छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के भीषण जंगलों में पिछले दो दशकों से दहशत का पर्याय बन चुके माडवी हिडमा का अंत अब वास्तविकता बन चुका है। वह व्यक्ति, जिसे भारत का सबसे घातक नक्सली कमांडर कहा जाता था, मंगलवार सुबह सुरक्षा बलों के साथ भीषण गोलीबारी में मारा गया। परंतु उसकी मौत की कहानी केवल जंगलों में हुई मुठभेड़ की कहानी नहीं है—यह एक लंबे psychological downfall, सामाजिक विचलन, और अपनी मां की अनसुनी पुकार से जुड़े भावनात्मक अध्याय का भी अंत है।

हिडमा की मौत की पटकथा तब से लिखी जा चुकी थी, जब उसकी मां मडवी पुंजी ने एक भावुक अपील करते हुए खामोश होते कैमरे के सामने कहा—
“बेटा, सरेंडर कर दो। घर लौट आओ। हथियार छोड़ दो।”
लेकिन हिडमा ने यह पुकार नहीं सुनी। और शायद यह वही निर्णायक क्षण था जिसने उसकी किस्मत तय कर दी।
हिडमा कौन था? आतंक का वह नाम जिसने कई जिलों को दहला दिया
माडवी हिडमा सिर्फ एक नक्सली नहीं था। वह माओवादी संगठन का सबसे खतरनाक ऑपरेशनल कमांडर था। उसकी उम्र लगभग 43 साल बताई जाती है, लेकिन उसकी अपराधों की फेहरिस्त एक दशक से भी ज्यादा लंबी थी।

उसके नाम पर प्रमुख हमले—
- 2010: दंतेवाड़ा में CRPF के 76 जवानों की हत्या
- 2013: झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं सहित 27 लोगों की हत्या
- 2021: सुकमा में 22 जवानों की शहादत
- कुल मिलाकर 26 बड़े हमलों का मास्टरमाइंड
हिडमा PLGA battalion-1 का शीर्ष कमांडर था, जिसे माओवादियों की सबसे घातक हमलावर बटालियन माना जाता है। उसके सर पर 50 लाख रुपए का इनाम था और वह भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी में एकमात्र आदिवासी सदस्य था।
मां की भावुक अपील: “बेटा, घर लौट आओ…”
कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था। यह वीडियो छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम विजय शर्मा की मौजूदगी में रिकॉर्ड हुआ था। इस वीडियो में हिडमा की मां रोते हुए कहती दिखती हैं—
“बेटा, ये रास्ता छोड़ दो। घर लौट आओ। मैं तुम्हें माफ कर दूंगी। सरकार भी माफ कर देगी।”
उनकी आवाज में एक मां की कंपकंपाती उम्मीद थी। यह वीडियो उस दिन रिकॉर्ड हुआ था जब डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने हिडमा की मां के घर जाकर उनसे मुलाकात की। उन्होंने वहीं बैठकर उनके साथ खाना भी खाया। उसी समय यह उम्मीद बनी कि शायद देश का सबसे खतरनाक नक्सली हथियार डाल दे।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
क्यों नहीं मान सका हिडमा अपनी मां की बात? सरेंडर से डरता था
खुफिया सूत्रों के अनुसार, हिडमा सरेंडर करना चाहता था, परंतु उसे अपने साथी नक्सलियों की ओर से “गद्दार” कहे जाने का डर था। संगठन के भीतर पहले भी कई बड़े नक्सली नेताओं को संगठन ने गद्दार कहकर मार डाला था। यही डर उसके रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट था।
एक सरेंडर किए नक्सली ने भी बताया—
“अगर हिडमा सरेंडर करता, उसे भूपति, रूपेश और चंदना की तरह गद्दार घोषित कर दिया जाता। वह इसी भय में जी रहा था।”
यही डर उसे जंगल से बाहर नहीं आने दे रहा था।
मुठभेड़ की कहानी: तीन राज्यों की सीमाओं पर घमासान
मुठभेड़ आंध्र प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ की त्रि-जंक्शन सीमा पर मंगलवार सुबह हुई। यह स्थान अल्लूरी सीतारामाराजू जिले का बेहद घना वन क्षेत्र है। यही वह स्थान था जहां हिडमा अपनी पत्नी और कुछ साथियों के साथ मौजूद था।
ऑपरेशन का विवरण:
- सुरक्षा बलों को इनपुट मिला कि हिडमा उसी क्षेत्र में छिपा है।
- ऑपरेशन में CRPF, जिला पुलिस, ग्रेहाउंड्स और SOG संयुक्त रूप से शामिल हुए।
- लगभग सुबह 6:20 बजे फायरिंग शुरू हुई।
- सुरक्षा बलों ने नक्सलियों को सरेंडर करने की चेतावनी दी, पर उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी।
- लगभग 45 मिनट चली मुठभेड़ में हिडमा, उसकी पत्नी और 4 अन्य नक्सली ढेर हो गए।
हिडमा की मौत का Psychological & Strategic Impact
माडवी हिडमा नक्सली संगठन की रीढ़ था। उसकी मौत के बाद—
नक्सलियों की ऑपरेशनल क्षमता 50% तक कम होने की आशंका है।
PLGA के बटालियन-1 में नेतृत्व का संकट पैदा होगा।
छत्तीसगढ़, आंध्र व ओडिशा में नक्सल मोर्चे पर बड़ी जीत मिलेगी।
हिडमा की मौत माओवादी संगठन के लिए ‘सबसे बड़ा झटका’ मानी जा रही है।
कई राहत अभियानों, सड़क निर्माण और विकास गतिविधियों को अब गति मिलने की संभावना है।
हिडमा की मौत: मां के लिए एक दर्दनाक सत्य
यह सच है कि हिडमा आतंक का सिरमौर था, लेकिन एक मां के लिए वह केवल एक बेटा था। उसकी मां की आंखों में अपने बेटे के लिए आखिरी उम्मीद थी। लेकिन वह उम्मीद आज टूट गई।
एक अधिकारी ने बताया—
“हिडमा जिंदा बच सकता था, अगर वह अपनी मां की बात मान लेता।”
यह वाक्य हिडमा की जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी है—एक मां का प्यार जिसे उसने अनदेखा कर दिया।
नक्सलवाद के भविष्य पर इसका असर
हिडमा का अंत केवल एक मुठभेड़ नहीं। यह संदेश है कि—
माओवाद का खात्मा अब तेज गति से होगा
सरेंडर करने वाले नक्सलियों को अब ज्यादा मौका मिल सकता है
जंगलों में सुरक्षा तैनाती और मजबूत होगी
हिडमा की मौत से युवा नक्सलियों में मनोवैज्ञानिक गिरावट होगी
यह नक्सली आंदोलन के कमजोर होने का निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
निष्कर्ष: एक आतंक अध्याय का अंत, लेकिन सीख बाकी है
माडवी हिडमा की मौत एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन साथ ही यह कहानी बताती है कि हिंसा का रास्ता किस तरह मनुष्य को अपने परिवार, समाज और अंततः जीवन से काट देता है। माओवादी विचारधारा ने हजारों युवाओं को अपने घरों से दूर किया है, और उनमें से कई आज जीवित नहीं हैं।
हिडमा की कहानी यही कहती है—
“अगर हथियार छोड़ दे, तो जिंदगी बच सकती है। लेकिन अगर हथियार थाम ले—तो मौत निश्चित है।”
