भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन ग्लोबल परिप्रेक्ष्य में भारतीय कंपनियों की स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। टाटा मोटर्स, जो भारत की सबसे बड़ी ईवी कंपनी है, घरेलू बाजार में 62 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ मार्केट लीडर है। इसके बावजूद, दुनिया की टॉप 10 ईवी कंपनियों की सूची में भारत का नाम नहीं है। इस सूची में चीन की पांच कंपनियां, जर्मनी की दो कंपनियां, दक्षिण कोरिया की दो कंपनियां और नीदरलैंड की एक कंपनी शामिल हैं, जबकि भारत की कोई भी कंपनी शामिल नहीं है।

चीन की इलेक्ट्रिक वाहनों की सफलता का सबसे बड़ा कारण उसकी पूरी सप्लाई चेन पर कब्जा है। लीथियम आयन बैटरी से लेकर गाड़ियों के कलपुर्जों तक, चीन ने हर जगह अपना प्रभुत्व स्थापित किया है। इस कारण, चीनी कंपनियों के लिए इलेक्ट्रिक वाहन बनाना अधिक किफायती और तेज़ साबित हो रहा है। इस बाजार में बीवाईडी (BYD) पहले नंबर पर है। एसएनई रिसर्च के अनुसार, ग्लोबल ईवी मार्केट में बीवाईडी की हिस्सेदारी 19.9 प्रतिशत है, जो इसे किसी भी प्रतियोगी से आगे रखती है।
दूसरे नंबर पर भी चीन की कंपनी गिली है, जिसकी ग्लोबल हिस्सेदारी 10.2 प्रतिशत है। तीसरे स्थान पर एलन मस्क की टेस्ला कंपनी है, जिसकी मार्केट हिस्सेदारी 7.7 प्रतिशत है। चौथे नंबर पर जर्मन कंपनी फॉक्सवैगन है, जबकि पांचवें नंबर पर चीन की SAIC कंपनी है। इसी तरह सूची में अन्य कंपनियां शामिल हैं—Changan (चीन), हुंडई और किया (दक्षिण कोरिया), चेरी (चीन), बीएमडब्ल्यू (जर्मनी), और नीदरलैंड की Stallantis।
भारत में टाटा मोटर्स के पास EV पैसेंजर वाहन सेगमेंट में स्पष्ट नेतृत्व है। महिंद्रा एंड महिंद्रा ने भी विभिन्न इलेक्ट्रिक वाहनों का उत्पादन किया है, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा में इन कंपनियों को अभी भी लंबा रास्ता तय करना है। बीवाईडी ने पिछले साल 1,764,992 इलेक्ट्रिक गाड़ियां बेचीं, जबकि टाटा मोटर्स ने केवल 68,980 गाड़ियां बेचीं। यह संख्या वैश्विक बाजार में भारतीय कंपनियों की कमजोर स्थिति को स्पष्ट रूप से दिखाती है।
दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग तेजी से बढ़ रही है। यूरोप, अमेरिका, चीन और दक्षिण कोरिया में सरकारें इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं लागू कर रही हैं। इन योजनाओं में टैक्स में छूट, सब्सिडी, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश और स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना शामिल है। चीन ने इस अवसर का पूरा फायदा उठाया है, और उसकी कंपनियां न केवल घरेलू बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपना दबदबा बनाए हुए हैं।
भारत में, इलेक्ट्रिक वाहन बाजार अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है। टाटा मोटर्स की बिक्री में हालिया गिरावट और बाजार हिस्सेदारी का कम होना यह संकेत देता है कि घरेलू मांग में भी बदलाव आ रहे हैं। हालांकि, भारत सरकार ने भारत में EV उत्पादन बढ़ाने के लिए कई उपाय किए हैं, जैसे FAME योजना (Faster Adoption and Manufacture of Hybrid and Electric Vehicles)। लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने के लिए भारतीय कंपनियों को तकनीक, उत्पादन क्षमता, निवेश और अंतरराष्ट्रीय विपणन में सुधार करना होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन ने इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग में जो प्रभुत्व हासिल किया है, उसके पीछे केवल उत्पादन क्षमता ही नहीं, बल्कि अनुसंधान और विकास (R&D) में भारी निवेश भी है। चीनी कंपनियों ने बैटरी तकनीक, चार्जिंग समय, और वाहन रेंज में नवाचार किए हैं। वहीं भारतीय कंपनियां अभी इस क्षेत्र में शुरुआती कदम उठा रही हैं। भारत की कंपनियों के पास घरेलू बाजार की समझ जरूर है, लेकिन वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय मानकों और तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता है।
इस संदर्भ में यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में EV उद्योग का भविष्य उज्जवल है, लेकिन वैश्विक टॉप कंपनियों की सूची में शामिल होने के लिए लंबा और कठिन रास्ता तय करना होगा। तकनीकी निवेश, बेहतर बैटरी प्रौद्योगिकी, अंतरराष्ट्रीय विपणन रणनीति और उत्पादन क्षमता के सुधार के साथ ही भारत की कंपनियां दुनिया के EV मानचित्र पर अपनी पहचान बना सकती हैं।
दुनिया के इस प्रतिस्पर्धी और तेजी से बढ़ते बाजार में भारत को अपनी रणनीति को और अधिक स्पष्ट और सटीक बनाना होगा। घरेलू कंपनियों को R&D, अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और नवाचार में निवेश करके वैश्विक EV बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी। यह केवल आर्थिक लाभ का मामला नहीं है, बल्कि तकनीकी और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
इस प्रकार, टाटा मोटर्स और अन्य भारतीय ईवी कंपनियों के लिए यह चुनौती है कि वे न केवल घरेलू बाजार में अपने नेतृत्व को बनाए रखें, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी प्रतिस्पर्धा कर सकें। चीन की कंपनियों की सफलता से सीख लेकर, भारत की कंपनियां यदि अपनी उत्पादन क्षमता, बैटरी तकनीक, और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को मजबूत करती हैं, तो भविष्य में यह संभव है कि भारत की कंपनियां भी दुनिया की टॉप 10 EV कंपनियों में शामिल हो सकें।
