मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में इन दिनों एक ऐसा मुद्दा तेजी से तूल पकड़ रहा है, जो सामान्यत: ग्रामीण और पशुपालन विभाग की कार्यप्रणाली से जुड़ा हुआ दिखाई देता है, लेकिन इसके पीछे की परतें कहीं अधिक गहरी हैं। मामला सिर्फ इतना नहीं है कि एक अधिकारी पर किसी कर्मचारी से प्रतिदिन 20 कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination – AI) करने के लिए दबाव बनाने का आरोप है; बल्कि यह उस व्यापक ढाँचे को समझने का प्रयास भी है जिसमें ग्रामीण पशु–सेवा, सरकारी योजनाएँ, लक्ष्य आधारित कार्यप्रणाली और फील्ड स्तर पर मौजूद वास्तविक परिस्थितियाँ टकराती हैं।

इस विवाद का प्रारंभ तब हुआ जब सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी संघ ने अपने स्तर पर इस मुद्दे को गंभीर मानते हुए मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन बैतूल के संयुक्त कलेक्टर को सौंपा। ज्ञापन में साफ कहा गया कि विभागीय अधिकारियों द्वारा प्रतिदिन 20 कृत्रिम गर्भाधान का अनिवार्य लक्ष्य थोपना न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि फील्ड स्तर पर शोषण जैसा व्यवहार उत्पन्न कर रहा है।
समस्या की जड़: लक्ष्य आधारित कार्य-संस्कृति और जमीनी हकीकत का टकराव
1. ग्रामीण पशुपालन की असल वास्तविकता
ग्रामीण भारत में अभी भी पशुपालन की संरचना बेहद विकेन्द्रित और परिश्रमी है। गाँवों में पशुओं की गणना, उनकी नस्ल, दुग्ध क्षमता, स्वास्थ्य स्थिति और किसानों की आर्थिक प्राथमिकताएँ—सब अलग-अलग हैं। ऐसे में किसी भी सरकारी फील्ड कर्मचारी का दिन पूरी तरह फील्ड आधारित होता है, जहाँ––
- कई बार एक घर से दूसरे घर तक पहुँचने में कई किलोमीटर का सफर शामिल होता है।
- खेतों में मौजूद मवेशियों तक पहुँचना समय और श्रम दोनों लेता है।
- कई गांवों में अभी भी सड़कें और परिवहन सुविधाएँ सीमित हैं।
इस पृष्ठभूमि में प्रतिदिन 20 कृत्रिम गर्भाधान का लक्ष्य व्यावहारिकता से कहीं अलग दिखाई देता है।
2. AI प्रक्रिया सरल नहीं, वैज्ञानिक और समय लेने वाली है
कई लोगों को लगता है कि Artificial Insemination एक त्वरित प्रक्रिया है, लेकिन फील्ड कार्यकर्ताओं के अनुसार—
- गाय या भैंस के हीट में आने का समय निश्चित नहीं होता।
- किसान अक्सर अनजान होते हैं कि पशु किस समय उपयुक्त अवस्था में होता है।
- कई बार एक दिन में 3–4 किलोमीटर तक पैदल चलकर फील्ड वर्क करना पड़ता है।
- प्रक्रिया में स्वच्छता, उपकरण और कौशल महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें जल्दबाजी में नहीं किया जा सकता।
इस सबके बीच 20 AI का लक्ष्य न सिर्फ चुनौतीपूर्ण, बल्कि कई मामलों में अव्यवहारिक साबित होता है।
कर्मचारियों की आपत्ति: दबाव, शोषण और मानसिक तनाव का आरोप
ज्ञापन में क्या कहा गया?
संघ के अध्यक्ष मन्नूलाल चिल्हाटे ने आरोप लगाया कि अधिकारी लगातार कर्मचारियों पर दबाव बना रहे हैं।
उनका कहना है कि––
- प्रतिदिन 20 AI करना भौगोलिक और व्यावहारिक रूप से असंभव है।
- ऐसा लक्ष्य थोपने का मतलब है कि फील्ड में मौजूद कर्मचारियों को मानसिक दबाव, धमकी और अनुचित दबाव का सामना करना पड़े।
- कई कर्मचारियों के पास सीमित संसाधन हैं, जिनमें से कई अपने खर्च पर फील्ड में काम करते हैं।
कार्यकर्ताओं की आवाज़: “हम लक्ष्य पूरा करने नहीं, सेवा देने आए हैं”
कई फील्ड कर्मचारियों का कहना है कि––
- सेवा की गुणवत्ता बढ़ाने के बजाय सिर्फ संख्या बढ़ाने की मांग की जा रही है।
- पशुपालकों का विश्वास बना रहे, यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है।
- दबाव की स्थिति में कर्मचारी जल्दबाजी में काम करेंगे, जिसका सीधा असर मवेशियों के स्वास्थ्य पर पड़ेगा।
विवाद की दूसरी परत: क्या अधिकारी सिर्फ आदेश का पालन कर रहे थे?
इस मुद्दे को समझने के लिए यह नजरिया भी महत्वपूर्ण है कि प्रशासनिक अधिकारी स्वयं कई बार राज्य स्तर से आए निर्देशों का पालन करने को मजबूर होते हैं।
संभावित कारण:
- दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की राज्य नीति।
- पशु नस्ल सुधार कार्यक्रमों का लक्ष्य।
- सरकारी रिपोर्टिंग में लक्ष्यों का उपयोग।
ऐसी परिस्थितियों में अधिकारी भी दबाव में होते हैं, और फिर वही दबाव नीचे फील्ड कर्मचारियों पर आ जाता है। यह स्थिति भारतीय प्रशासनिक ढांचे में बहुत आम है—जहाँ शीर्ष से आने वाला लक्ष्य, आदेश या KPI भले ही किसी उद्देश्य से बनाए जाते हों, लेकिन फील्ड स्तर पर वे अव्यवहारिक और बोझिल साबित होते हैं।
यह विवाद सिर्फ बैतूल तक सीमित नहीं—पूरे देश में यह एक पैटर्न है
भारत के कई राज्यों में—
- स्वास्थ्य विभाग,
- शिक्षा विभाग,
- कृषि और पशुपालन विभाग—
सभी में एक समान शिकायतें बार-बार सामने आती रही हैं—
कि लक्ष्य आधारित काम ने फील्ड कर्मचारियों पर अत्यधिक दबाव डाल दिया है।
इस विवाद ने उसी बड़ी समस्या का स्थानीय रूप में प्रतिरूप पेश किया है।
पशुपालन विभाग की योजनाएँ और वास्तविक परिणामों के बीच खाई
क्यों AI को इतना महत्व दिया जा रहा है?
केंद्र और राज्य सरकारें लंबे समय से––
- दुग्ध उत्पादन बढ़ाने,
- पशु नस्ल सुधार,
- पशु स्वास्थ्य सुधार
जैसी योजनाओं पर कार्य कर रही हैं।
लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि—
सफलता केवल लक्ष्य आधारित योजनाओं से नहीं मिलेगी; इसके लिए––
- बेहतर प्रशिक्षण,
- संसाधन,
- किसान जागरूकता,
- और फील्ड कर्मचारियों के लिए सशक्त वातावरण
जरूरी है।
जमीनी समाधान क्या हो सकते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार इस विवाद का समाधान तीन स्तरों पर संभव है:
1. लक्ष्य यथार्थवादी हों
20 AI प्रतिदिन की जगह 4–6 AI प्रतिदिन का लक्ष्य अधिक व्यावहारिक है।
2. फील्ड कर्मचारियों को संसाधन दिए जाएँ
- मोटरसाइकिल भत्ता
- किट सामग्री
- उपकरणों का समय पर वितरण
इनसे कार्य क्षमता बढ़ती है।
3. विभागीय संवाद की संस्कृति विकसित हो
फील्ड कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच नियमित संवाद ही तनाव कम करेगा।
निष्कर्ष: एक स्थानीय विवाद जिसने बड़े सिस्टम की कमज़ोरियाँ उजागर कीं
यह विवाद प्रशासन, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन के बीच संतुलन की कमी को उजागर करता है।
यदि सरकार इस विवाद को एक अवसर की तरह ले और फील्ड कर्मचारियों की वास्तविक परिस्थितियों पर ध्यान दे, तो पशुपालन क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों में सकारात्मक परिवर्तन हो सकते हैं।
