मुख्य बातें
- एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2024 से दक्षिण-पश्चिम रूस के वोल्गोग्राड के पास चीनी सैन्यकर्मियों को रूसी सैन्य प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
- रिपोर्ट में पनडुब्बी तकनीक, समुद्री युद्ध से जुड़े डेटा और मिसाइल रक्षा प्रणाली में रूस की संभावित मदद का भी उल्लेख है।
- इन दावों को ताइवान और अमेरिका के साथ संभावित सैन्य टकराव की तैयारी से जोड़कर देखा गया है।
- उपलब्ध स्रोत में कथित लीक दस्तावेजों की पूरी जानकारी या स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

रूस और चीन के बीच सैन्य सहयोग को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा पर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रूस के वोल्गोग्राड शहर के पास स्थित एक सैन्य परिसर में चीनी सैन्यकर्मियों को रूसी सेना के अनुभव के आधार पर युद्ध प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसमें पनडुब्बी तकनीक, समुद्री युद्ध से जुड़ी जानकारी और मिसाइल रक्षा प्रणाली में सहयोग की बात भी कही गई है।
रिपोर्ट इन गतिविधियों को ताइवान को लेकर चीन की सैन्य तैयारियों और अमेरिका के साथ संभावित टकराव के संदर्भ में देखती है। हालांकि, उपलब्ध सामग्री में कथित लीक दस्तावेजों का पूरा विवरण, उन्हें प्रमाणित करने वाली संस्थाओं के नाम या संबंधित सरकारों की आधिकारिक पुष्टि नहीं दी गई है। इसलिए इन दावों को फिलहाल रिपोर्ट में किए गए खुलासे के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि प्रमाणित सैन्य समझौते के रूप में।
वोल्गोग्राड में ट्रेनिंग का दावा
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2024 से चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के कुछ सैन्यकर्मी दक्षिण-पश्चिम रूस के वोल्गोग्राड के पास एक सैन्य परिसर में प्रशिक्षण ले रहे हैं। दावा है कि इस केंद्र का इस्तेमाल रूसी सेना की 8वीं आर्मी भी करती है, जिसका यूक्रेन युद्ध में अनुभव रहा है।
बताया गया है कि प्रशिक्षण में शहरी इलाकों में लड़ाई, खाइयों और बारूदी सुरंगों से जुड़े अभियान, बंकरों पर हमले तथा सैन्य कमांड केंद्रों को निशाना बनाने जैसी परिस्थितियां शामिल हैं। यदि यह जानकारी सही साबित होती है, तो इसका अर्थ होगा कि चीन अपने सैनिकों को केवल अभ्यास आधारित प्रशिक्षण तक सीमित रखने के बजाय आधुनिक युद्धक्षेत्र में मिले रूसी अनुभव से भी परिचित कराने की कोशिश कर रहा है।
चीन की सेना ने 1979 के वियतनाम युद्ध के बाद किसी बड़े पारंपरिक युद्ध में प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं की है। यूक्रेन युद्ध ने आधुनिक संघर्ष में ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, निगरानी और लंबी दूरी के हथियारों की भूमिका को प्रमुखता से सामने रखा है। ऐसे अनुभव चीन के सैन्य योजनाकारों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
पनडुब्बी तकनीक पर सहयोग के आरोप
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रूस की पनडुब्बी तकनीक से जुड़ा है। इसमें दावा किया गया है कि रूस चीन को अकुला-क्लास परमाणु पनडुब्बियों से संबंधित ध्वनि कम करने की तकनीक और समुद्र के भीतर पनडुब्बियों की पहचान से जुड़ा अकॉस्टिक डेटा उपलब्ध करा रहा है।
पनडुब्बियों की आवाज यानी उनका ध्वनिक संकेत समुद्री युद्ध में बेहद अहम होता है। किसी पनडुब्बी की आवाज जितनी कम होगी, विरोधी नौसेना के लिए उसका पता लगाना उतना कठिन हो सकता है। इसके उलट, दूसरे देश की पनडुब्बियों के ध्वनिक संकेतों की जानकारी मिलने से उन्हें पहचानने की क्षमता बेहतर हो सकती है।
रिपोर्ट में चीन की टाइप 095 और टाइप 096 पनडुब्बी परियोजनाओं का भी उल्लेख है। हालांकि, इन पनडुब्बियों की वास्तविक परिचालन स्थिति और रूस से कथित तकनीकी हस्तांतरण के बारे में उपलब्ध सामग्री स्वतंत्र पुष्टि प्रस्तुत नहीं करती। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि रूसी तकनीक मिलने से चीन की पनडुब्बियां अमेरिकी पनडुब्बियों का आसानी से पता लगाने में सक्षम हो चुकी हैं।
ताइवान जलडमरूमध्य की चुनौती
चीन और ताइवान के बीच तनाव लंबे समय से क्षेत्रीय सुरक्षा का बड़ा मुद्दा रहा है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान में अलग निर्वाचित सरकार है। अमेरिका ताइवान को सुरक्षा संबंधी सहायता देता रहा है। इसी वजह से ताइवान जलडमरूमध्य में किसी सैन्य संकट का असर केवल दोनों पक्षों तक सीमित नहीं रह सकता।
रिपोर्ट में अमेरिकी और ताइवानी रणनीति के संदर्भ में ‘हेलस्केप’ अवधारणा का जिक्र किया गया है। इसके तहत बड़ी संख्या में हवाई, समुद्री और पानी के भीतर चलने वाले मानवरहित उपकरणों के जरिए किसी संभावित चीनी सैन्य अभियान को कठिन बनाने की रणनीति बताई जाती है।
यूक्रेन युद्ध में समुद्री ड्रोन और मानवरहित प्रणालियों ने युद्धपोतों तथा सैन्य ठिकानों के लिए नई चुनौतियां पैदा की हैं। चीन के लिए भी यह महत्वपूर्ण सबक हो सकता है कि भविष्य के समुद्री संघर्ष में केवल बड़े युद्धपोत और पारंपरिक हथियार पर्याप्त नहीं होंगे। हालांकि, रिपोर्ट में बताए गए चीनी नौसैनिक अभ्यासों और उनकी क्षमताओं के बारे में अतिरिक्त आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है।
अंतरिक्ष और मिसाइल रक्षा का पहलू
रिपोर्ट में रूस और चीन के बीच अंतरिक्ष आधारित संचार प्रणालियों तथा मिसाइल रक्षा को लेकर संभावित सहयोग का भी दावा किया गया है। इसमें एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स के स्टारलिंक नेटवर्क को बाधित करने की कथित योजना और हाइपरसोनिक मिसाइलों से बचाव के लिए नई रक्षा प्रणाली विकसित करने की बात शामिल है।
आधुनिक युद्ध में उपग्रह संचार, निगरानी और नेविगेशन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। यूक्रेन युद्ध ने यह भी दिखाया है कि उपग्रह आधारित इंटरनेट और संचार व्यवस्था सैन्य तथा नागरिक अभियानों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए अंतरिक्ष में मौजूद प्रणालियों की सुरक्षा अब प्रमुख रक्षा चिंताओं में शामिल है।
लेकिन किसी नेटवर्क को बाधित करने की तकनीकी क्षमता, उस पर हमला करने की योजना और ऐसी योजना पर अमल—ये तीन अलग-अलग बातें हैं। उपलब्ध रिपोर्ट सामग्री इन दावों की तकनीकी पुष्टि या किसी संयुक्त कार्रवाई की आधिकारिक घोषणा नहीं करती।
अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए संकेत
रूस और चीन के बीच रक्षा सहयोग का विस्तार पश्चिमी देशों के लिए रणनीतिक चिंता का विषय हो सकता है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगे प्रतिबंधों और पश्चिमी देशों के साथ उसके तनाव ने मॉस्को की बीजिंग पर आर्थिक तथा कूटनीतिक निर्भरता को बढ़ाया है। दूसरी ओर, चीन अपनी सैन्य क्षमताओं और क्षेत्रीय प्रभाव को मजबूत करने में लगातार निवेश कर रहा है।
दोनों देशों के हित कई मुद्दों पर एक-दूसरे से मेल खाते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे हर सैन्य या राजनीतिक परिस्थिति में एक साथ युद्ध में उतरेंगे। रूस का चीन को तकनीकी सहायता देना और ताइवान के किसी संघर्ष में सीधे सैन्य भागीदारी करना अलग-अलग स्तर के निर्णय होंगे।
दावों की पुष्टि अभी बाकी
वोल्गोग्राड में चीनी सैनिकों की ट्रेनिंग, अकुला-क्लास पनडुब्बियों से जुड़ी तकनीक के हस्तांतरण और स्टारलिंक नेटवर्क को निशाना बनाने की कथित योजना जैसे दावे गंभीर हैं। लेकिन उपलब्ध सामग्री में मूल दस्तावेजों, संबंधित खुफिया एजेंसियों की पहचान और रूस या चीन की आधिकारिक प्रतिक्रिया का पर्याप्त विवरण नहीं है।
इसलिए फिलहाल इस रिपोर्ट को चीन-रूस रक्षा संबंधों पर उठे गंभीर सवालों के रूप में देखना अधिक उचित होगा। यह कहना जल्दबाजी होगी कि दोनों देशों ने अगले विश्व युद्ध की कोई संयुक्त योजना तैयार कर ली है। ताइवान को लेकर वास्तविक स्थिति समझने के लिए सैन्य गतिविधियों के साथ-साथ आधिकारिक घोषणाओं और स्वतंत्र रूप से सत्यापित दस्तावेजों पर नजर रखना जरूरी होगा।
FAQ’s
1. वोल्गोग्राड में चीनी सैनिकों की ट्रेनिंग को लेकर क्या दावा किया गया है?
रिपोर्ट के अनुसार, 2024 से दक्षिण-पश्चिम रूस के वोल्गोग्राड के पास एक सैन्य परिसर में चीनी सैन्यकर्मियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसमें शहरी युद्ध, खाइयों, बारूदी सुरंगों और सैन्य ठिकानों पर हमले जैसी परिस्थितियों का अभ्यास शामिल बताया गया है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध सामग्री में नहीं है।
2. अकुला-क्लास पनडुब्बी तकनीक चीन के लिए क्यों महत्वपूर्ण हो सकती है?
अकुला-क्लास रूस की परमाणु हमला करने वाली पनडुब्बियों की श्रेणी है। पनडुब्बी की आवाज कम करने वाली तकनीक उसे दुश्मन के सोनार से बचने में मदद कर सकती है। वहीं, दूसरी पनडुब्बियों के ध्वनिक संकेतों की जानकारी समुद्र के भीतर उनकी पहचान में उपयोगी हो सकती है। चीन को ऐसी तकनीक मिलने का दावा अभी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं है।
3. ताइवान के लिए चीन की सैन्य तैयारी क्यों महत्वपूर्ण है?
चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और बल प्रयोग की संभावना से इनकार नहीं करता। ताइवान की सुरक्षा में अमेरिका की भूमिका भी अहम है। इसलिए ताइवान जलडमरूमध्य में किसी बड़े सैन्य टकराव का असर क्षेत्रीय व्यापार, समुद्री परिवहन और वैश्विक सुरक्षा पर पड़ सकता है।
4. ‘हेलस्केप’ रणनीति का सामान्य अर्थ क्या है?
इस अवधारणा का संबंध संभावित चीनी सैन्य अभियान को रोकने या उसकी गति कम करने के लिए बड़ी संख्या में मानवरहित हवाई, समुद्री और पानी के भीतर चलने वाले उपकरणों के इस्तेमाल से है। इसका उद्देश्य विरोधी सेना के लिए समुद्री क्षेत्र में आगे बढ़ना कठिन बनाना है। इसे किसी युद्ध में इस्तेमाल हो चुकी रणनीति नहीं समझना चाहिए।
5. क्या रूस और चीन ने स्टारलिंक को नष्ट करने की योजना बनाई है?
दी गई रिपोर्ट में ऐसा करने की कथित संयुक्त योजना का दावा है। लेकिन उपलब्ध सामग्री में किसी प्रमाणित समझौते, आधिकारिक घोषणा या कार्रवाई का ठोस विवरण नहीं है। उपग्रह संचार को बाधित करने की तकनीकी क्षमता और किसी विशेष नेटवर्क पर हमला करने का वास्तविक निर्णय अलग-अलग विषय हैं।
6. क्या चीन और रूस का सैन्य सहयोग तीसरे विश्व युद्ध की तैयारी है?
सिर्फ सैन्य प्रशिक्षण या तकनीकी सहयोग के आधार पर तीसरे विश्व युद्ध की तैयारी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों का विस्तार रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन किसी वैश्विक युद्ध की संयुक्त योजना का दावा करने के लिए अधिक ठोस और स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रमाण जरूरी होंगे।






