दिया — लेकिन एक बड़ी शर्त के साथ:
> “स्टेरलाइजेशन के बाद कुत्तों को उसी जगह वापस न छोड़ा जाए। उन्हें शेल्टर में रखा जाए।”
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हाईवे और सड़कों पर भी निगरानी
अदालत ने NHAI और राज्य सरकारों को आदेश दिया कि हाईवे, स्टेट हाईवे और एक्सप्रेसवे से कुत्तों और अन्य आवारा जानवरों (जैसे गाय) को हटाया जाए।
इसके लिए:
24×7 पेट्रोलिंग टीमें बनाई जाएं
हेल्पलाइन नंबर जारी किए जाएं
डॉग शेल्टर स्थापित किए जाएं
यह आदेश जुलाई 2025 की TOI रिपोर्ट “City Hounded by Strays, Kids Pay the Price” के बाद स्वतः संज्ञान के रूप में आया था।
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ज़मीनी सच्चाई: आदेश हैं, अमल नहीं
भोपाल नगर निगम ने दावा किया कि वे हर हफ्ते 1000 से ज्यादा कुत्तों का स्टेरलाइजेशन करते हैं। लेकिन 1.5 लाख कुत्तों वाले शहर में यह आँकड़ा ऊंट के मुंह में ज़ीरा है।
इंदौर की स्थिति भी कुछ अलग नहीं। यहाँ 24,000 से ज्यादा डॉग बाइट केस हैं, लेकिन केवल 10% कुत्तों का ही वैक्सीनेशन या स्टेरलाइजेशन हुआ है।
डॉक्टरों के मुताबिक,
> “रात के समय अटैक के मामले सबसे ज्यादा हैं। कई बार ड्यूटी स्टाफ को खुद अस्पताल से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।”
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जनता और सरकार के बीच ‘फर्क की दीवार’
भोपाल की जनता अब सवाल पूछ रही है — “क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हमें राहत मिलेगी?”
एक स्थानीय निवासी ने कहा,
> “कोर्ट का आदेश अच्छा है, लेकिन लागू कौन करेगा? पिछले आदेशों की तरह ये भी फाइलों में न दब जाए।”
वहीं, एनिमल राइट्स ग्रुप्स ने इसका विरोध किया। उनका कहना है,
> “कुत्तों को मारा नहीं जा सकता। उन्हें शेल्टर में रखो, लेकिन उन्हें सड़कों से हटाना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।”
मध्यप्रदेश सरकार ने बयान जारी किया कि वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का “पूर्ण पालन” करेंगे और अगले दो हफ्तों में फेंसिंग और शेल्टर विस्तार योजना पेश करेंगे।
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विशेषज्ञों की राय: समस्या का हल संतुलित दृष्टिकोण में
एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) के पूर्व सलाहकार डॉ. आर. त्रिपाठी कहते हैं,
> “समस्या दोहरी है — प्रशासनिक लापरवाही और जनजागरूकता की कमी। लोग कुत्तों को खाना डालते हैं, पर उनकी जिम्मेदारी नहीं लेते। यही शहरी संकट की जड़ है।”
वे सुझाव देते हैं कि सरकार को:
स्थायी शेल्टर ज़ोन बनाने चाहिए
हर वार्ड में पालतू पशु पंजीकरण अनिवार्य करना चाहिए
और स्कूलों में बच्चों को ‘एनिमल हाइजीन अवेयरनेस’ सिखानी चाहिए
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भोपाल की ‘रातें डरावनी’, लेकिन उम्मीद अभी बाकी
जेपी अस्पताल के बाहर अब पोस्टर लगे हैं — “कुत्तों से सावधान रहें, रात में अकेले न निकलें।”
यह दृश्य बताता है कि शहर के नागरिकों ने ‘सावधानी’ को अपनी सुरक्षा का जरिया बना लिया है, लेकिन स्थायी समाधान अब भी दूर है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश निश्चित रूप से ऐतिहासिक है। अगर राज्यों ने इसे सख्ती से लागू किया, तो यह सिर्फ भोपाल नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए रेबीज़-फ्री भविष्य की दिशा में एक निर्णायक कदम होगा।
अब देखना यह है कि 8 हफ्तों की यह उलटी गिनती कुत्तों को सड़कों से हटाने में कितनी कारगर साबित होती है — या यह आदेश भी पुराने फैसलों की तरह कागज़ पर सिमटकर रह जाएगा।
