भारतीय टेलीविजन जगत में कई रिश्तों की शुरुआत सेट्स पर होती है। कुछ रिश्ते समय की धूप-छांव में खो जाते हैं, तो कुछ रिश्ते सालों की मजबूती के बाद वह मुकाम हासिल करते हैं जिसे समाज विवाह का नाम देता है। ऐसा ही एक खूबसूरत रिश्ता रहा है प्रसिद्ध टीवी कलाकार अश्लेषा सावंत और अभिनेता संदीप बसवाना का। 23 वर्षों से साथ रहने के बाद आखिरकार उन्होंने वृंदावन के दिव्य माहौल में शादी कर ली। यह निर्णय अचानक नहीं था, बल्कि समय के साथ पकते प्रेम, विश्वास और परिवारिक स्वीकार्यता का नतीजा था।
16 नवंबर 2025 भारतीय टेलीविजन के इस प्रसिद्ध कपल के जीवन में यादगार तारीख बन गई, जब उन्होंने वृंदावन के पवित्र चंद्रोदय मंदिर में सात फेरे लेते हुए एक-दूसरे के प्रति आजीवन समर्पण की प्रतिज्ञा की। शादी न तो बड़े पैमाने पर हुई, न ही चमक-दमक और वैभव की शोरगुल में। यह समारोह निजी था, जिसमें केवल परिवार के कुछ करीबी सदस्य ही शामिल हुए।

जहां आज सेलिब्रिटी शादियां मीडिया हाइप और महंगे आयोजनों के लिए सुर्खियों में रहती हैं, वहीं यह विवाह एक अलग पहचान रखता है। इसमें रही केवल परंपरा, आध्यात्मिकता और प्रेम की सरलता।
सेट पर हुई थी पहली मुलाकात, कहानी वहीं से आगे बढ़ी
साल 2002 था। भारतीय टेलीविजन पर एक ऐसा शो चर्चा के केंद्र में था जिसने घर-घर में अपनी पहचान बनाई, नाम था — क्योंकि सास भी कभी बहू थी। इसी शो के सेट पर पहली बार मिले अश्लेषा और संदीप।
मुलाकात साधारण थी, पर रिश्ता असाधारण बन गया। समय के साथ दोनों की दोस्ती गहराई और फिर यह दोस्ती प्रेम में बदल गई।
शो की लोकप्रियता जितनी ऊंचाइयां छू रही थी, उतनी ही मजबूती से दोनों का निजी रिश्ता भी आगे बढ़ रहा था। उन्होंने रिश्ते को जल्दबाजी में नया नाम देने की कोशिश नहीं की। उन्होंने चुना समय, चुना समझ, चुना विश्वास का रास्ता। यही वजह रही कि 23 साल तक साथ रहते हुए भी उनका रिश्ता पहले दिन जितना ही मजबूत बना रहा।
संदीप बसवाना, जो अपनी गंभीर अभिनय शैली के लिए जाने जाते हैं, और अश्लेषा, जिन्होंने अपनी सहजता और दमदार भूमिकाओं से दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ी — दोनों एक-दूसरे के व्यक्तित्व के पूरक रहे।
वृंदावन से महसूस हुआ आध्यात्मिक जुड़ाव, वहीं लिया जीवन का सबसे खास फैसला
अप्रैल 2025 में दोनों वृंदावन गए। यह यात्रा एक साधारण ट्रिप नहीं थी। वहां के राधा-कृष्ण से जुड़ी पौराणिक ऊर्जा, भक्ति और अलौकिक शांति ने उन्हें अंदर से छू लिया। वहीं उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामकर तय किया कि अब वे इस रिश्ते को वह सम्मान दें, जिसकी उम्मीद उनके परिवार और प्रशंसक लंबे समय से कर रहे थे। संदीप ने एक इंटरव्यू में कहा:
“हमने महसूस किया कि हमारा रिश्ता अब तक जितना भी आगे बढ़ा, उसमें भगवान का ही आशीर्वाद था। इसलिए सात फेरों का सबसे सही स्थान यही था, कृष्ण की नगरी वृंदावन।”
अश्लेषा ने भी अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा:
“यह सिर्फ शादी नहीं थी, यह हमारे रिश्ते का दिव्य मिलन था। यह निर्णय अचानक लिया गया, लेकिन बेहद सही लगा।”
परिवार की खुशी रह गई वर्षों से अधूरी, अब पूरी हुई
लिव-इन रिलेशनशिप भारत में आज भले सामान्य होती जा रही है, लेकिन परिवारों की भावनात्मक अपेक्षाओं के सामने वह हमेशा एक अधूरापन छोड़ जाती है। दोनों के माता-पिता ने वर्षों से इस सुखद क्षण का इंतजार किया था। जब शादी की खबर उन्हें दी गई, तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू दिखाई दिए।
संदीप ने मजाकिया अंदाज में स्वीकार किया:
“लोगों के सवाल सुन-सुनकर हम थक गए थे। हमने कितनी बार कहा कि हमारे लिए शादी का मतलब बदल गया है, लेकिन अब सभी खुश हैं।”
उनकी यह बात रिश्ते की आज की वास्तविकता को बेहद सरलता से समझा देती है।
सोशल मीडिया पर साझा की गई खूबसूरत तस्वीरें
शादी के बाद दोनों ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट्स पर विवाह की तस्वीरें साझा कीं। दिल को छू लेने वाले शब्दों के साथ लिखा:
“और बस इसी तरह हम मिस्टर और मिसेज बन गए। परंपरा ने हमारे दिल जीत लिए। सभी आशीर्वादों के लिए कृतज्ञ हैं।”
पिंक ट्रेडिशनल वेडिंग आउटफिट में दोनों बेहद सुरुचिपूर्ण और खुश नजर आए। तस्वीरों में परिवारिक प्रेम का सुखद एहसास दिखाई देता है।
करियर की दिशा और आगे के प्लान
अश्लेषा वर्तमान में लोकप्रिय टीवी शो झनक में नजर आ रही हैं। वहीं संदीप आखिरी बार अपोलीना में दिखाई दिए थे। शादी के बाद भी दोनों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपने-अपने करियर को नए आयाम देते रहेंगे। शादी का उनके प्रोफेशनल लक्ष्य पर कोई असर नहीं होगा, बल्कि यह रिश्ता अब उन्हें भावनात्मक स्थिरता देगा।
वे बताते हैं कि आगे किसी भव्य रिसेप्शन या इंडस्ट्री इवेंट की योजना फिलहाल नहीं है क्योंकि शादी का मूल उद्देश्य ही था — सादगी, आध्यात्मिकता और निजीपन।
टेलीविजन दुनिया के लिए मिसाल
भारतीय समाज में रिश्तों को वैवाहिक बंधन से परिभाषित करने का चलन आम है। पर इस कपल ने दिखाया कि रिश्ते का असली आधार विश्वास और सहयोग होता है। उन्होंने सहजीवन को 23 वर्षों तक पूरी निष्ठा से निभाया और जब सही समय महसूस हुआ, तब जीवन का सबसे बड़ा फैसला लिया। उनकी कहानी आज के युवाओं के लिए यह संदेश देती है कि रिश्ते का मूल्य नाम से नहीं, निभाने के ढंग से तय होता है।
