मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि पहले से मतदाता रहे लोगों के नाम ड्राफ्ट सूची से छूटने पर उनसे नए मतदाताओं वाला फॉर्म 6 क्यों भरवाया जा रहा है।
- अदालत ने पुराने एन्यूमरेशन फॉर्म को देर से जमा करने या जरूरत के मुताबिक फॉर्म 8 देने का विकल्प सुझाया।
- याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण ने करीब 43 लाख लोगों के ड्राफ्ट सूची से बाहर होने का दावा किया।
- चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि किसी योग्य मतदाता को स्थायी रूप से बाहर नहीं किया जा रहा और जरूरत पड़ने पर समय-सीमा बढ़ाई जा सकती है।

दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान पहले से पंजीकृत मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से छूटने और उन्हें दोबारा शामिल कराने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं। अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि जिन लोगों के नाम पहले की मतदाता सूची में दर्ज थे, उनसे नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाला फॉर्म 6 क्यों भरवाया जा रहा है। कोर्ट के अनुसार, ऐसे लोगों को देर से ही सही, अपना एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करने का अवसर देने पर विचार किया जा सकता है।
28 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। याचिका में एसआईआर के दौरान मतदाताओं को जारी किए गए नोटिस और प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
फॉर्म 6 पर अदालत की आपत्ति
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने फॉर्म 6 और फॉर्म 8 के अलग-अलग इस्तेमाल का उल्लेख किया। फॉर्म 6 सामान्य तौर पर पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए होता है, जबकि फॉर्म 8 का उपयोग पहले से पंजीकृत मतदाता के निवास स्थान में बदलाव या मतदाता सूची से जुड़ी कुछ जानकारियों में सुधार के लिए किया जाता है।
अदालत ने उदाहरण के जरिए समझाया कि यदि कोई व्यक्ति पहले दिल्ली के वसंत कुंज क्षेत्र में मतदाता था और बाद में सरिता विहार चला गया, तो उसके पास पुराने मतदान केंद्र और मतदाता पहचान से जुड़ी जानकारी हो सकती है। ऐसे व्यक्ति से नए मतदाता की तरह फॉर्म 6 भरवाने की जरूरत क्यों होनी चाहिए? न्यायमूर्ति बागची ने भी पहले से मतदाता रहे व्यक्ति के मामले में फॉर्म 6 के इस्तेमाल को उचित प्रक्रिया न मानने की आशंका जताई।
वोट देने का अधिकार बना सुनवाई का केंद्र
पीठ ने यह सवाल भी उठाया कि यदि कोई व्यक्ति किसी वजह से निर्धारित समय पर एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं कर पाया, तो क्या उसे हमेशा के लिए मतदान के अधिकार से वंचित माना जा सकता है। अदालत की चिंता उन लोगों को लेकर थी जो पहले मतदाता सूची में शामिल थे, लेकिन किसी कारण से एसआईआर के दौरान उनसे संपर्क नहीं हो पाया या उनका फॉर्म अधिकारियों तक नहीं पहुंच सका।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि जवाब नहीं दे पाने के पीछे कई परिस्थितियां हो सकती हैं। कोई व्यक्ति अस्थायी रूप से दूसरे शहर चला गया हो, काम के सिलसिले में दिल्ली से बाहर हो या उसका फॉर्म पुराने पते पर पहुंचा हो। केवल अनुपस्थित या दूसरी जगह स्थानांतरित होने की श्रेणियों से हर स्थिति का समाधान नहीं निकलता।
छूटे मतदाताओं के लिए अलग श्रेणी का सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों के लिए एक अतिरिक्त या अवशिष्ट श्रेणी बनाने का सुझाव दिया, जिसमें उन लोगों को रखा जा सके जो किसी अन्य कारण से एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं कर पाए। इस व्यवस्था में संबंधित व्यक्ति को अपनी अनुपस्थिति या फॉर्म जमा न कर पाने का कारण बताने और जरूरी दस्तावेज देने का अवसर मिल सकता है।
अदालत के सुझाव के मुताबिक, चुनाव अधिकारी प्रस्तुत जवाब और दस्तावेजों की जांच कर सकते हैं। यदि अधिकारी संतुष्ट होते हैं तो मतदाता का नाम सूची में शामिल किया जा सकता है। आवेदन अस्वीकार करने की स्थिति में कारण बताना जरूरी होगा, ताकि संबंधित व्यक्ति उस निर्णय को चुनौती दे सके। यह सुनवाई के दौरान सामने आया सुझाव है; इसे अंतिम न्यायिक आदेश या लागू हो चुकी व्यवस्था नहीं समझना चाहिए।
43 लाख नामों का दावा
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने अदालत में दावा किया कि करीब 43 लाख लोगों के नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल नहीं हैं। उनके मुताबिक, इनमें ऐसे लोग भी हैं जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बताया गया और जो समय पर एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं कर सके।
भूषण ने दलील दी कि कुछ लोगों को फॉर्म मिलने की जानकारी नहीं थी और कई फॉर्म पुराने पते पर भेजे गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि पहले से मतदाता रहे लोगों को फॉर्म 6 भरने के लिए कहना उन्हें ऐसी घोषणा करने की स्थिति में डाल सकता है, मानो वे पहली बार मतदाता बनने के लिए आवेदन कर रहे हों। 43 लाख का आंकड़ा याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में रखा गया दावा है, इसे अदालत द्वारा स्वतंत्र रूप से प्रमाणित संख्या नहीं माना जाना चाहिए।
चुनाव आयोग ने क्या जवाब दिया
चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील दामा शेषाद्रि नायडू ने कहा कि एसआईआर एक विकसित होती प्रक्रिया है और उठाई गई समस्याओं को दूर करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने अदालत को भरोसा दिलाया कि किसी मतदाता को स्थायी रूप से बाहर नहीं किया जा रहा है। अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद भी पात्र व्यक्ति निर्धारित प्रक्रिया के तहत नाम शामिल कराने का अनुरोध कर सकता है।
फॉर्म 6 के इस्तेमाल पर आयोग की ओर से यह दलील दी गई कि एसआईआर के तहत तैयार की जा रही सूची में किसी व्यक्ति को पहली बार शामिल करने के संदर्भ में इस फॉर्म का उपयोग किया जा रहा है। हालांकि, पीठ ने सवाल किया कि जब अंतिम सूची अभी तैयार नहीं हुई है, तो पहले से पंजीकृत मतदाताओं को देर से एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करने का अवसर क्यों नहीं दिया जा सकता।
आयोग को सरल जानकारी देने की सलाह
अदालत ने चुनाव आयोग से कहा कि एसआईआर की प्रक्रिया आम लोगों को आसान भाषा में समझाई जाए। जिन मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं, उनकी जानकारी का व्यापक प्रचार किया जाना चाहिए, ताकि वे समय रहते अपनी स्थिति जांच सकें और जरूरी कदम उठा सकें।
पीठ ने यह भी कहा कि लोगों को बताया जाना चाहिए कि उनका नाम पिछली सूची में होने के बावजूद इस बार क्यों छूट सकता है, एन्यूमरेशन फॉर्म जमा न करने का क्या असर होगा और वे मौजूदा स्थान के नजदीकी चुनाव अधिकारी के पास जाकर अपनी बात कैसे रख सकते हैं।
30 अक्टूबर की समय-सीमा पर सवाल
सुनवाई में प्रशांत भूषण ने बताया कि ड्राफ्ट सूची से बाहर किए गए लोगों के लिए फॉर्म 6 जमा करने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर थी। उन्होंने चिंता जताई कि अगली सुनवाई तक यह समय-सीमा समाप्त हो जाएगी। इस पर चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि जरूरत पड़ने पर समय-सीमा बढ़ाई जा सकती है और आयोग यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा कि पात्र मतदाता प्रक्रिया से बाहर न रह जाएं।
उपलब्ध समाचार विवरण में 30 अक्टूबर की समय-सीमा का उल्लेख है, लेकिन उसके बाद इसे औपचारिक रूप से बढ़ाए जाने की पुष्टि नहीं दी गई है। इसलिए मतदाताओं के लिए जरूरी है कि वे अपने क्षेत्र के निर्वाचन अधिकारी या आधिकारिक चुनाव आयोग सूचना से वर्तमान समय-सीमा और आवेदन की प्रक्रिया की जानकारी लें।
यह सुनवाई मतदाता सूची के पुनरीक्षण में एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक सवाल सामने लाती है—पहले से पंजीकृत मतदाता और पहली बार नाम जुड़वाने वाले व्यक्ति की स्थिति को एक जैसा मानकर प्रक्रिया चलाना कितना उचित है। सुप्रीम कोर्ट ने इस अंतर पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा है, लेकिन सुनवाई में उठाए गए सवालों और सुझावों को अंतिम फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
संपादकीय तथ्य-जांच नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध कराए गए समाचार विवरण पर आधारित है। सुनवाई का मूल आदेश, चुनाव आयोग की बाद की अधिसूचना और 30 अक्टूबर के बाद समय-सीमा की स्थिति स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हो सकी है। 43 लाख का आंकड़ा याचिकाकर्ता के वकील की दलील के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है।
FAQ’s
1. एसआईआर में एन्यूमरेशन फॉर्म किसके लिए होता है?
एन्यूमरेशन फॉर्म का इस्तेमाल विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मौजूदा मतदाताओं की जानकारी जुटाने और उसकी पुष्टि करने के लिए किया जाता है। इसके जरिए निर्वाचन अधिकारी मतदाता की पहचान और सूची में दर्ज विवरण का मिलान कर सकते हैं। यह नए मतदाता के पंजीकरण वाले आवेदन से अलग प्रक्रिया है।
2. फॉर्म 6 और फॉर्म 8 में क्या अंतर है?
फॉर्म 6 का उपयोग मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के आवेदन के लिए किया जाता है। फॉर्म 8 पहले से पंजीकृत मतदाता के निवास स्थान में बदलाव, विवरण में सुधार और कुछ अन्य संशोधनों के लिए है। इसलिए दोनों फॉर्म का उद्देश्य अलग है और सही आवेदन व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है।
3. क्या एसआईआर में नाम छूटने का मतलब वोट देने का अधिकार खत्म होना है?
सिर्फ ड्राफ्ट मतदाता सूची में नाम नहीं दिखने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि व्यक्ति का मतदान का अधिकार हमेशा के लिए खत्म हो गया है। संबंधित व्यक्ति को निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावा या आवेदन करने का अवसर मिल सकता है। सही प्रक्रिया और समय-सीमा की जानकारी निर्वाचन अधिकारी से लेना जरूरी है।
4. सुप्रीम कोर्ट ने छूटे मतदाताओं के लिए क्या सुझाव दिया?
पीठ ने ऐसी अलग श्रेणी बनाने का सुझाव दिया जिसमें उन लोगों के मामले देखे जा सकें जो किसी कारण से एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं कर पाए। व्यक्ति को अनुपस्थिति का कारण और जरूरी दस्तावेज देने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, यह सुनवाई के दौरान दिया गया सुझाव था, अंतिम आदेश नहीं।
5. क्या 43 लाख मतदाताओं के नाम वास्तव में हटाए गए हैं?
सुनवाई में प्रशांत भूषण ने करीब 43 लाख लोगों के ड्राफ्ट सूची से बाहर होने की बात कही थी। यह याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश किया गया आंकड़ा है। उपलब्ध विवरण से इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। इसे चुनाव आयोग या अदालत द्वारा प्रमाणित अंतिम संख्या के रूप में प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए।
6. 30 अक्टूबर के बाद मतदाता क्या कर सकते हैं?
सुनवाई में 30 अक्टूबर को फॉर्म 6 जमा करने की समय-सीमा बताया गया था और आयोग के वकील ने जरूरत पड़ने पर इसे बढ़ाने की बात कही थी। बाद में समय-सीमा बढ़ी या नहीं, इसकी पुष्टि उपलब्ध विवरण में नहीं है। संबंधित व्यक्ति को अपने क्षेत्र के निर्वाचन अधिकारी या आधिकारिक चुनाव आयोग सूचना से ताजा स्थिति जांचनी चाहिए।







