भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच संपन्न हुई दो मैचों की टेस्ट श्रृंखला भारतीय क्रिकेट के लिए निराशा और आत्ममंथन लेकर आई। लंबे समय बाद ऐसा अवसर आया जब भारतीय टीम न केवल विदेशी सरजमीं पर बल्कि अपनी पहचान वाली परिस्थितियों में भी पूरी तरह असफल दिखाई दी। इस हार का असर सिर्फ स्कोरलाइन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने भारतीय क्रिकेट के भीतर छिपे एक गहरे संकट को उजागर कर दिया। इस संकट की ओर सबसे तीखा संकेत उस पूर्व भारतीय क्रिकेटर ने किया, जिसकी आलोचनाएं अक्सर विवादों को जन्म देती हैं, लेकिन कई बार उन्हीं आलोचनाओं में भविष्य की चेतावनी भी छिपी होती है। दक्षिण अफ्रीका में 0-2 की हार के बाद भारतीय बल्लेबाजों को लेकर उनकी सख्त टिप्पणियों ने एक व्यापक बहस को जन्म दिया है।

भारतीय बल्लेबाजों को लेकर की गई यह टिप्पणी सिर्फ एक बयान नहीं बल्कि भारतीय क्रिकेट की जड़ों और उसके ढांचे को लेकर उठाया गया गंभीर सवाल है। उन्होंने कहा कि आज के भारतीय बल्लेबाज घरेलू पिचों पर वैसे नहीं खेल पा रहे, जैसे उन्हें खेलना चाहिए था। उनका तंज दिलचस्प जरूर है, लेकिन इसके भीतर छिपी पीड़ा कहीं ज्यादा बड़ी है। उन्होंने भारतीय बल्लेबाजों की तुलना उन प्रवासी भारतीयों से की, जो विदेशी जीवन शैली में ढल कर अपने ही घर की मिट्टी से दूर हो जाते हैं।
उनका कहना है कि आज के भारतीय बल्लेबाजों की असल समस्या यह है कि वे भारत में रहते भी हैं, भारत से खेलते भी हैं, लेकिन भारत की पिचों पर खेलने की आदत खो चुके हैं। उन्हें लगता है कि चयन के बाद खिलाड़ियों का घरेलू मैदानों पर समय बिताना बेहद कम हो गया है। वह देश में रहने के बावजूद विदेशी घास वाली या उछालभरी पिचों पर खेलने के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि धीरे-धीरे भारतीय पिचों पर मिलने वाले धीमे टर्न और अनोखे बाउंस को पढ़ने की क्षमता कम होती जा रही है।
उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में चयनित भारतीय बल्लेबाजों की प्रवृत्ति बदल गई है। पहले के दौर में खिलाड़ी चयन के बाद भी घरेलू क्रिकेट का हिस्सा बनते थे। उनकी जड़ें हमेशा घरेलू पिचों से जुड़ी रहती थीं, जहां स्पिन और कम उछाल वाले विकेट अक्सर बल्लेबाज की तकनीक को परखते थे। लेकिन अब खिलाड़ी टूर्नामेंट्स और विदेशी लीग्स में इतना समय व्यतीत करते हैं कि भारतीय पिचों पर खेलने का उनका अनुभव पहले जितना नहीं रह गया। यह परिवर्तन धीमा जरूर रहा है, लेकिन उसके प्रभाव अब मैदान पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं।
दक्षिण अफ्रीका जैसी मजबूत टीम के खिलाफ भारतीय बल्लेबाजों की असफलता ने इस बदलाव की तीव्रता को उजागर कर दिया। पूरी श्रृंखला में भारतीय बल्लेबाज केवल एक बार भी 250 रन का आंकड़ा पार नहीं कर सके। ऐसा भारतीय क्रिकेट के इतिहास में अत्यंत कम बार हुआ है। यह सिर्फ खराब बल्लेबाजी का मामला नहीं था, बल्कि पूरी श्रृंखला के दौरान भारतीय बल्लेबाज पिचों को समझते, पढ़ते और अपनाते हुए संघर्ष करते दिखाई दिए।
उन्होंने विशेष रूप से युवा भारतीय बल्लेबाजों की तैयारी पर सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले दो वर्षों में कई खिलाड़ियों ने भारत से अधिक विदेशी पिचों पर टेस्ट मैच खेले हैं। उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने यह बताया कि कुछ खिलाड़ी भारत में गिने-चुने टेस्ट मैच खेल पाए, जबकि विदेशों में उन्हें पर्याप्त समय मिला। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय पिचों को समझने का जो अभ्यास पहले नियमित था, वह अब एक औपचारिकता बनकर रह गया है।
यह मुद्दा सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं। यह भारतीय क्रिकेट के कार्यक्रम और उसके वाणिज्यिक ढांचे से भी जुड़ा है। इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमें भारत को अपनी घरेलू श्रृंखलाओं में बार-बार आमंत्रित करती हैं, क्योंकि भारतीय क्रिकेट टीम के साथ होने वाले मैचों से उन्हें अत्यधिक आर्थिक लाभ मिलता है। इस निरंतर मांग का परिणाम यह हुआ कि भारतीय खिलाड़ी विदेशी दौरों में अधिक व्यस्त रहने लगे और घरेलू क्रिकेट के साथ उनका संबंध धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा।
भारतीय बल्लेबाजों के इस बदलते रवैये के बारे में चिंता की एक और वजह यह है कि भारतीय पिचों पर खेलने की अलग कला होती है। धीमी पिचें, टर्न लेने वाली गेंदें और असमान बाउंस भारतीय क्रिकेट की पहचान रही हैं। इन परिस्थितियों में सफल होने के लिए बल्लेबाजों को अपने फुटवर्क पर गहन काम करना पड़ता है, साथ ही रोटेशन ऑफ स्ट्राइक और पारी को जोड़ने की कला का अभ्यास भी जरूरी होता है। विदेशी पिचों पर तेज गेंदबाजों के सामने आक्रामक खेल से रन निकल सकते हैं, लेकिन भारतीय पिचों पर वही तरीका कई बार खतरनाक साबित होता है। ऐसे में बल्लेबाजों को धैर्य और तकनीकी अनुशासन दोनों की आवश्यकता होती है।
उन्होंने बताया कि आज के बल्लेबाज स्टैंड एंड डिलीवर शैली में इतने सहज हो चुके हैं कि पिच से गेंद के टर्न या रफ्तार में बदलाव को पढ़ने की क्षमता कम होती जा रही है। यही कारण है कि धीमी गेंदें और स्पिनर उनकी कमजोरी जैसे दिखाई देने लगे हैं। जब एक बल्लेबाज भारत की घरेलू पिचों पर लंबे समय तक नहीं खेलता, तो वह पिच की भाषा को भूल जाता है और जब अचानक वह उसी भाषा में बात करने को लौटता है, तो वह उसे अनजानी लगती है।
इस श्रृंखला में भारतीय बल्लेबाजों की कमजोरी को न सिर्फ विपक्षी गेंदबाजों ने बल्कि परिस्थितियों ने भी उजागर किया। पिचें ऐसी थीं जहां अच्छी तकनीक और धैर्य से बल्लेबाजी करने की आवश्यकता थी। लेकिन भारत के अनुभवी और युवा बल्लेबाज दोनों उन परिस्थितियों में खुद को मुश्किल में पाते रहे। यह पहली बार नहीं था कि भारतीय बल्लेबाजों की घरेलू परिस्थितियों में संघर्ष की चर्चा हुई हो, लेकिन इस बार यह समस्या इतनी स्पष्ट थी कि दुनिया भर के क्रिकेट विशेषज्ञों ने इस पर गंभीरता से विचार करना शुरू कर दिया।
इस समय भारतीय क्रिकेट के कार्यक्रम को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। आगामी आठ महीनों तक भारतीय टीम कोई भी टेस्ट मैच नहीं खेलेगी। यह अंतराल अपने भीतर जोखिम और अवसर दोनों छिपाए हुए है। अगर इस समय का उपयोग घरेलू क्रिकेट में भागीदारी बढ़ाने और बल्लेबाजों को भारत की पिचों पर ढालने के लिए किया गया, तो आने वाले समय में इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे सकता है। लेकिन यदि खिलाड़ियों ने फिर वही आदत अपनाई और विदेशी लीग्स तथा गैर-जरूरी टूर्नामेंट्स में व्यस्त रहकर घरेलू क्रिकेट से दूरी बनाए रखी, तो समस्याएं और गहरी हो सकती हैं।
यह समय भारतीय क्रिकेट के लिए केवल हार का विश्लेषण करने का नहीं बल्कि खुद को फिर से पहचानने का है। भारतीय क्रिकेट की महानता इस बात में रही है कि उसने हमेशा अपनी परिस्थितियों को समझा, अपनाया और उनसे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन निकाला। भारत की पिचों ने महान स्पिनर दिए, बेहतरीन बल्लेबाज दिए और विशिष्ट शैली का क्रिकेट विकसित किया। लेकिन अगर नई पीढ़ी इस विरासत से दूर होती गई, तो आने वाली पीढ़ियां उस कला से वंचित हो सकती हैं, जो भारतीय क्रिकेट की पहचान रही है।
आलोचना हमेशा कड़वी लगती है, लेकिन कई बार वही दवा भी होती है। भारतीय क्रिकेट के सामने यह चुनौती अब सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि सांस्कृतिक भी है। भारतीय बल्लेबाजों को यह याद रखना होगा कि उनकी असली ताकत विदेशी नहीं बल्कि भारतीय पिचों पर जन्मी है। उन्हें फिर से अपने घर की मिट्टी को महसूस करना होगा, वही मिट्टी जिसमें उनके क्रिकेट का मूल स्वभाव छिपा है। यही वह क्षण है जहां भारतीय क्रिकेट को खुद को पुनः संयोजित करने और भविष्य की ओर नई दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।
