बॉलीवुड… एक ऐसी दुनिया जहाँ चकाचौंध भरी रोशनी होती है। जहाँ सितारे आसमान में नहीं, ज़मीन पर चलते हैं। जहाँ सपने सच होते हैं—लेकिन उन्हीं सपनों की राख हर रोशन चेहरे के पीछे अनकही रह जाती है। फिल्म इंडस्ट्री की इस दोहरी दुनिया को हाल ही में अभिनेता, लेखक और गीतकार पीयूष मिश्रा ने बेनकाब किया है। “नकली, निर्दयी और निष्ठुर इंडस्ट्री” — उनके यह शब्द, सुनने वालों की सोच पर चोट कर जाते हैं।

फिल्म इंडस्ट्री: चमक से भरी, छल से लिपटी दुनिया
पीयूष मिश्रा कहते हैं—
“इंडस्ट्री ने मुझे बहुत कुछ दिया है, पर यह नकली है… बहुत नकली।”
यह एक ऐसा बयान है जिसमें कड़वा सच छिपा है। एक ऐसी सच्चाई जिसे बाहर की दुनिया सुनकर चौंक जाती है, पर जिसे अंदर रहकर जीवित रहना पड़ता है।
दोस्ती नहीं, सिर्फ मतलब निभाए जाते हैं
अभिनेता का कहना है कि उनके इंडस्ट्री में कोई दोस्त नहीं। अगर हैं भी तो केवल वे लोग जिनके साथ वह काम करते हैं।
“दोस्ती नहीं, यह सब गिव एंड टेक है। काम है तो साथ है, नहीं तो कोई नहीं।”
इंडस्ट्री में रिश्ते बनते नहीं — लाभ के अनुसार बनाए जाते हैं। भावनाएँ यहाँ सिर्फ स्क्रिप्ट पर अच्छी लगती हैं, ज़िंदगी में नहीं।
स्टारडम का भ्रम: चमक का जहर
स्टार बनने का सपना हर कलाकार देखता है लेकिन पीयूष मिश्रा बताते हैं कि स्टारडम एक खूबसूरत जाल है।
“अगर आप स्टार बन गए, तो जिंदगी में दूसरी चीजें नहीं कर सकते।”
स्टार की शोहरत उतनी ही तेज होती है जितनी जल्दी वह बुझ भी सकती है। क्योंकि स्टारडम इंसान को नहीं—प्रोड्यूसर की जेब को बड़ा बनाता है।
इंडस्ट्री में पैसा लगता है—व्यक्ति पर नहीं, ब्रांड पर
“मुझ पर कोई प्रोड्यूसर पैसा नहीं लगाता… तो मैं स्टार कैसे?”
यह बताते हुए उन्होंने एक कड़वी सच्चाई खोली — यहाँ प्रतिभा से ज़्यादा लाभ देखा जाता है। कला सिर्फ डाल में नमक है… परोसा हमेशा पैसा ही जाता है।
प्रतिभा हो तो काम मिलेगा… वरना बाहर फेंक दिया जाएगा
इंडस्ट्री में यह भ्रम फैला हुआ है कि पार्टियों में मिलकर काम मिलता है। उन्होंने इसे खारिज किया—
“काम पार्टी में नहीं मिलता… काम आपको आपके काम से मिलता है।”
कला में लोहे सी दृढ़ता होनी चाहिए… कमजोर कलाकार यहाँ टिक नहीं पाते। बॉलीवुड उन लोगों को तुरंत बाहर फेंक देता है जो कार्य में निपुण नहीं, केवल दिखावे में डूबे रहते हैं।
नशा, शबाब और फिसलन: एक गलत कदम और सब खत्म
पीयूष मिश्रा ने सबसे बड़ा खुलासा किया—
“यहाँ शराब है, गांजा है, चरस है, लड़कियाँ हैं… फिसलने के तरीके सस्ते और अनगिनत हैं।”
• यहाँ राह आसान नहीं
• यहाँ फिसलन हर कदम पर है
• और जो गिर गया—वह उठ ही नहीं पाता
यहाँ जिंदा वही रहता है जो कला और खुद को संभालकर चलता है।
अकेले चलना सीखो, तभी पहचान मिलेगी
पीयूष मिश्रा कहते हैं कि वे न पार्टियाँ करते हैं और न ही भीड़ में घुलते-मिलते—
“भीड़ में रहते हुए भी मैं अकेला रहता हूँ।”
यह सादगी नहीं— यह आत्मसम्मान है। इंडस्ट्री में जो खुद को बचाकर, अपनी पहचान बनाकर जी ले— वही असली कलाकार कहलाता है।
नकली मत बनो — असली रहो, तभी बचोगे
उनका सीधा संदेश है—
“जैसे हो, वैसे ही दिखो। नकली मत बनो… जिंदगी अच्छे से चलेगी।”
ग्लैमर की यह दुनिया, चमक दिखाती है पर चरित्र पर हमला करती है। इससे बचना हो तो सच, सादगी और स्वाभिमान को साथ रखना होगा।
इंडस्ट्री: एक माध्यम, मंज़िल नहीं
पीयूष मिश्रा ने साबित किया कि—
• कला मंच की मोहताज नहीं
• कलाकार आत्मविश्वास का भूखा है, तालियों का नहीं
• बड़े पर्दे से ज़्यादा बड़ी होती है पहचान की भूख
उन्होंने युवाओं को चेतावनी देते हुए कहा—
“इंडस्ट्री को भगवान मत समझो। वह सिर्फ काम देती है, जीवन नहीं।”
निष्कर्ष: सिनेमा की रोशनी से पहले — अंधेरे से मुकाबला जरूरी
यह बयान केवल गुस्सा नहीं— यह एक चेतावनी है सभी सपने देखने वालों के लिए।
❝चमकदार दुनिया में कदम रखने से पहले
उसके पीछे का अंधेरा समझ लो…
वरना वह अंधेरा तुमको खा जाएगा।❞
पीयूष मिश्रा की आवाज सिर्फ एक कलाकार की आवाज नहीं, बल्कि उस हर संवेदनशील दिल की चीत्कार है जिसने बॉलीवुड की सच्चाई को अपनी आत्मा पर महसूस किया है।
